ये न पूछो किधर जा रहा हूँ
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ
दोस्तो ! अब न आँसू बहाना
क़ब्र ही तो है असली ठिकाना
ये न समझो कि मर जा रहा हूँ
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ
सामने रू-ए-सरकार होगा
क़ब्र में उन का दीदार होगा
बस यही सोच कर जा रहा हूँ
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ
पास मेरे नहीं सोना-चाँदी
हाथ मेरे हैं दोनों ही ख़ाली
छोड़ कर माल-ओ-ज़र जा रहा हूँ
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ
दफ़्न कर के मुझे मत भुलाना
क़ब्र पर तुम मेरी आना जाना
सुन लो, लख़्त-ए-जिगर ! जा रहा हूँ
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ
मौत की याद
1. मौत को याद रखने की अहमियत
मालूम होना चाहिए के जो कोई इस बात पर यकीन रखता है के आखिर एक दिन मरना है, और क़ब्र में सोना है, मुनकर नकीर के सवालात और क़यामत बरहक़ है, और फिर जन्नत में जाना होगा या दोज़ख़ में, ऐसा शख़्स मौत को कभी नहीं भूलेगा।
और अगर दानिशमंद और अक़लमंद है तो हमेशा आज़ाद-ए-आख़िरत की तदबीर में मसरूफ रहेगा और दूसरी किसी चीज़ से वास्ता नहीं रखेगा।
चुनांचह सरवर-ए-काइनात ﷺ का इरशाद है:
“होशियार है वो शख़्स जिस ने अपने नफ़्स को रोका और ऐसा अमल किया जो मरने के बाद काम आए। और जो शख़्स मौत को बोहत ज़्यादा याद करता है वो यक़ीनन उस के तोशा की तैयारी में मसरूफ रहेगा और उस की क़ब्र वहशत के बाग़ों में से एक बाग़ बन जाएगी।”
और जो कोई मौत को भूल जाएगा, हमेशा दुनिया के मुआमलात में फंस कर ज़ाद-ए-आख़िरत से ग़ाफिल रहेगा, उस की क़ब्र दोज़ख़ के गढ़ों में से एक गढ़ा होगी। इसी वास्ते मौत का ज़िक्र करना बड़ी फज़ीलत रखता है।
हुज़ूर अकरम ﷺ का इरशाद है:
“लज़्ज़तों को मिटा देने वाली और उन को ढा देने वाली, यानी मौत को, अक्सर याद किया करो।”
मज़ीद फरमाया: “अगर चरिंदे जानवर मौत का वो अहवाल जानते होते जो तुम जानते हो, तो हरगिज़ चिकना गोश्त किसी बशर के खाने में नहीं आता, यानी सब जानवर फिक्र से लागर हो जाते।”
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा S ने हज़रत रसूल-ए-खुदा ﷺ से दरयाफ्त किया: “या रसूलल्लाह ﷺ, कोई शख़्स ऐसा भी है जिस को बगैर शहादत के शहीदों का दर्जा मिले?”
आप ने फरमाया: “हाँ, जो शख़्स दिन में बीस मर्तबा मौत को याद करे।”
मनक़ूल है के हज़रत ﷺ का गुज़र एक क़बीला पर हुआ जो बुलंद आवाज़ से हंस रहे थे। तो आप ने फरमाया: “ऐ लोगो! तुम अपनी मजलिस में उस चीज़ का ज़िक्र करो जो सारी लज़्ज़तों को खफीफ कर देती है।”
उन्होंने दरयाफ्त किया: “वो क्या चीज़ है?”
हुज़ूर ﷺ ने फरमाया: “वो मौत है।”
हज़रत अनस رضي الله عنه ने कहा है के रसूल-ए-खुदा ﷺ ने मुझ से फरमाया: “मौत को अक्सर याद किया कर, के वो तुझे दुनिया में ज़ाहिद बना देगी और तेरे गुनाह का कफ्फारा हो गी।”
हुज़ूर अकरम ﷺ ने फरमाया है: “आलिम को नसीहत करने के लिए मौत का ज़िक्र करना काफी है।”
रसूलल्लाह ﷺ के अशाब किसी शख़्स की तारीफ हुज़ूर के सामने करने लगे। हुज़ूर अकरम ﷺ ने दरयाफ्त फरमाया: “मौत का ज़िक्र उस के दिल पर क्या असर करता है?”
सहाबा इकराम رضي الله عنهم ने अर्ज़ किया: “मौत की बात तो हम ने उस के मुँह से कभी सुनी नहीं।”
हुज़ूर ﷺ ने फरमाया: “फिर तुम उस को जैसा नेक समझते हो वो वैसा नहीं है।”
हज़रत इब्न उमर رضي الله عنهما फरमाते हैं के मैं दस अशखास के साथ हुज़ूर पुर-नूर की खिदमत में हाज़िर हुआ। जमात-ए-अंसार में से एक शख़्स ने हज़रत रसूल-ए-खुदा ﷺ से दरयाफ्त किया: “सब से बड़ा दानिशमंद कौन है?”
आप ﷺ ने फरमाया: “जो मौत को ज़्यादा याद करता हो। यही वो लोग हैं जो दीन ओ दुनिया की बुजुर्गी हासिल किए हैं।”
जनाब इब्राहीम तैमी رحمت اللہ علیہ ने कहा: “दो चीज़ों ने मुझ से दुनिया की राहत छीन ली है: एक मौत की याद ने, दूसरे खुदावंद तआला के रुबरू खड़ा होने के अंदेशे ने।”
हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ رضي الله عنه की आदत थी के हर शब उलमा को जमा करते। वो हज़रात क़यामत और मौत का अहवाल बयान करते, तो तमाम लोग इस क़दर रोते जिस तरह अहल-ए-मातम रोते हैं। और हसन बसरी رحمت اللہ علیہ अपनी हर मजलिस में सिर्फ मौत, दोज़ख़ और आख़िरत ही की बात किया करते थे।
2. दिल की सख्ती का इलाज: मौत की याद
मनक़ूल है के एक औरत उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा رضي الله عنها के पास आई और कहा: “मेरा दिल बोहत सख्त है, नर्म करने की क्या तदबीर करूँ?”
