Maali Ibadaat

Qurbani Ki Qubuliyat

गोस्त खाने का नाम मुसलमान नहीं 

“मेरी ज़िन्दगी का मक़सद तेरे दीन की सरफराजी। 

इसलिए मैं मुसलमान इसलिए मैं नमाजी !”

बे ऐब जानवर और ऐबदार मुसलमान 

याद रहे जिस तरह कुर्बानी का जानवर बे ऐब होना चाहिए उसी तरह कुर्बानी करने वाला मुसलमान भी बेऐब यानी गुनाहों से पाक व मुत्तक़ी होना चाहिए । जिस तरह तुम्हारे नज़दीक बे ऐब जानवर का कुर्बानी जायज नही उसी तरह अल्लाह के नज़दीक ऐबदार यानी गुनहगार का  कुर्बानी क़ुबूल नहीं । दुनियादार मुसलमानों का कुर्बानी से सिर्फ दुनिया मे गोश्त हासिल हो सकता है आख़िरत का सवाब तो दीनदारो और परहेजगारों के लिए है। 

जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है। 

तर्जुमा : तेरे रब के नजदीक आख़िरत परहेजगारों के लिए है। (सूरह ज़ुखरूफ़, आयत . 35)

 दूसरी जगह क़ुरआन में है (तर्जुमा) : अल्लाह को हरगिज़ न उनके गोश्त पहुचँते हैं न उनके ख़ून, हाँ तुम्हारी परहेज़गारी उस तक पहुँचती है। (सूरह हज़्ज़, आयत न. 37)

तफ़्सीर : यानी क़ुरबानी करने वाले सिर्फ़ नियत की सच्चाई और तक़वा की शर्तों  की रिआयत से अल्लाह त’आला को राज़ी कर सकते हैं. 

इसलिए जानवर कैसा हो ये मसाइल जानने के साथ साथ कुर्बानी देने वाला कैसा हो ये जानना सबसे पहले जरूरी है। 

कुर्बानी का जानवर कैसा होना चाहिए ? 

मसलाः- कुरबानी का जानवर मोटा ताज़ा अच्छा और बे ऐब होना ज़रूरी है। अगर थोड़ा सा ऐब हो तो कुरबानी मकरूह होगी। अगर ज़्यादा ऐब है तो कुरबानी होगी ही नहीं। जैसे अन्धा, लंगड़ा, काना, बेहद, दुबला, तिहाई से ज़्यादा कान, दुम, सींग, थन वगैरह कटा हुआ, पैदाइशी बे-कान का, बीमार, इन सब जानवरों की कुरबानी जाइज़ नहीं।

कुर्बानी देने वाला मुसलमान कैसा होना चाहिए 

कुर्बानी करने वाला इंसान हराम खोर नहीं होना चाहिए गुनाहों से पाक और बे ऐब होना जरूरी है। अगर दुनियादार होगा तो कुर्बानी क़ुबूल न होगी। जैसे दिल का अंधा, पैर गुनाहों से आलूदा, हराम देखने वाला, हराम खाने वाला, सिर्फ गोस्त का पकवान खाने का लालच रखने वाला, कमजोर ईमान वाला, जबान से झूट, हंसी मजाक, गाली गलौज, ग़ीबत, चुगली करने वाला तफसील के लिए नीचे पढ़ते जाए

कुर्बानी की क़बूलियत की शर्तें 

क़ुरआन में है : (तर्जमा) अल्लाह उसी का क़ुबूल करता है जो मुत्तक़ी (परहेजगार) हो। (सूरह माईदा, आयत न. 27)

मुत्तक़ी (परहेजगारों) कौन ? 

