Qurbani Ki Qubuliyat

गोस्त खाने का नाम मुसलमान नहीं 

“मेरी ज़िन्दगी का मक़सद तेरे दीन की सरफराजी। 

इसलिए मैं मुसलमान इसलिए मैं नमाजी !”

बे ऐब जानवर और ऐबदार मुसलमान 

याद रहे जिस तरह कुर्बानी का जानवर बे ऐब होना चाहिए उसी तरह कुर्बानी करने वाला मुसलमान भी बेऐब यानी गुनाहों से पाक व मुत्तक़ी होना चाहिए । जिस तरह तुम्हारे नज़दीक बे ऐब जानवर का कुर्बानी जायज नही उसी तरह अल्लाह के नज़दीक ऐबदार यानी गुनहगार का  कुर्बानी क़ुबूल नहीं । दुनियादार मुसलमानों का कुर्बानी से सिर्फ दुनिया मे गोश्त हासिल हो सकता है आख़िरत का सवाब तो दीनदारो और परहेजगारों के लिए है। 

जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है। 

तर्जुमा : तेरे रब के नजदीक आख़िरत परहेजगारों के लिए है। (सूरह ज़ुखरूफ़, आयत . 35)

 दूसरी जगह क़ुरआन में है (तर्जुमा) : अल्लाह को हरगिज़ न उनके गोश्त पहुचँते हैं न उनके ख़ून, हाँ तुम्हारी परहेज़गारी उस तक पहुँचती है। (सूरह हज़्ज़, आयत न. 37)

तफ़्सीर : यानी क़ुरबानी करने वाले सिर्फ़ नियत की सच्चाई और तक़वा की शर्तों  की रिआयत से अल्लाह त’आला को राज़ी कर सकते हैं. 

इसलिए जानवर कैसा हो ये मसाइल जानने के साथ साथ कुर्बानी देने वाला कैसा हो ये जानना सबसे पहले जरूरी है। 

कुर्बानी का जानवर कैसा होना चाहिए ? 

मसलाः- कुरबानी का जानवर मोटा ताज़ा अच्छा और बे ऐब होना ज़रूरी है। अगर थोड़ा सा ऐब हो तो कुरबानी मकरूह होगी। अगर ज़्यादा ऐब है तो कुरबानी होगी ही नहीं। जैसे अन्धा, लंगड़ा, काना, बेहद, दुबला, तिहाई से ज़्यादा कान, दुम, सींग, थन वगैरह कटा हुआ, पैदाइशी बे-कान का, बीमार, इन सब जानवरों की कुरबानी जाइज़ नहीं।

कुर्बानी देने वाला मुसलमान कैसा होना चाहिए 

कुर्बानी करने वाला इंसान हराम खोर नहीं होना चाहिए गुनाहों से पाक और बे ऐब होना जरूरी है। अगर दुनियादार होगा तो कुर्बानी क़ुबूल न होगी। जैसे दिल का अंधा, पैर गुनाहों से आलूदा, हराम देखने वाला, हराम खाने वाला, सिर्फ गोस्त का पकवान खाने का लालच रखने वाला, कमजोर ईमान वाला, जबान से झूट, हंसी मजाक, गाली गलौज, ग़ीबत, चुगली करने वाला तफसील के लिए नीचे पढ़ते जाए

कुर्बानी की क़बूलियत की शर्तें 

क़ुरआन में है : (तर्जमा) अल्लाह उसी का क़ुबूल करता है जो मुत्तक़ी (परहेजगार) हो। (सूरह माईदा, आयत न. 27)

मुत्तक़ी (परहेजगारों) कौन ? 