हज़रत उम्मुल मोमिनीन ने फरमाया: “तू मौत को कसरत से याद किया कर, तेरा दिल नर्म हो जाएगा।” चुनांचह उस बात पर अमल करने से उस की सख्त-दिली जाती रही। वो फिर उम्मुल मोमिनीन की खिदमत में हाज़िर हुई और आप का शुक्रिया अदा किया।
हज़रत रबी’ बिन खैसम رحمت اللہ علیہ ने अपने घर में एक क़ब्र खोद ली थी और हर रोज़ कई मर्तबा उस में जा कर लेट जाते थे ताके मौत का खयाल दिल में ताज़ा रहे। उन का क़ौल था: “अगर एक दिन में एक साआत के लिए भी मौत को भूल जाऊँ तो मेरा क़लब सियाह पड़ जाएगा।”
हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ رضي الله عنه ने एक शख़्स से फरमाया: “मौत को अक्सर याद किया करो। उस के दो फायदे हैं: अगर तुम मेहनत ओ तकलीफ में मुबतला हो तो उस याद से तुम को तसल्ली होगी, और अगर फरागत ओ ऐश हासिल है तो मौत का ज़िक्र तुम्हारे ऐश को तल्ख कर देगा।”
हज़रत शेख अबू सुलेमान दारानी رحمت اللہ علیہ ने फरमाया: “मैंने अमिया हारून رحمت اللہ علیہ से पूछा: ‘क्या तुम मौत से राज़ी हो?’ उन्होंने जवाब दिया: ‘नहीं, मैं मौत नहीं चाहती।’ उन्होंने पूछा: ‘उस का सबब क्या है?’ उन्होंने कहा: ‘अगर मैं किसी बंदे की कुसूरवार होती हूँ तो उस शख़्स को देखना पसंद नहीं करती, उस के सामने ठहरने से शर्म करती हूँ। और जब के मैं गुनाहों में ग़र्क़ हूँ तो खुदावंद तआला के सामने किस तरह जा सकूँ गी?’”
3. मौत को याद करने के 3 तरीके
ऐ अज़ीज़! मौत की याद तीन तरह से हुआ करती है:
1. ग़ाफिल दुनियादार की याद:
मौत के ज़िक्र से वो राज़ी नहीं है। उस को इस बात का डर है के दुनिया के ऐश ओ आराम उस से छूट जाएंगे। बस वो मौत की शिकायत करके कहता है: “ये बुरी बला सामने खड़ी है। अफसोस के मुझे दुनिया और उस के ऐश ओ आराम को छोड़ना पड़ेगा।” इस तरह मौत का ज़िक्र करना उस को हक़ तआला की दरगाह से दूर करता है। लेकिन अगर दुनिया का ऐश उस पर कुछ तल्ख ओ नागवार है और दिल दुनिया से बेज़ार है तो मौत का याद करना फायदे से खाली नहीं होगा।
2. तौबा करने वाले का तरीका:
जिस ने गुनाहों से तौबा कर ली है, वो मौत को ना-पसंद नहीं करता और उस का ज़िक्र नागवार नहीं गुज़रता। लेकिन उस के जल्द आने से कराहत करता है। उस को इस बात का डर होता है के मुझे तोशा-ए-आख़िरत के बगैर जाना पड़ेगा। इस सबब से अगर कोई शख़्स मौत को नागवार महसूस करे और उस से कराहत करे तो उसमें कुछ क़बाहत नहीं है।
3. आरिफ का याद करना:
इस लिए वो मौत को याद करता है के दीदार-ए-इलाही का वादा मौत के बाद है। वस्ल-ए-दोस्त के वादे का वक़्त कोई नहीं भूलता, बल्के हमेशा उस के इंतज़ार में रहता है। सिर्फ इंतज़ार ही नहीं, बल्के हज़रत बिलाल رضي الله عنه ने दम-ए-मर्ग फरमाया: “दोस्त दरवेशी के वक़्त आया है।”
फिर उन्होंने मुनाजात में इस तरह कहा: “खुदाया! अगर तू इस से वाकिफ है के मेरी नज़र में दरवेशी तवानगरी से, बीमारी तंदुरुस्ती से, और मौत ज़िंदगी से बेहतर है और पसंदीदा-ए-दिलदार है, तो मुझ पर मौत की सख्ती को आसान फरमा दे ताके मैं तेरे दीदार से लज़्ज़त-अंदोज़ हो सकूँ।”
इन उमूर के सिवा एक और बड़ा दर्जा है जिस में न मौत से बेज़ारी है, न उस की तलब है, और न ताजील की ख्वाहिश है न ताखीर की आरज़ू, बल्के हक़ तआला के हुक्म पर राज़ी होना है। अपने तसर्रुफ ओ इख्तियार को छोड़ कर तस्लीम ओ रज़ा के बुलंद-तरीन मक़ाम पर पहुँचना है। और ये बात उस वक़्त हासिल होगी के मौत उस को याद आए जबके हाल ये है के मौत का खयाल अक्सर उस के दिल में नहीं आता, क्यूंके वो दुनिया में मुशाहिदा-ए-इलाही में मुस्तग़रक़ रहता है और ज़िक्र-ए-इलाही उस के दिल पर ग़ालिब होता है। उस की नज़र में मरना और जीना दोनों एक हैं, क्यूंके तमाम अहवाल में खुदा की याद और उस की मुहब्बत में मुस्तग़रक़ रहता है।
4. मौत का ज़िक्र दिल पर कैसे मुअस्सर होता है?
मालूम होना चाहिए के मौत एक अम्र-ए-अज़ीम और अम्र-ए-गिरां-माया है और खतरे से खाली नहीं है। अक्सर लोग मौत से बे-खबर हैं। अगर कभी याद भी करते हैं तो उन के दिल पर कुछ असर नहीं होता, क्यूंके दुनिया के कामों का खयाल इस क़दर होता है के किसी दूसरी बात की वहाँ गुंजाइश ही नहीं होती। इस लिए वो लोग खुदा के ज़िक्र से कभी हलावत और लज़्ज़त नहीं पाते।
पस उस की तदबीर ये है के आदमी गोशा-नशीन हो कर एक साआत के लिए अपने दिल को दुनियावी खयालात से अलग-थलग रखे, उस शख़्स की तरह जिस को एक जंगल तय करना ज़रूरी होता है। तो उस की तदबीर में वो इस तरह मुनहमिक होता है के दिल दूसरी चीज़ों से फारिग रहता है।
पस ये खल्वत-नशीन अपने दिल में खयाल करे के मौत अनक़रीब आने वाली है। मुमकिन है के मैं आज ही मर जाऊँ। अगर कोई शख़्स तुम से कहे के तुम इस अंधेरे और तारीक बाला-खाना पर जाओ, जबके तुम को ये मालूम नहीं के राह में कोई गार है या उस के रास्ते में कोई पत्थर रखा हुआ है या कुछ खतरा है, तो इस सूरत में यक़ीनन तुम खौफ़ज़दा होगे।
बस अब खयाल करो के मौत के बाद तुम्हारा क्या हाल होगा। और क़ब्र की सख्ती भी कुछ कम नहीं है। तो फिर इस बात से बे-फिक्र रहना किस तरह वाजिह हो सकता है?