किताब मुकाशफतुल क़ुलूब बाब न. 1 के हवाले से 

लिखते है साहबे ईमान वह है जो जिस्म के तमाम आजा के साथ अल्लाह तआला से डर रखता हो, जैसा कि फकीह अबू लैस ने फरमायाः सात बातों में अल्लाह तआला के खौफ का पता चल जाता है।

1.उस की ज़बान गलत बयानी, 

गीबत, चुगली, तुहमत, और फुजूल बोलने से बची हो और अल्लाह तआला का जिक्र करने, तिलावते कलाम पाक करने, और दीनी उलूम सीखने में लगी हो।

2. उस के दिल से दुश्मनी, बुहतान और मुसलमान भाईयों का हसद निकल जाए क्योंकि हसद नेकियों को चाट जाता है जैसा कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है- हसद नेकियों को खा जाता है जैसे आग लकड़ी को खा जाती है। जानना चाहिए कि हसद दिल की सब से घटिया बीमारियों में से एक बीमारी है और दिल की बीमारियों का इलाज सिर्फ इल्म और अमल से ही हो सकता है।

3. उस की नज़र हराम खाने पीने से और हराम लिबास वगैरह से महफूज़ रहे और दुनिया की तरफ लालच की नज़र से न देखे बल्कि सिर्फ इबरत पकड़ने के लिए उस की तरफ देखे और हराम पर तो कभी उसकी निगाह भी न पड़े जैसा कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया- जिस ने अपनी आँख हराम से भरी अल्लाह तआला कियामत के दिन उसको आग से भर देगा।

4. उसके पेट में हराम खाना न जाए। यह गुनाहे कबीरा है। हुजूर नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- बनी आदम के पेट में जब हराम का लुक्मा पड़ा तो ज़मीन व आसमान का हर फरिश्ता उस पर लानत करेगा जब तक कि वह लुक्मा उस के पेट में रहेगा और अगर उसी हालत में मरेगा तो उस का ठिकाना जहन्नम होगा।

5. हराम की तरफ हाथ न बढ़ाए बल्कि ताकत भर उस का हाथ अल्लाह की फरमांबरदारी की तरफ बढे। हज़रते कअब इब्ने अहबार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह तआला ने सब्ज मोती (जबर्जद) का महल पैदा फरमाया, उस में सत्तर हजार घर हैं और हर घर में सत्तर हज़ार कमरे हैं उस में वही दाखिल होगा जिस के सामने हराम पेश किया जाए और वह सिर्फ अल्लाह के डर की वजह से उसे छोड दे।

6. उसका कदम अल्लाह तआला की नाफरमानी में न चले बल्कि सिर्फ उसकी इताअत व खुशनूदी में रहे. आलिमों और नेकों की तरफ हरकत करे। 

7. इबादत व मुजाहिदा, इन्सान को चाहिए कि खालिस अल्लाह तआला के लिए इबादत करे, रियाकारी व मुनाफिकत से बचता रहे, अगर ऐसा किया तो यह उन लोगों में शामिल हो गया।  

तक़वा का वसीयत 

हदीस :- हजरत अबू ज़र गफ्फारी रदियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि मैनें कहा कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ! आप मुझको कोई वसीयत फ़रमायें तो आप ने फरमाया कि मैं तुम को तक़वा (यानी अल्लाह से डरते रहने) की वसीयत करता हूँ। क्योंकि यह तुम्हारे आमाल को बहुत ज़्यादा संवार देने वाली चीज़ है।(मिश्कात, जिल्द 2, सफा 415)

मगर अफ़सोस 

जो लोग मालिके निसाब नही है और उस पर कुर्बानी वाजिब नही है फिर भी गोस्त खाने के लिए 2 या 3 हज़ार कही से उपाय करके कुर्बानी देते है लेकिन वही सख्स अगर ज़कात अदा करने के लिए मालिके निसाब को पहुँच जाए फिर भी सही से ज़कात अदा नही करता क्योंकि यहां खाने का मामला नही है और ये माल का असल कुर्बानी। अगर कुर्बानी का गोस्त खाने का हुक़्म न होता तो इस दौर का 90% दुनियादार मुसलमान कुर्बानी नहीं देते इसका अंदाज़ा ज़कात देने का मामला से लगाया जा सकता है।