किताब मुकाशफतुल क़ुलूब बाब न. 1 के हवाले से 

लिखते है साहबे ईमान वह है जो जिस्म के तमाम आजा के साथ अल्लाह तआला से डर रखता हो, जैसा कि फकीह अबू लैस ने फरमायाः सात बातों में अल्लाह तआला के खौफ का पता चल जाता है।

1.उस की ज़बान गलत बयानी, 

गीबत, चुगली, तुहमत, और फुजूल बोलने से बची हो और अल्लाह तआला का जिक्र करने, तिलावते कलाम पाक करने, और दीनी उलूम सीखने में लगी हो।

2. उस के दिल से दुश्मनी, बुहतान और मुसलमान भाईयों का हसद निकल जाए क्योंकि हसद नेकियों को चाट जाता है जैसा कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है- हसद नेकियों को खा जाता है जैसे आग लकड़ी को खा जाती है। जानना चाहिए कि हसद दिल की सब से घटिया बीमारियों में से एक बीमारी है और दिल की बीमारियों का इलाज सिर्फ इल्म और अमल से ही हो सकता है।

3. उस की नज़र हराम खाने पीने से और हराम लिबास वगैरह से महफूज़ रहे और दुनिया की तरफ लालच की नज़र से न देखे बल्कि सिर्फ इबरत पकड़ने के लिए उस की तरफ देखे और हराम पर तो कभी उसकी निगाह भी न पड़े जैसा कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया- जिस ने अपनी आँख हराम से भरी अल्लाह तआला कियामत के दिन उसको आग से भर देगा।

4. उसके पेट में हराम खाना न जाए। यह गुनाहे कबीरा है। हुजूर नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- बनी आदम के पेट में जब हराम का लुक्मा पड़ा तो ज़मीन व आसमान का हर फरिश्ता उस पर लानत करेगा जब तक कि वह लुक्मा उस के पेट में रहेगा और अगर उसी हालत में मरेगा तो उस का ठिकाना जहन्नम होगा।

5. हराम की तरफ हाथ न बढ़ाए बल्कि ताकत भर उस का हाथ अल्लाह की फरमांबरदारी की तरफ बढे। हज़रते कअब इब्ने अहबार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह तआला ने सब्ज मोती (जबर्जद) का महल पैदा फरमाया, उस में सत्तर हजार घर हैं और हर घर में सत्तर हज़ार कमरे हैं उस में वही दाखिल होगा जिस के सामने हराम पेश किया जाए और वह सिर्फ अल्लाह के डर की वजह से उसे छोड दे।

6. उसका कदम अल्लाह तआला की नाफरमानी में न चले बल्कि सिर्फ उसकी इताअत व खुशनूदी में रहे. आलिमों और नेकों की तरफ हरकत करे। 

7. इबादत व मुजाहिदा, इन्सान को चाहिए कि खालिस अल्लाह तआला के लिए इबादत करे, रियाकारी व मुनाफिकत से बचता रहे, अगर ऐसा किया तो यह उन लोगों में शामिल हो गया।  

तक़वा का वसीयत 

हदीस :- हजरत अबू ज़र गफ्फारी रदियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि मैनें कहा कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ! आप मुझको कोई वसीयत फ़रमायें तो आप ने फरमाया कि मैं तुम को तक़वा (यानी अल्लाह से डरते रहने) की वसीयत करता हूँ। क्योंकि यह तुम्हारे आमाल को बहुत ज़्यादा संवार देने वाली चीज़ है।(मिश्कात, जिल्द 2, सफा 415)

मगर अफ़सोस 

जो लोग मालिके निसाब नही है और उस पर कुर्बानी वाजिब नही है फिर भी गोस्त खाने के लिए 2 या 3 हज़ार कही से उपाय करके कुर्बानी देते है लेकिन वही सख्स अगर ज़कात अदा करने के लिए मालिके निसाब को पहुँच जाए फिर भी सही से ज़कात अदा नही करता क्योंकि यहां खाने का मामला नही है और ये माल का असल कुर्बानी। अगर कुर्बानी का गोस्त खाने का हुक़्म न होता तो इस दौर का 90% दुनियादार मुसलमान कुर्बानी नहीं देते इसका अंदाज़ा ज़कात देने का मामला से लगाया जा सकता है।

 

सूफ़ी अनवर रज़ा खान क़ादरी

बानी ग़ौस व ख़्वाजा व रज़ा ट्रस्ट, रांची (झारखंड)

ख़ादिम ख़ानक़ाह क़ादरी चिश्ती (रांची)

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