बस मुनासिब और बेहतर यही है के अपने उन दोस्त अहबाब को याद करो जो मर चुके हैं और उन की सूरतों को पेश-ए-नज़र रखो और खयाल करो के दुनिया में किस कर-ओ-फर से रहते थे और किस क़दर उन के दिल मसरूर रहते थे और वो मौत से बे-खबर थे। पस नागहाँ इस बे-खबरी के आलम में मौत आई और उन के आज़ा किस तरह गल-सद गए होंगे और कीड़ों ने उन के नाक, कान और गोश्त-पोस्त को खा लिया होगा और मिट्टी में मिल के होंगे। अब उन के वुर्सा उन के माल तक़सीम करके बड़े मज़े उड़ा रहे हैं और उन की बिवियाँ दूसरे खावंदों के साथ ऐश कर रही हैं और पहले शौहरों को भूल चुकी हैं।
पस अपने हर एक गुज़रे हुए यार-आश्ना को शाहिद करो और उन की तफरीहात, हंसी-दिल लगी और ग़फलत और बड़ी-बड़ी उम्मीदों और आरज़ुओं में उन का मशग़ूल रहना शाहिद करो के वो जिन कामों में मशग़ूल रहते थे वो बीस-बीस साल में भी तमाम नहीं हो सकते थे। और उन कामों में कैसी-कैसी तकलीफ उठाते थे। उन का कफन धोबी के गाड़ पर धोया गया था और उन को उस की बिल्कुल खबर नहीं थी।
पस अपने दिल से कहो के: “मैं भी उन की मानिंद हूँ और मेरी ग़फलत उन से कुछ कम नहीं। ये तो तुम्हारी खुश-नसीबी है के ये लोग तुम से पहले मर गए ताके तुम को उन के हाल से इबरत हासिल हो।”
बुजुर्गों ने फरमाया है: “नेक-बख्त वो है जो दूसरों से इबरत हासिल करे。”
पस इंसान अपने हाथ, पाँव, आँख, उंगलियाँ और ज़बान और दूसरे आज़ा का खयाल करे के ये तमाम आज़ा एक दूसरे से जुदा हो जाएंगे और चंद रोज़ में ये बदन ज़मीन के कीड़ों की ग़िज़ा बन जाएगा। फिर तुम अपनी सूरत का खयाल करो जो क़ब्र में होगी: एक सड़ा-गला हुआ मुर्दार बन जाएगी।
ग़रज़ इस क़िस्म के खयालात दिन में एक साआत के लिए दिल में लाओ ताके दिल मौत से खबरदार रहे। जो ज़ाहिर में सरसरी तौर पर मौत को जाप करना दिल पर असर नहीं करता। इंसान हमेशा देखता है के लोग जनाज़ा ले जा रहे हैं और ये भी समझता है के इस क़िस्म के नज़ारे हमेशा होते रहेंगे, लेकिन खुद को कभी मुर्दा की हालत में खयाल नहीं करता। जो बात देखी नहीं जाती है वो कभी खयाल में नहीं आती है।
इसी वास्ते हुज़ूर अकरम ﷺ ने खुतबा में इस तरह इरशाद फरमाया: “सच बताओ, क्या ये मौत हमारे वास्ते नहीं लिखी है? और ये जनाज़े जो लोग ले जा रहे हैं, सच बताओ के क्या ये मुसाफिर हैं जो फिर जल्द ही लौट आएंगे? लोग उन को खाक में दफन करके उन की मीरास, यानी तर्का, खाते हैं और अपने हाल से ग़ाफिल रहते हैं।”
5. मौत को याद ना करने का सबब: तूल-ए-अमल
मौत को याद ना करने का सबब अक्सर तूल-ए-अमल होता है, यानी बड़ी-बड़ी लंबी आरजूएँ। ये सब खराबियाँ इस से पैदा होती हैं।
आरजूएँ कोताह करने की फज़ीलत:
जो कोई अपने दिल में ये खयाल करे के मैं मुद्दत तक जिंदा रहूँगा और मुद्दत-ए-दराज़ के बाद मुझे मौत आएगी, ऐसा शख़्स दीन का कोई काम नहीं करेगा। क्यूंके वो अपने दिल में कहता है के अभी ज़िंदगी के बोहत दिन बाकी हैं, जब चाहूँगा फुलाँ नेक काम कर लूँगा। अभी तो जो दिन ऐश ओ इशरत में गुज़र रहे हैं ये गनीमत है।
और जो कोई अपनी मौत को अपने क़रीब समझेगा वो हर तरह से ज़ाद-ए-आख़िरत की तदबीर में मसरूफ होगा। ऐसा खयाल तमाम सआदतों का मुहर्रिक और मूजिब होता है।
हुज़ूर अकरम ﷺ ने इब्न उमर رضي الله عنهما से फरमाया: “सुबह को जब तू उठे तो ये खयाल ना कर के रात में जिंदा रहा, बल्के अपनी ज़िंदगी से मौत का सामान हासिल कर, और तंदुरुस्ती से बीमारी का तोशा बहम पहुँचा, यानी बीमारी का खयाल कर। तू नहीं जानता के कल तेरा नाम हक़ तआला के नज़दीक किस गिरोह में दाखिल होगा।”
ये भी हुज़ूर अकरम ﷺ ने फरमाया है: “ऐ लोगो! तुम्हारे बारे में किसी चीज़ से इतना अंदेशनाक नहीं हूँ जितना तुम्हारी इन दो खसलतों से डरता हूँ: के तुम हिर्स की पैरवी करोगे और ज़िंदगी की उम्मीद रखो गे।”
हज़रत उसामा رضي الله عنه ने एक चीज़ इतनी खरीदी के एक माह तक काम आए। हुज़ूर ﷺ को जब ये मालूम हुआ तो इरशाद फरमाया: “उसामा उम्मीद पर बड़ा भरोसा रखता है। क़सम है उस परवरदिगार की जिस के क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है के जब मैं आँख बंद करता हूँ तो समझता हूँ के आँख बंद करने से पहले मेरी मौत आ जाएगी। और जो लुक़्मा मुँह में डालता हूँ समझता हूँ के अभी मौत आ जाएगी और वो हलक़ में रह जाएगा।”
“ऐ लोगो! अगर अक़ल रखते हो तो खुद को मुर्दा समझो। क़सम है उस परवरदिगार की जिस के दस्त-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, जिस चीज़ का तुम से वादा किया गया है वो आ कर रहेगी और उस से ना बचो गे。”
हज़रत अब्दुल्लाह इब्न मसऊद رضي الله عنهما फरमाते हैं के रसूल अकरम ﷺ ने एक मुरब्बा खींचा और उस के दरमियान एक सीधा खत और उस खत के दोनों जानिब छोटी-छोटी लकीरें खींची और उस के बाहर से एक खत खींच कर फरमाने लगे: “ये खत जो इस मुरब्बा के अंदर है, आदमी की मिसाल है। और ये मुरब्बा उस की अजल है जो उस को चारों तरफ से घेरे हुए है, इस से भाग ना सकेगा। और ये छोटी लकीरें जो दोनों तरफ हैं, आफ़तें और बलाएँ हैं जो उस के आगे खड़ी हैं। अगर बिल-फ़र्ज़ वो एक आफत से बच जाए तो दूसरी आफत से नजात ना पाएगा, यहाँ तक के मर जाए। और एक खत जो मुरब्बा के बाहर है, उस की आस और उम्मीद है के आदमी हमेशा बड़ी-बड़ी तदबीरों में लगा रहता है जो खुदा के इल्म में है और उस की अजल के बाद पूरी होंगी।”