 

सूफ़ी अनवर रज़ा खान क़ादरी

बानी ग़ौस व ख़्वाजा व रज़ा ट्रस्ट, रांची (झारखंड)

ख़ादिम ख़ानक़ाह क़ादरी चिश्ती (रांची)

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दीन का काम बग़ैर पैसों के न होगा

दीन का काम बग़ैर पैसों से न होगा
(फतावा रज़्वीया के हवाले से)

हदीस में इरशादे मुस्तफ़ा ﷺ है कि (तर्जमा) “एक ज़माना ऐसा आएगा की दीन का काम भी बे रुपया के न चलेगा।”

हुज़ूर आला हज़रत फरमाते है कोई बाकायदा (ढंग का) आलीशान मदरसा तो आपके (मुसलमानों के) हाथ में नहीं, कोई अख़बार पर्चा आपके यहाँ नहीं, मुदर्रेसीन, वाइजीन, मुनाजेरीन, मुसन्नेफीन की कसरत बक़दरे हाजत (जितना जरूरत है) आपके (मुसलमानों के) पास नहीं, जो कर सकते (काबिल) हैं वो फारिगुल-बाली (उनके पास वक़्त) नहीं, जो फारिगुल बाली (जिनके पास वक़्त है) हैं वह अहल (क़ाबिल) नहीं, बाज़ ने खूने जिगर खाकर किताबे लिखी तो छपीं कहाँ , किसी तरह से कुछ छपा तो तक़सीम कैसे हो. दीवान नहीं, नाविल नहीं कि हमारे भाई कम पैसे के चीज को थोड़ा ज्यादा पैसा देकर शौक से खरीदें (यह सोच कर की मुसलमान भाई को ही तो दे रहा हु), यहाँ तो सर चपेटना (यानी दाम कम करा कर दीनी किताबों को भी खरीदना है), रुपया ज्यादा हो तो मुम्किन कि यह सब शिकायात रफा (खत्म) हों।

  1. अज़ीमुश्शान मदारिस खोले जाएं, बाकायदा तालीमें हों।
  2. तलबा को वज़ाइफ (स्कॉलरशिप) मिलें कि ख़्वाही नख्वाही गिरवीदह हों। (यानी चाह के भी किसी के तरफ पैसा के लिए न झुके)
  3. मुदर्रिसों की ज्यादा से ज्यादा तन्ख्वाहें उनकी कार्रवाइयों पर दी जाएं कि लालच से जान तोड़ कर (यानी जरूरत पूरा हो ताकि) कोशिश करें।
  4. तबाए तलबा (मदारिस के बच्चो) की जाँच हो जो जिस काम के ज़्यादा मुनासिब देखा जाए मकूल वज़ीफा (पेमेंट) देकर उसमें लगाया जाए। यूं उनमें कुछ मुदर्रेसीन बनाए जाएं, कुछ वाइज़ीन, कुछ मुसन्नेफीन, कुछ मुनाजेरीन, फिर तस्नीफ व मुनाज़रा में भी तौजीअ हो। कोइ किसी फन पर कोई किसी फन पर।
  5. उन में जो तैयार होते जाएं, तन्ख़्वाहें देकर मुल्क में फैलाए जाएं कि तहरीरन (लिखकर) और तक़रीरन वअज़न (बयान) व मुनाज़रतन (मुनाजरा के जरिये) दीन व मज़हब को फैलाये , जब आपके उलमाए हक़ मुल्क में फैलें उस वक़्त कौन उनकी कुव्वत का सामना कर सकता है।
  6. हिमायत मज़हब व रददे बद मज़हब में मुफीदे कुतुब व रसाइल, मुसन्निफों को नज़राने देकर तस्नीफ कराए जाएं।
  7. तस्नीफ शुदह और नए तस्नीफ रसाइल उम्दा और खुश ख़त (पम्पलेट) छाप कर मुल्क में मुफ्त शाए किए जाएं।
  8. शहर शहर में अक़ाइद व आमाल का निगरानी करने वाला कोई रहें जहाँ जिस किस्म के वाइज़, मनाज़िर या तस्नीफ की हाजत हो आपको इत्तिला दें, आप सरकूबी आदा के लिए अपनी फौजें, मैगज़ीन, रिसाले, भेजते रहें।
  9. जो हम में काबिलकार (दीनी ख़िदमत के लायक का शख्स) मौजूद हो लेकिन अपनी रोजगार के वजह से मशगूल हैं. वजा़इफ़ मुक़र्रर (पेमेंट दे) कर के फा़रिगु़ल- बाली (दीन के लिए वक़्त देने वाला) बनाए जाएं, और जिस काम में उन्हें महारत हो, लगाए जाएं।
  10. आपके मज़हबी अख़बार शाए हों और वक़्तन फ़वक़्तन हर किस्म के हिमायते मज़हब में मज़मीन तमाम मुल्क में बकीमत व बिला कीमत (फ्री) में रोज़ाना या कम अज कम हफ़्तावार पहुँचाते रहें। उसके बाद आप आगे फरमाते हैं:

