Author name: Sufi Anwar Raza Qadri

Taleemate Khwaja (Rohhani wa Bateeni)

किताब असरारे हक़ीक़ी हिन्दी ज़बान में Share की जा रही है ताकि आपको म’अलूम हो जाए हमारे आक़ा, हिन्द के बादशाह, हिन्दल वली, ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाहि अलैह ने जो ख़त लिखा था अपने महबूब ख़लीफा हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाहि अलैह को, उसमें क्या मज़ामीन हैं।
वाज़ेह रहना चाहिए कि येह इल्मे हक़ीक़ी की बातें हैं और इन्हें समझने के लिए ला मुहाला किसी पीरो मुर्शिद या हिदायत याफ़ता शख्स की मदद दरकार है।
येह किताब हम ख़ास तौर पर उनके लिए Share किये हैं जो हकी़की़ मुरीद हैं और जो हक़ की तलाश में सर गर्दा हैं।
हमने पूरी कोशिश की है कि आसान लफ्ज़ ब लफ्ज़ आपके सामने पेश किया जाए। फिर भी कोई भूल हो गई हो तो ख़्वाजा साहब से म’आफ़ी चाहते हैं और आपसे दरख़्वास्त है कि आप अगर उर्दू जानते हैं तो ओरिजिनल किताब से मिला सकते हैं और अपने पीरो मुरशिद से बात करके समझ सकते हैं।
अल्लाह हमें तौफीक़ दे कि मुहम्मद मुस्तफा ﷺ के नक़्शे कदम पर चलें और अल्लाह हमारे दिल को ऐसे ईमान से ज़िन्दा करे जैसा कि इसका हक़ है।

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Taleemate Raza (Tamheede Iman)

Tamheed E Iman (اردو +Roman+हिंदी )

तालीमाते रज़ा बा ज़रीया ए किताब तम्हीदे इमान बाआयाते क़ुरआन  

रिसाला “तमहीदे ईमान बा आयाते क़ुरआन” इमामे अहले सुन्नत सय्यदी आला हज़रत के मशहूरे ज़मान अक़ाइद पर मुस्तमिल किताब है जिसमे हुज़ूर सय्यदी आला हज़रत ने हम अहले सुनत व ज़मात के अक़ीदे की मुताबिक क़ुरआनी आयतों की रौशनी में ईमान की हिफाज़त के लिए बड़ा जामेअ रिसाला तहरीर फ़रमाया अगर कोई शख्स वक़्त का क़ुर्बानी देकर सिद्क़ दिल के साथ खुलूस के साथ इसका मुताअला करे , इस तालीमात पर अमल करे तो इंशाल्लाह तबारक व तआला उसके तमाम वसवसों और सवालों का क़ुरआन की रौशनी में ज़वाब मिल जाएगा और इंशाल्लाह बदअक़ीदों, बदमज़हबों, वहाबियों, देवबंदियो, सुल्लाहकुल्लियों, हासीदीन व आदा ए दीन वगैरह जितने भी बद्दीन बदमज़ह, मुनाफिकीन, मूर्तदीन है उससे ईमान बचाने का कोशिश भी कर के क़ामिल ईमान वाला बन जायेगा।



(اردو) تمہید ایمان

موضع: عشق مصطفیٰ و حب النبی ﷺ

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Tamheed E Iman (Roman)

Mauzu : Ishque Mustafa & Hubbe Nabi ﷺ

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तम्हीदे ईमान (हिंदी)

मौज़ू – इश्क़े मुस्तफा & हुब्बे नबी ﷺ

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Huqooqul Ibad Kya Hai?