हुज़ूर ﷺ का ये भी इरशाद है: “इंसान हर रोज़ बूढ़ा होता जाता है और दो चीज़ें उस पर जवान होती जा रही हैं: माल की हिर्स और जीने की आरज़ू।”
खबर में आया है के हज़रत ईसा علیہ السلام ने एक ज़ईफ़ शख़्स को देखा जो फाओड़ा हाथ में लिए काम कर रहा है और दुआ मांग रहा था: “या इलाही! हिर्स को इस दिल से निकाल दे।” अल्लाह तआला ने हिर्स को उस के दिल से निकाल दिया। वो ज़ईफ़ शख़्स फाओड़ा हाथ से रख कर सो गया। एक साआत के बाद फिर उठा और मुनाजात की: “या इलाही! उसको हिर्स अता कर。” तब वो पीर-बा-साल उठ कर फिर काम करने लगा।
हज़रत ईसा علیہ السلام ने उस से पूछा: “ये क्या बात थी?” उस ने जवाब दिया: “मेरे दिल में ये खयाल आया के मैं मेहनत कब तक करूँ गा? बूढ़ा हो गया हूँ और अब जल्द मरने वाला हूँ। इस वजह से मैंने फाओड़ा रख दिया, यानी काम छोड़ दिया। फिर दोबारा ये खयाल दिल में पैदा हुआ के मौत आने तक रोटी खाना, यानी तआम, ज़रूरी है, इस लिए दूसरी दुआ की।”
हुज़ूर अकरम ﷺ ने सहाबा इकराम رضي الله عنهم से दरयाफ्त किया: “क्या तुम जन्नत में जाना चाहते हो?” उन्होंने जवाब दिया: “जी हाँ, हम चाहते हैं।”
हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फरमाया: “तुम हिर्स को कम कर दो और मौत की सूरत अपने सामने हमेशा रखो और हक़ तआला से बोहत ज़्यादा शर्म करो。”
मनक़ूल है के किसी शख़्स ने अपने भाई को खत लिखा जिस में ये तहरीर था: “दुनिया ख्वाब है और आख़िरत बेदारी। और इन दोनों के दरमियान मौत है। और जिस आलम में हम हैं वो परेशान ख्वाब ओ खयाल है。”
हिर्स के असबाब:
ऐ अज़ीज़! मालूम होना चाहिए के इंसान तवील ज़िंदगी को दो वजहों से अपने दिल में क़रार देता है, यानी चाहता है: एक नादानी और दूसरी वजह दुनिया की मुहब्बत।
लेकिन जब दुनिया की मुहब्बत ग़ालिब आई तो मौत ने महबूब दुनिया को उस से छीन लिया। इस वजह से इंसान मौत से खुश नहीं और ये मरना उस की तबीयत के खिलाफ है। और जो चीज़ मुखालिफ़-ए-तबा हो, इंसान हमेशा उस से हज़र करता है और खुद से भुलाता है। और हमेशा उस चीज़ के मुखालिफ खयाल जो उस की आरज़ुओं के मुताबिक़ हो, में लगा रहता है।
बस हमेशा वो ज़िंदगी, माल, औलाद, फरज़ंद और दुनिया के सामान को समझने लगता है के ये दाइमी है और मौत को, जो उस की तमा के बिल्कुल खिलाफ है, भूल जाता है। अगर कभी इत्तेफ़ाकन मौत की याद भी आई तो कहता है: “अभी जल्दी क्या है? बहुत दिन अभी ज़िंदगानी के बाकी हैं। आइंदा मौत का तोशा फराहम कर लूँगा।”
बड़े बेटे तक सब्र करना चाहिए। फिर जब बड़ा हो जाता है तो कहता है: “ज़ारा और ज़िंदगी बाकी रहे के मेरी ये ज़मीन पानी से सैराब हो जाए ताके दिल रोज़ी की फिक्र से फारिग हो जाए, ताके इबादत की लज़्ज़त हासिल हो। और फुलाँ दुश्मन ने जो सर उठाया है उस को ठीक कर दूँ।”
ग़रज़ इस तरह से ढील दिए जाता है। एक शुग़ल से फारिग हो कर दस और कामों में मशग़ूल हो जाता है। ये अहमक़ ये नहीं समझता के दुनिया के कामों से किसी ने फराग हासिल नहीं की है, सिवाये उस के के दुनिया से दस्तबरदार हो जाए। और ये नादान ये समझता है के किसी ना किसी वक़्त मैं इस से फारिग हो जाऊँगा। इस तरह रोज़ ताखीर करता चला जाता है, आखिर कार यकायक मौत आ जाती है और हसरतें दिल की दिल ही में रह जाती हैं।
इसी वजह से अक्सर अहल-ए-दोज़ख़ की फरयाद और पशेमानी इस्तिग़फार करने के सबब से होगी के उन्होंने अमल-ए-खैर में ताखीर की। और ताखीर और ढील का सबब दुनिया की मुहब्बत और आख़िरत से ग़फलत है।
हुज़ूर अकरम ﷺ ने फरमाया है: “जिस चीज़ को तू चाहता है उस को दोस्त रख, लेकिन आखिर कार वो तुझ से छीन ली जाएगी。”
नादानी का नतीजा ये है के आदमी अपनी जवानी पर भरोसा करे और इतना ना समझे के बुढ़ापे से पहले ही मर जाएगा। हज़ारों बच्चे मर जाते हैं। शहर में जो बूढ़े कम नज़र आते हैं उस की वजह यही है के बुढ़ापे की उम्र को लोग बहुत कम पहुँचते हैं।
और दूसरी बात ये के नादान तंदुरुस्ती की हालत में मौत-ए-मुफाजात को अपने से दूर समझता है। इतना नहीं जानता के अचानक मर जाना तो शाज़ ओ नादिर है, लेकिन अचानक बीमार होना नादिर नहीं। के तमाम बीमारियाँ अचानक ही आती हैं, तो उस बीमारी से बीमार कमज़ोर मर जाना मुमकिन है।
बस अकलमंद को चाहिए के मौत की सूरत हमेशा पेश-ए-नज़र रखे, उस धूप की तरह जो उस पर पड़ रही हो, उस साए की तरह नहीं जो उस के आगे चलता है और ये उस को नहीं पा सकता।
हिर्स के दर्जे:
हिर्स के दर्जों और मर्तबों के ऐतबार से लोग मुख्तलिफ हैं। कोई तो ऐसा होगा जो हमेशा दुनिया में रहना चाहता होगा। चुनांचह हक़ तआला का इरशाद है: “तुम में कोई ख्वाहिशमंद है के हजार साल तक जिये。” और कोई ऐसा होगा के बुढ़ापे की आरज़ू रखता है। और कोई ऐसा होगा के उस को एक साल से ज़्यादा जीने की उम्मीद न हो और कल दूसरे बरस की तदबीर ना करे। कोई ऐसा होगा के एक दिन से ज़्यादा जीने की उम्मीद न हो और कल की तदबीर और फिक्र ना करे।