मेरे (यानी आला हजरत के) ख्याल में तो यह तदाबीर हैं, रुपया होने की सूरत में अपनी कुव्वत फैलाने के अलाया गुमराहियों की ताकतें तोड़ना भी इन्शाअल्लाहुल-अजीज आसान होगा। मैं देख रहा हूँ कि गुमराहों के बहुत से लोग सिर्फ तन्ख्वाहों के लालच से जहर उगलते (यानी बातिल मसाइल बताते) फिरते हैं, उनमें जिसे दस की जगह बारह (हज़ार) दीजिए अब आपकी सी कहेगा (जो बोलना बोले जाए वही बोलेंगे) , या कम अज़ कम बलुक्मा दोख़्ता बह तो होगा।

देखिए हदीस का इरशाद सादिक है कि (तर्जमा)’आखिर जमाना में दीन का काम भी दिरहम व दीनार से चलेगा।”

और क्यों न हो कि सादिक व मज़दूक सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का कलाम है, आलिम मा काना वमा यकूनु सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की खबर है। (फतावा रज़्वीया जिल्द 12, स० 133, 134)

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Sadqa E Jariya

मरने के बाद 3 चीज़ों का सवाब
हदीस :- हज़रत अबू हुरैरा रदि़यल्लाहु तआ़ला अन्हु ने बयान किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि इन्सान जब मर जाता है तो उसके अमल का सिलसिला मुन्कतअ हो (टूट) जाता है। मगर तीन कामों का सवाबों का सिलसिला मरने के बाद भी जारी रहता है।
1. उसके सदकाऐ जारिया का सवाब।
2 उसके इल्म का सवाब कि लोगों को उससे नफा पहुँचता रहे।