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Ahle Bait Ka Huqooq

अल्लाह त’आला सिर्फ एक चीज का मुतालबा करता है
क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है : (तर्जुमा) ऐ महबूब तुम फ़रमाओ मैं इस (नेअमतों व फ़ज़्ल) पर तुम से कुछ उजरत नहीं मांगता मगर क़राबत की महब्बत (का मुतालबा करता हूं), (सूरह शूरा , आयात 23)

अल्लाह वालों से महब्बत
रिवायत है कि अल्लाह त’आला ने मूसा अलैहिस्सलाम से फ़रमाया, तुम ने कभी मेरे लिए भी अमल किया है? मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज किया! बारे इलाहा! मैं ने तेरे लिए नमाजें पढ़ीं, रोजे रखे, सद‌के दिए, तेरे आगे सज्दे किये, तेरी हम्द की, तेरी किताब को पढ़ा और तेरा जिक्र करता रहा। अल्लाह तआला ने फरमाया ऐ मूसा। नमाज़ तेरी दलील, रोजा तेरे लिए ढाल, सद्‌का तेरे लिए साया, तस्बीह तेरे लिए जन्नत में दरख्त, किताब की किराअत (पढ़ाई) तेरे लिए जन्नत में हूर व महल और मेरा जिक्र तेरा नूर है। (यानी ये तूने अपने लिए किया ) बता तूने मेरे लिए क्या अमल किया है? मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज की ऐ रब्बे. जुलजलाल। मुझे बता। वह कौन सा अमल है जो मैं तेरे लिए करू? अल्लाह पाक ने फ़माया तू ने कभी मेरी वजह से किसी से मुहब्बत की? तू ने मेरी वजह से कभी किसी से दुश्मनी रखी? तब मूसा अलैहिस्सलाम समझ गये कि सब से अच्छा अमल अल्लाह – के लिए मुहब्बत और अल्लाह के लिए दुश्मनी रखना है। (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 15, पेज न. 105)

पता चला कि तमाम आमाल इंसान अपने लिए करता है और सिर्फ एक अमल है जो अल्लाह के लिये है यानी अल्लाह के क़ुर्बा (क़रीब वालो, अहले बैत, परहेजगारो) से महब्बत और यही खास अमल अल्लाह को राज़ी करने का जरिया है।

जिसके दिल मे ये अमल यानी अल्लाह वालो से मुहब्बत न हो वो अपने बाकी आमाल के साथ जहन्नम में जायेगा उसका आमाल उसे जन्नत में दाख़िल नहीं कर सकता।

लेकिन महब्बत ज़न्नत में दाख़िल कर सकता है क्योंकि मुहब्बत ही ईमान है और ज़न्नत में सिर्फ ईमान वाले जाएंगे।

आमाल वाला तो इब्लीस भी है लेकिन वो अपने आमाल के साथ जहन्नम में जायेगा और ज़न्नत में इसलिए नही जाएगा क्योंकि उस ने अल्लाह वालो से मुहब्बत, ताज़ीम और अदब न किया ।

महब्बते अहले बैत का इन’आम
हिकायत : शैख ज़ैनुद्दीन अब्दुल रहमान खिलाल बगदादी फरमाते हैंः मुझे एक अमीर ने बताया कि जब मर्ज़े मौत (सुक्रात) में मुब्तिला हुआ तो एक दिन उस पर सख्त इज़्तिराब तारी हुआ, मुंह सियाह हो गया और रंग बदल गया, जब इफा़का हुआ तो लोगों से उसने सूरत बयान की, तो उसने कहाः मेरे पास अज़ाब के फरिश्ते आए इतने में रसूले अकरम तशरीफ लाए और फरमायाः “उसे छोड़ दो क्योंकि यह मेरी औलाद से महब्बत रखता था और उनकी खिदमत करता था।“ चुनान्चे वह (फरिश्ते ) चले गए। अगर आखि़रत को आराम दह बनाना है तो सादाते किराम से महब्बत रखें, उनकी इज़्ज़त एहतराम बजा लाऐं, एहतराम से इस तरह पेश आऐं जिस तरह सरदार से पेश आया जाता है। इर्द गिर्द माहोल का जाइज़ा लें, पड़ौस में एक नज़र डालें, सादाते किराम को ढूंढें और उनकी ज़रूरियात को पूरा करें और सरापा खादिम बन जाऐं यही तुम्हारी आखिरत के लिए बेहतर है। (ज़ैनुल बरकात)

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