हज़रत ईसा علیہ السلام ने फरमाया है: “कल की रोज़ी जमा मत कर, क्यूंके अगर ज़िंदगी बाकी है तो रिज़्क भी बाकी है। और अगर हयात बाकी नहीं है तो दूसरों की ज़िंदगी के वास्ते तू रंज ओ मेहनत ना उठा。”
और कोई ऐसा होगा के एक साआत भी जिंदा रहने की उस को उम्मीद न हो। चुनांचह हुज़ूर अकरम ﷺ पानी मौजूद होते तयम्मुम फरमा लेते के मुबादा पानी लाने से क़ब्ल ही मौत वाक़े हो जाए।
और कोई ऐसा होगा के लोगों ने उन से दरयाफ्त किया: “मौत की हकीकत क्या है?” उन्होंने जवाब दिया: “जिस चीज़ से बहरा-मंद हुआ, मैंने समझ लिया के आइंदा फिर उस से नफा-अंदोज़ नहीं हो सकूँ गा。”
हज़रत अस्वद हज़रमी رضي الله عنه नमाज़ के वक़्त हर तरफ देखते थे। लोगों ने उन से दरयाफ्त किया: “आप किसे देखते हैं?” उन्होंने जवाब दिया: “मलिक-उल-मौत को देख रहा हूँ के किस तरफ से आएगा。”
अल-ग़रज़, इस बात में बंदों की हालत यकसाँ नहीं है। जो कोई फ़क़त एक माह जीने की उम्मीद रखता है वो उस से अफज़ल है जो चार दिन ज़िंदगी की उम्मीद रखता है। और उस की मिसाल इस से ज़ाहिर है के एक शख़्स के दो भाई परदेस में हैं: एक भाई के एक माह में वापस आने की उम्मीद है और दूसरे की साल भर बाद। एक माह में जो आने वाला है उस के वास्ते ये भाई तैयारियाँ करता है और दूसरे भाई के आमद में ताखीर करता है।
बस इसी तरह हर कोई खुद को हिर्स ओ हवा से दूर खयाल कर सकता है। लेकिन हवा ओ हिर्स में मक़सूद तलब्ब-ए-आख़िरत के अलावा ये है के इंसान अपने दम को गनीमत जाने और कार-ए-खैर में जल्दी करे।
चुनांचह हुज़ूर अकरम ﷺ का इरशाद है: “ऐ लोगो! पाँच चीज़ों को पाँच चीज़ों से पहले गनीमत समझो: जवानी को बुढ़ापे से पहले, तंदुरुस्ती को बीमारी से पहले, तवानगारी को मुफलिसी से पहले, इतमीनान को परेशानी से पहले, और ज़िंदगी को मौत से पहले।”
हुज़ूर अकरम ﷺ ने ये भी इरशाद फरमाया है: “दो नेमतें ऐसी हैं जिन की क़द्र अक्सर लोगों को नहीं है: एक तंदुरुस्ती, दूसरे जमीअत-ए-खातिर।”
हुज़ूर अकरम ﷺ जब कभी किसी सहाबी رضي الله عنهم से ग़फलत मुशाहिदा फरमाते तो उन से पुकार कर फरमाते: “मौत आई तो सआदत लाई या शक़ावत लाई?”
हज़रत हुज़ैफा رضي الله عنه ने फरमाया है: “हर सुबह ये पुकार-पुकार कर कहती है: ‘ऐ लोगो! कुछ दरपेश है, कुछ दरपेश है। कूच दरपेश है।’”
शेख दाऊद ताई को लोगों ने देखा के नमाज़ पढ़ने के लिए दौड़ते हुए जा रहे हैं। लोगों ने पूछा: “इतनी जल्दी किस लिए है?” उन्होंने फरमाया: “लश्कर शहर के दरवाज़े पर मेरे मुंतज़िर है।” यानी क़ब्रिस्तान के मुर्दे, जब तक मुझे ना ले जाएँ यहाँ से नहीं हटेंगे।
नक़ल है के हज़रत अबू मूसा अशअरी رضي الله عنه अपनी आखिरी उम्र में बड़ी रियाज़त करते थे। लोगों ने कहा: “अगर आप इस सख्त रियाज़त में कुछ नरमी करते तो क्या मुज़ाइका है?” उन्होंने जवाब दिया: “जब घोड़े को आखिरी मरहला में दौड़ाते हैं तो वो अपना तमाम ज़ोर लगा देता है। इसी तरह ये वक़्त मेरी उम्र का आखिरी मैदान है। क़यामत क़रीब है, इबादत में कुसूर नहीं कर दूँगा।”
6. सकरात-ए-मौत और जानकनी
मालूम होना चाहिए के अगर अकलमंद शख़्स को सकरात-ए-मौत के अलावा और कोई खतरा दरपेश होता तो भी उस को लाज़िम था के सकरात का खौफ दिल में रख कर दुनिया के ऐश से बेज़ार रहता।
क्यूंके उस को अगर इस बात का डर हो के एक तिलंग सिपाही उस के घर के अंदर घुस कर उस को काटने वाला है, तो डर के बाइस ख्वाब ओ खोर से जी उचाट हो जाएगा। हालाँके तिलंग का आना मश्कूक ओ मुश्तबह है, और मलिक-उल-मौत का आना और रूह कब्ज़ करना यकीनी बात है। और मौत का सदमा उस तिलंग के ग़ाज़ की निस्बत से बहुत ज़्यादा शदीद और मोहीब होगा। लेकिन ग़फलत के सबब से लोग इस से नहीं डरते।
तमाम बुज़ुर्गान-ए-दीन इस बात पर मुत्तफिक हैं के
जान-कंदनी की तकलीफ तलवार से किसी को टुकड़े-टुकड़े कर डालने की अज़ीयत से ज़्यादा सख्त है। क्यूंके ज़ख्म की अज़ीयत का सबब ये होता है के जहाँ ज़ख्म लगता है वहाँ की रूह को अज़ीयत पहुँचती है, और ज़ाहिर है के ज़ख्म की जगह पर तलवार रूह को नहीं देखती। आग से जलने का दर्द इस वास्ते ज़्यादा होता है के उस की जलन तमाम अज्जा में सरायत कर जाती है।
और जान-कंदनी की अज़ीयत उन रूह में, जो बदन के तमाम अज्जा में सरायत कर जाती है, ज़ाहिर होती है। और सकरात के वक़्त आदमी बे-ताकती के सबब से इस वास्ते खामोश रहता है के ज़बान उस की सख्ती से गूंग हो जाती है और अक़ल ब-जा नहीं रहती। ये सख्ती बस वही मालूम कर सकता है जिस ने उस की अज़ीयत उठाई है, या नूर-ए-नबुव्वत की बदौलत उस के वुकू से पहले ही उस की अज़ीयत का इल्म है।
चुनांचह हज़रत ईसा علیہ السلام ने फरमाया: “ऐ हवारियो! तुम दुआ मांगो के हक़ तआला जान-कंदनी मुझ पर आसान फरमाए। के मुझे मौत का इतना खौफ है के मैं इस खौफ से मर जाऊंगा।”
हुज़ूर अकरम ﷺ ने इस वक़्त ये दुआ मांगी थी: “इलाही! मुहम्मद ﷺ पर सकरात-ए-मौत को आसान फरमा।”