3. नेक औलाद कि उसके लिए दुआ करती रहे।

तशरीह: सदका जारिया से मुराद उसकी वक्फ करदा चीज़े हैं मसलन मस्जिद व मदरसा, खानकाह, मुसाफिर खानों की इमारतें कुओं वगैरह की तामीरात या दीनी कुतुबखानों की इमारात, या दीनीं किताबों का वक्फ कर देना कि उल्माऐ किराम व तलबा उससे इल्मी फवाइद उठाते रहें या अवाम के बीच किताबे तक़सीम करना या ऑनलाइन तरीका जैसे दीनी ग्रुप, चैनल, तंजीम या वेबसाइट क़ायम करना। इल्म फैलाने से मुराद या तो शागिर्दों को पढ़ा कर तैयार कर देना या क़ौम की इस्लाह कर लिए कोई दीनी किताब तस्नीफ कर देना कि जिससे लोग दीनी फायदा हासिल करते रहें।
नेक औलाद से मुराद वह कि माँ बाप के मरने के बाद फातिहा व ईसाले सवाब करते रहें। कि मरने वाला मर गया और मरने के बाद उसके तमाम आमाले सालिहा का सिलसिला ख़त्म हो जाता है कि वह न अब नमाज़ पढ़ता है न रोजा रखता है। न सदका देता है न कोई दूसरा सवाब का काम करता है । लेकिन जिन्दगी में उसने कोई चीज़ वक्फ करदी है या कोई इल्म छोड़ कर मरा है। या नेक औलाद छोड़ कर वफात पा गया है तो वह अगरचे खुद कोई अमल नहीं कर रहा है मगर उसकी कब्र में इन चीजों का सवाब बराबर पहुँचता रहेगा।
इसलिए ज़रूरत है कि अहले दौलत मुसलमान अपनी ताकत भर जरुर कोई न कोई सदकाए जारिया करके दुनिया से सफर करें। इस ज़माने में खास तौर से मदरसों की तामीर और मज़हबी किताबों का कुतुब ख़ाना कायम करके उसको वक़्फ़ कर देना या इल्म फैलाने की नियत से किताबे तक़सीम करवाना बेहतरीन सदकाए जारिया है।
मुसलमानों को चाहिये कि अपनी औलाद को इल्मे दीन पढ़ायें ताकि इल्मे दीन सीखकर उनकी औलाद सालेह बने। और वह अपने माँ बाप के लिए ईसाले सवाब व फातिहा व दुआए मग़फ़िरत करके अपने वालिदैन की कब्रों में सवाब का जखीरा और खजाना भेजते रहें। मगर निहायत अफ़सोस रन्ज व कल्क होता है कि मालदार मुसलमान शादी ब्याह और नामवरी की फुजूल रस्मों में अपनी दौलत को खूब दिल खोलकर खर्च करते हैं मगर सवाबे आखिरत के लिए न कोई सदकाए जारिया करते हैं न दीनी कामों में अपनी दौलत लगाकर सवाबे ओखिरत की दौलत और दीन व दुनिया की बरकत हासिल करते हैं। (जवाहिरुल हदीस, अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी, पेज 26)

वाजेह रहे कि अपनी औलाद को इल्मे दीन पढ़ाना इसका अजरो सवाब बहुत बड़ा है एक हदीस में आया है कि जो शख़्स कुरआने मजीद का इल्म हासिल करके उसपर अमल करे तो कयामत के दिन उसके माँ बाप को ऐसा ताज पहनाया जायेगा जिसकी रौशनी सूरज से भी ज़्यादा अच्छी होगी। इससे अन्दाजा करलो कि खुद इल्मे कुरआन मजीद समझ बुझ कर पढ़ने वाले को जो कुरआन पर अमल करेगा अल्लाह तआला उसको कितने बड़े बडे अज़ीम अजरो सवाब से सरफाज़ फ़रमायेगा।

इस लिए दुनियादार मालदारों से तो इसकी कोई उम्मीद नहीं है मगर गरीबों को चाहिये कि वह अपने बच्चों को कॉलेज व यूनिवर्सिटी की तालीम नहीं दिला सकते तो अपने बच्चों को मदारिसे इस्लामिया या किसी बुज़ुर्ग की सोहबत में रखकर उन्हें इल्मे दीन जरुर पढ़ायें। और अजरो सवाब से मालामाल हों।
वल्लाहो तआला अअलम । (जवाहिरुल हदीस,अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी)