हज़रत आयशा رضي الله عنها ने फरमाया है: “जिस शख़्स को सकरात में आसानी हो, उस की खूबी यानी अंजाम की मुझे उम्मीद नहीं। क्यूंके हुज़ूर अकरम ﷺ की सकरात की सख्ती मैंने अपनी आँखों से देखी है। उस वक़्त आप फरमा रहे थे: ‘या इलाही! इस रूह को तू हड्डियों और रगों से निकाल रहा है, ये सख्ती मुझ पर आसान फरमा दे।’”
और हुज़ूर علیہ السلام ने सकरात ओ जान-कंदनी की तकलीफ का अहवाल यूँ बयान फरमाया है: “सकरात का आलम तलवार के तीन सौ ज़ख्म का सा है।” ये भी आप ﷺ ने फरमाया है: “बहुत आसान मौत की मिसाल गोखरू के काँटे जैसी है जो पाँव में चुभ जाए तो फिर उस का निकालना आसानी से मुमकिन नहीं है।”
हुज़ूर अकरम ﷺ एक बीमार के पास, जो हालत-ए-नज़ा में था, तशरीफ ले गए और फरमाया: “के मुझे उस की सख्ती की खबर है। कोई रग बदन में ऐसी ना होगी जिस में अलग-अलग दर्द ना होता हो।”
हज़रत अली رضي الله عنه ने फरमाया: “ऐ लोगो! जंग करो ताके दुश्मन के हाथ से मारे जाओ। क्यूंके तलवार के हजार ज़ख्म सकरात की सख्ती से, जो बिस्तर-ए-इलालत पर होती है, तुम्हारे ऊपर आसान है।”
मनक़ूल है के बनी इसराईल की एक जमात का गुज़र किसी क़ब्रिस्तान पर हुआ। उन की दुआ से अल्लाह तआला ने एक मुर्दा को जिंदा कर दिया। वो उठा और बोला: “ऐ लोगो! मुझ से क्या चाहते हो? मेरी मौत को पचास साल गुज़र चुके हैं, लेकिन अब तक जान-कंदनी की सख्ती मुझे याद है।”
एक सहाबी رضي الله عنه ने फरमाया: “के जब किसी मोमिन के मर्तबे में कुछ बाकी रह जाता है जिसे वो अपने अमल से हासिल नहीं कर सका होता, तो हक़ तआला सकरात-ए-मौत को उस पर सख्त फरमा देता है ताके वो इस तरह उन दरजात को हासिल करे। और अगर किसी काफिर ने नेकी की है तो उस की जज़ा में सकरात को उस पर आसान कर देता है ताके उस का कुछ हक़ खुदावंद तआला के ज़िम्मा ना रहे।”
और हदीस शरीफ में आया है: “मौत-ए-मुफाजात में मोमिन की राहत और काफिर की हसरत है।”
एक और हदीस में आया है के जब मूसा علیہ السلام की मौत का वक़्त आया तो हक़ तआला ने उन से दरयाफ्त किया: “ऐ मूसा! सकरात में तेरा क्या हाल है?” उन्होंने फरमाया: “ऐसी हालत है जैसे किसी जिंदा परिंदे को आग में भूनते हों, जिस में ना उड़ने की कुदरत है और ना मरने की ताके इस सख्ती से नजात पा ले।”
हज़रत उमर رضي الله عنه ने कअब अल-अहबार से दरयाफ्त किया: “जान-कंदनी की सख्ती कैसी होती है?” उन्होंने जवाब दिया: “उस की मिसाल ऐसी है के काँटों से भरी हुई एक शाख को किसी के बदन में दाखिल कर दिया जाए और उस का एक काँटा एक रग में चुभ गया हो, फिर कोई बहुत ताकतवर शख़्स उस शाख को बाहर खींचे।”
नज़ा के आलम में तीन हैबतें
नज़ा के आलम में तीन हैबतें इंसान को दरपेश होती हैं:मलिक-उल-मौत की दरावनी सूरत:
हदीस शरीफ में आया है के इब्राहीम علیہ السلام ने मलिक-उल-मौत से कहा: “मैं चाहता हूँ के मैं तुम को उस सूरत में देखूँ जिस सूरत में तुम गुनाहगारों की रूह कब्ज़ करते हो।”
मलिक-उल-मौत ने कहा: “आप कभी इस की ताब नहीं ला सकेंगे।”
आप ने कहा: “नहीं, तुम मुझे दिखलाओ।”
तब मलिक-उल-मौत ने अपनी वो सूरत आप के सामने पेश की के एक काला-कलूटा, गंदे बालों वाला सामने खड़ा है, जिस का लिबास भी काला है, आग और धुआँ उस के मुँह से निकल रहा है। इब्राहीम علیہ السلام उस को देखते ही बेहोश हो कर गिर पड़े। जब दोबारा होश में आए तो मलिक-उल-मौत अपनी पहली शक्ल में आप के सामने आए। तब इब्राहीम علیہ السلام ने फरमाया: “ऐ मलिक-उल-मौत! अगर गुनाहगार को फक़त तेरी सूरत ही नज़र आ जाए तो उस का अज़ाब ही उस के लिए बहुत है।”
मालूम होना चाहिए के अल्लाह के नेक बंदे इस हैबत का सामना नहीं करते, के मलिक-उल-मौत को वो अच्छी सूरत में देखते हैं। अगर बिल-फ़र्ज़ वो उस के बाद क़ब्र में कुछ राहत ना भी पाएँ तो मलिक-उल-मौत की वो अच्छी सूरत उन के लिए काफी है।
मनक़ूल है के सुलेमान علیہ السلام ने मलिक-उल-मौत से दरयाफ्त किया: “के तुम मख़्लूक के मुआमला में अदल से काम क्यूँ नहीं लेते? किसी को दुनिया से जल्द ले जाते हो और किसी को बहुत मुद्दत तक दुनिया में छोड़ देते हो।”
उन्होंने कहा: “के ये बात मेरे इख्तियार में नहीं है। हर एक के नाम का इजाज़त-नामा मुझे दिया जाता है और मैं उस हुक्म के मुताबिक़ अमल करता हूँ।”
हज़रत वहब बिन मुनब्बिह رحمت اللہ علیہ ने कहा है के एक दिन किसी बादशाह ने सवारी के इरादे से लिबास पहनना चाहा। नौकरों ने तरह-तरह के लिबास हाज़िर खिदमत किए। उस ने उन में से सब से बेहतर लिबास पहना। बहुत से घोड़े हाज़िर किए गए थे, उन में से एक बहुत अच्छा घोड़ा सवारी के लिए इंतिखाब किया। उस पर सवार हो कर बड़ी शान ओ शौकत से बाहर निकला, तकब्बुर के बाइस किसी तरफ नज़र उठा कर नहीं देखता था।
इस अस्ना में मलिक-उल-मौत ने एक भूले लिबास वाले दरवेश की सूरत में उस के पास आ कर सलाम किया। बादशाह ने जवाब नहीं दिया। तब दरवेश ने उस की लगाम पकड़ ली। बादशाह ने कहा: “ऐ फकीर! लगाम छोड़ दे। शायद तुझे मालूम नहीं के मैं बादशाह हूँ।”
उस ने कहा: “मुझे तुझ से काम है।”
बादशाह ने कहा: “अच्छा ठहर, मैं घोड़े से नीचे उतरूँ।”
दरवेश ने कहा: “उतरने की फुर्सत नहीं है। इसी वक़्त वो काम चाहता हूँ।”
बादशाह ने जुच हो कर कहा: “बता क्या काम है?”
तब उस ने बादशाह के कान में कहा: “के मैं मलिक-उल-मौत हूँ और इस लिए आया हूँ के अभी तेरी रूह कब्ज़ करूँ।”
ये सुनते ही बादशाह का रंग फीका हो गया और बात करने की भी ताकत ना रही। बा-मुश्किल तमाम कहा: “इतनी मोहलत मुझे दे दो के मैं घर जा कर ज़न ओ फरज़ंद से रुखसत हो लूँ।”
मलिक-उल-मौत ने कहा: “ये मुमकिन नहीं है।” ग़रज़ उस वक़्त घोड़े ही पर बादशाह की रूह कब्ज़ कर ली और बादशाह मुर्दा हो कर घोड़े से गिर पड़ा।
और मलिक-उल-मौत वहाँ से रुखसत हो कर राह में एक और मोमिन को देखा। मलिक-उल-मौत ने कहा: “मुझे तुम से एक राज़ की बात कहनी है।”
पूछा: “वो क्या है?”
कहा: “के मैं मलिक-उल-मौत हूँ।”
उस ने जवाब दिया: “मरहबा, मरहबा! मैं तो बहुत दिनों से तुम्हारे इंतज़ार में था। मुझे तुम्हारा आना बहुत अज़ीज़ है। लो मेरी जान हाज़िर है, कब्ज़ कर लो।”
मलिक-उल-मौत ने कहा: “अगर तुम को कुछ काम है तो पहले उस को कर लो।”
मर्द-ए-मोमिन ने जवाब दिया: “के मुझे अपने परवरदिगार के देखने से ज़्यादा कोई ज़रूरी काम नहीं है।”
तब मलिक-उल-मौत ने कहा: “अच्छा जिस हालत में तुम्हारी मरज़ी हो उस हालत में तुम्हारी रूह कब्ज़ करूँ।”
मर्द-ए-मोमिन ने जवाब दिया: “ज़ारा ठहर जाओ। वुज़ू करके नमाज़ पढ़ता हूँ, तुम सज्दा की हालत में रूह कब्ज़ कर लेना।” चुनांचह मलिक-उल-मौत ने ऐसा ही किया।
शेख वहब बिन मुनब्बिह ने ये रिवायत भी नक़ल की है के एक बहुत मगरूर बादशाह था। मलिक-उल-मौत उस की रूह कब्ज़ करके आसमान पर ले गए। फरिश्तों ने उन से पूछा: “ऐ मलिक-उल-मौत! कभी तुम को रूह कब्ज़ करते वक़्त रहम भी आया?”
उन्होंने कहा: “हाँ, एक हामिला औरत जंगल में थी। उस के बच्चा पैदा हुआ और मुझे हुक्म जारी हुआ के उस औरत की रूह कब्ज़ करूँ। चुनांचह उस औरत की रूह कब्ज़ करके बच्चा को तबाही के आलम में छोड़ दिया। उस औरत के मुसाफिर होने और उस बच्चा की तन्हाई और कसम-पुरसी पर मुझे रहम आ गया।”
मलाइका ने मलिक-उल-मौत से कहा: “के तुम ने उस बादशाह को भी देखा जिस की मानिंद कोई दूसरा बादशाह इस रू-ए-ज़मीन पर नहीं था?”
उन्होंने कहा: “हाँ, देखा है।”
मलाइका ने कहा: “के ये वही लड़का था जिस को तुम ने सेहरा में बे-यार ओ मददगार छोड़ दिया था।”
मलिक-उल-मौत ने कहा: “सुबहान अल्लाह! हक़ तआला किस क़दर मेहरबान है।”
किसी सहाबी رضي الله عنه से मरवी है के शाबान की पंद्रह तारीख को मलिक-उल-मौत के हाथ में एक नामा दिया जाता है और उस साल जिस-जिस की रूह कब्ज़ करना होती है उस पर तहरीर होता है। उन में कोई घर तामीर करा रहा होता है, और कोई शादी करता है, और कोई लड़ने-झगड़ने में मशग़ूल होता है। उन सब अजल-रसीदा लोगों के नाम उस में तहरीर होते हैं।
आमाश رحمت اللہ علیہ ने कहा है के मलिक-उल-मौत हज़रत सुलेमान علیہ السلام की महफिल में गए और उन के नुदमा में से एक नदीम को घूर कर देखने लगे। जब वो बाहर गए तो उस नदीम ने हज़रत सुलेमान علیہ السلام से फरमाया: “के ये शख़्स जो मुझे यूँ घूर रहा था कौन था?”
हज़रत सुलेमान علیہ السلام ने फरमाया: “ये मलिक-उल-मौत थे।”
नदीम ने अर्ज़ किया: “के शायद वो मेरी रूह कब्ज़ करना चाहते हैं। आप हवा को हुक्म दीजिए के वो मुझे हिंदुस्तान की सरज़मीन पर पहुँचा दे, जब मलिक-उल-मौत फिर यहाँ आएंगे तो मौजूद ना पाएंगे।”
सुलेमान علیہ السلام ने नदीम की बार-खातिर से हवा को ऐसा ही हुक्म दिया। जब वो फरिश्ता फिर आया तो सुलेमान علیہ السلام ने उस से कहा: “के तुम ने मेरे फुलाँ मुसाहिब को घूर कर क्यूँ देखा था?”