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Isar

ईसार
रज़ाए इलाही के पेशे नज़र दूसरों की ज़रूरत को अपनी जाती हाजत से तरजीह देना यानी खुद नही खाकर दुसरे जरूरत मंद को खिलाना, ख़ुद नही पहनकर दूसरे (दीनदार) जरूरतमन्द को पहनाना, अपना जान देकर किसी दूसरे मोमिन का जान बचाना ईसार कहलाता है। यह एक ऐसा जज़्बा है जिसका तअल्लुक दिल और नियत से है क्योंकि जब कोई अपनी ज़रूरत पसे डाल कर दूसरे की ज़रूरत को पूरा करता है तो उस वक़्त अल्लाह को बहुत रहम आता है और उस से पूरी तरह राज़ी होता है और उसका वह फेअल बारगाहे रब्बुल इज़्ज़त में बड़ा मकबूल होता है इसलिए इस्लाम में इस की बे पनाह फ़ज़ीलत है। हक़ीक़त में ईसार का माना नफ़्स और शैतान से मुक़म्मल मुखलाफ़त करना है और बातिनी जिहाद भी है।

ईसार के 2 अकसाम
1. माली ईसार, 2. बदनी ईसार

1. ईसार के मुतअल्लिक इरशादे बारी तआला है कि : (तर्जमा) और उस माल में उनका हक है, जो उन से पहले से मदीने में रहते थे।
और इस्लाम में दाखिल हो चुके हैं, जो उन की तरफ़ हिज़रत कर के आता है उस से मोहब्बत करने लगते हैं। और मुहाजिरीन को जो कुछ दिया जाये यह अपने दिल में उस की ख़्वाहिश नहीं पाते और अपने ऊपर तंगी ही क्यों न हो। उन्हें अपने से मुकद्दम रखते हैं। और जो शख़्स अपने नफ़्स के बुख्ल से महफूज़ रहे। तो ऐसे ही लोग फ़लाह पायेंगे।

इस आयात में अल्लाह तआला ने अंसार की तारीफ की है कि उन्होंने हिज़रत के मौका पर उन्हें अपने घर दिए, बाग़ दिए, खेत दिए, बीवी दिये अपने कारोबार में शामिल किया और खुद हर तरफ की तकालीफ़ बरदाश्त की मगर आने वालों को आराम पहुँचाया फिर जब बनी नुजैर की ज़मीन मुसलमान के हाथ आई तो नबी अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दो अंसारियों के सिवा बाकी सारी ज़मीन मुहाजिरीन को दे दी तो अंसार ने बसद ऐहतिराम उस फैसला को तस्लीम किया। अल्लाह त’आला को जब उन की यह आदत पसन्द आई तो मुदर्जा बाला अल्फाज़ से उनकी हौसला अफजाई की।

इस आयात के शाने नुजूल के बारे में एक रिवायत इस तरह है कि एक मिसाल तारीख़ इंसानियत पेश करने से कासिर है। अपनी भूक को मार रहा है। अपनी ख़्वाहिशात को कुचल रहा है कि एक मोमिन भाई शिक्म सैर हो जाये। भूक से बिलकते बच्चे अब सो चुके हैं माँ की मामता भी आड़े न आई कि मोमेनन न किरदार के इज़हार का मौका है। वह मोमिन ही क्या जो अपने भाई के लिए ईसार न कर सके अपनी ख़्वाहिशात अपनी तलब और अपने तबई व फितरी तक़ाज़ों पर अपने भाई की ख़्वाहिशात और तलब को तरजीह न दे सके। अंसारी की भूक माँ की मामता और ख़ानदान के आराम की ख़्वाहिश सब ठिठक कर खड़े हैं बल्कि तकाज़ाए ईमान आड़े आ गया है। मेहमान शिकम सेर हो गया। और दस्तख़्वान उठा लिया गया तो चिराग़ की लो भी ठीक हो गई। और मकान का हुजरा भी रौशन हो गया। मगर हुजरे से ज़्यादा अंसारी का सीना और उसकी नेक बख़्त बीवी का दिल नूरे ईमान से मुनव्वर था। सुबह हुई। अंसारी अपने मेहमान के साथ नमाज़ में हाज़िर हुआ। मुस्लिम शरीफ में है कि नमाज़ के बाद सरवरे कौनैन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अंसारी की तरफ मुतवज्जोह हुये और फ्रमाया रात तुम ने जिस हुस्ने सुलूक का मज़ाहिरा किया है उस से अल्लाह तआला बहुत खुश हुआ है।” (सुन्नी फजाईले आमाल)

2. ईसार अहले तक़वा के औसाफ़ का ख़ास्सा है क्योंकि मुत्तकियों के लिए ज़रूरी है कि वह अख़लास और जज़्बा ईसार के तेहत अल्लाह के दीन को सर बुलन्द करने के लिए उस की राह में ख़र्च करें। ताकि अल्लाह हर तरह से राज़ी हो।
लिहाज़ा इरशादे बारी तआला है कि।
(तर्जमा) – जहाँ तक तुम से हो सके अल्लाह से डरते रहो। और सुनो और तामील करो। और खर्च करते रहो कि यह तुम्हारे अपने ही हक में बेहतर है। और जो शख्स अपने बुख्ल तबई से बचा रहे तो ऐसे ही लोग फलाह पाने वाले हैं। (परा 8 अत्तकाबुन 16)

ईस आयत से भी जज़बाए ईसार का मफहूम वाज़ेह होता है। कि अल्लाह तआला की राह में ईसार व वासिल इंसान के लिए ही बेहतर होता इसलिए अल्लाह के ख़ास बन्दे बनने के लिए जज़बाए ईसार पर कारबन्द रहना चाहिए। क्यों कि ईसार में दीन व दुनिया की फ्लाह मुज़मर है।

3. जज़्बा ईसार का तकाज़ा है कि अल्लाह की राह में दूसरों की तकलीफ दूर करने के लिए कीमती से कीमती चीज़ देने से दरेज़ न किया जाये और दुनिया की अशया की मोहब्बत रज़ाए इलाही में रुकावट नहीं बननी चाहिए।
इरशादे बारी तआला है।
(तर्जमा) आप फ़माइये कि अगर तुम्हारे बाप और बेटे और भाई और बीबियाँ। और कबीले वाले और वह माल जो तुम ने कमाये। और वह तिजारत जिस के मन्दा पड़ जाने से डरते हो। और वह मकानात जिन को तुम पसन्द करते हो। तुम्हें अल्लाह और उस की राह में जिहाद से ज़्यादा अज़ीज़ हैं। तो जरा सब्र करो। यहाँ तक कि अल्लाह अपना हुक्म तुम पर भेजे और अल्लाह फासिकों हिदायत नहीं करता । (पारा 10 अत्तौबा 24)

इस आयत में इस तरह ईसार की तरगीब दी गई है कि अल्लाह की ख़ातिर माँ बाप औलाद और अज़ीज़ व अकारिबकी मोहब्बत को भी कुरबान करना पड़े तो कर दो। घर बार कारोबार छोड़ना पड़े तो भी छोड़ दो। क्योंकि अल्लाह की रज़ा के लिए हर उस चीज़ को तर्क करना ज़रूरी है जो रज़ाए इलाही में रुकावट बने। एक और मकाम पर ईसार के मुतअल्लिक अल्लाह तआला ने बड़े जामेअ अलफाज़ में यूँ इरशाद फ़रमाया है।

(तर्जमा) जब तक तुम अपनी प्यारी चीज़ों में से ख़र्च न करो भलाई हरगिज़ हासिल नहीं कर सकते। (पारा 45 आल इम्रान92)

इस आयत में जज़्बा ईसार की तारीफ़ बड़े उम्दा तरीके से बयान की गई है कि इंसान उस वक़्त तक इस ख़ास नेकी यानी रास्ता को हासिल नहीं कर सकता जिस से अल्लाह की ख़ास रहमत रज़ाए इलाही के लिए पसन्दीदा माल व मताअ जिस्म व जान और जाह व मनसब वगैरा के ईसार से दरेग नहीं करना चाहिए। (सुन्नी फजाईले आमाल)

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