उन्होंने कहा: “के मुझे बारगाह-ए-इलाही से हुक्म हुआ था के मैं उस की रूह हिंदुस्तान में कब्ज़ करूँ। और वो शख़्स यहाँ बैत-उल-मुकद्दस में मौजूद था। मैंने खयाल किया के एक साआत में ये शख़्स हिंदुस्तान किस तरह पहुँच सकेगा? लेकिन जब मैं हिंदुस्तान पहुँचा तो मैंने उस को वहाँ मौजूद पाया। मैं निहायत मुतअज्जिब हुआ और मैंने उस की रूह कब्ज़ कर ली।”
मक़सूद इन हिकायातों से ये है के तुम को मालूम हो के मलिक-उल-मौत से छुपना मुमकिन नहीं है।
दो फरिश्तों के देखने की हैबत:
दूसरी हैबत उन दो फरिश्तों के देखने की है के हर एक इंसान पर मुवक्किल हैं। आया है के मौत के वक़्त ये दोनों फरिश्ते इंसान को नज़र आते हैं। अगर वो बंदा नेक होता है तो ये कहते हैं: “अल्लाह तेरा भला करे! हमारे सामने तुम ने बहुत सी बंदगी की है और हम को खुश रखा है।” और अगर बंदा गुनाहगार होता है तो कहते हैं: “अल्लाह तेरा भला ना करे! तुम ने हमारे सामने बहुत सी गुनाह और बद-कारियाँ की हैं।” उस वक़्त मय्यित की आँख आसमान की तरफ होती है और उस की पुतलियाँ नीचे नहीं आती हैं, इस हैबत की वजह से।अपना मुकाम देखना:
तीसरी हैबत ये है के इंसान मौत के वक़्त अपनी जगह और अपना मुकाम बेहिश्त में या दोज़ख़ में देखता है। तब मलिक-उल-मौत नेक बंदा से कहता है: “ऐ खुदा के दोस्त! तुझे जन्नत की बिशारत देता हूँ।” और गुनाहगार से कहते हैं: “ऐ खुदा के दुश्मन! तुझे दोज़ख़ की खबर सुनाता हूँ।”
बस इस बात का ग़म जान-कंदनी की सख्ती से ज़्यादा होता है। खुदावंद तआला से पनाह मांगनी चाहिए। और इन हैबतों से, जो दुनिया में नज़र आती हैं, क़ब्र की मुसीबत और क़यामत की सख्ती इस से भी कहीं ज़्यादा होगी।
क़ब्र का मुर्दे से कलाम करना
हुज़ूर रसूल-ए-खुदा ﷺ ने इरशाद फरमाया है के जब मय्यित को क़ब्र में उतारते हैं तो क़ब्र कहती है: “ऐ इब्न-ए-आदम! तेरा बुरा हो। तू किस चीज़ पर मुझे भूल गया था? क्या तू नहीं समझता था मैं मेहनत का घर हूँ, अंधेरी जगह और तन्हाई का मुकाम हूँ? तू किस ग़फलत में था? तेरा गुज़र क़ब्रिस्तान में होता था, हैरान हो कर तू एक-एक क़दम आगे रखता था, एक पीछे। बस अगर वो मुर्दा नेकोकार होता है तो कोई और उस को जवाब देता है के: ‘ऐ क़ब्र! तू ये क्या कहती है? ये शख़्स सालिह था, अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुनकर करता था।’ तब क़ब्र कहेगी: ‘अगर ऐसा है तो मैं इस पर बाग़ बन जाऊंगी।’ तब उस का बदन नूरानी बन जाता है और उस की रूह आसमान की तरफ जाती है।”
हदीस शरीफ में वारिद है के जब मुर्दा को क़ब्र में उतारते हैं और फरिश्ते अज़ाब देते हैं तो उस के आस-पास के मुर्दे उस से कहते हैं: “ऐ हमारे पीछे आने वाले! तू हम से पीछे रह गया था और हम तुझ से पहले आए थे। तू ने हम को देख कर इबरत क्यूँ नहीं हासिल की? क्या तू ने नहीं देखा के हम यहाँ आ गए और हमारे अहवाल खत्म हुए? तुझे तो मोहलत मिली थी, जो भला और अच्छा काम हम नहीं कर सके थे तू ने वैसा काम क्यूँ नहीं किया?” इसी तरह ज़मीन के तमाम कोशों से आवाज़ आए गी: “ऐ ज़ाहिर दुनिया पर फरेफ्ता! तू ने उन लोगों के हाल से इबरत क्यूँ नहीं हासिल की जो तुझ से पहले मर गए थे और तेरी मानिंद ग़ाफिल थे?”
एक हदीस में आया है के जब नेक बंदा को क़ब्र में उतारते हैं, उस के नेक आमाल उस को घेर लेते हैं और उस को अज़ाब से बचाते हैं। जब अज़ाब के फरिश्ते बाईं तरफ से आते हैं तो नमाज़ सामने आ कर कहती है: “मैं तुझे नहीं आने दूंगी, के ये शख़्स अल्लाह तआला के वास्ते नमाज़ें पढ़ता था।” और जब विसार की तरफ से आते हैं तो रोज़ा कहता है: “मैं तुझे नहीं आने दूंगा, के ये शख़्स अल्लाह के लिए बहुत भूखा-प्यासा रहा है।” और जब बदन की तरफ से आते हैं तो हज और जिहाद कहते हैं: “हम तुझे नहीं आने देंगे, क्यूंके इस ने अपने जिस्म पर अल्लाह की राह में बहुत तकलीफ उठाई है।” और जब हाथ की तरफ से आते हैं तो सदक़ा ओ खैरात कहते हैं: “इसे अज़ाब ना दो, क्यूंके इस हाथ से इस ने बहुत सा सदक़ा दिया है।” तब अज़ाब के फरिश्ते कहते हैं: “तुझे मुबारक हो।” उस के बाद रहमत के फरिश्ते आते हैं और उस की क़ब्र में बेहिश्ती फ़र्श ला कर बिछाते हैं और क़ब्र को उस पर कुशादा कर देते हैं, और जहाँ तक नज़र जाती है वहाँ तक गौर कुशादा हो जाती है। फिर वो बेहिश्त से एक क़ंदील लाते हैं जिस से क़यामत के दिन तक क़ब्र में नूर रहता है।
हज़रत अब्दुल्लाह इब्न उबैद ने फरमाया है के हज़रत रसूल ﷺ ने इरशाद फरमाया है: “के मुर्दा को क़ब्र में उतारते हैं तो वो उन लोगों के पाँव की आवाज़ को सुनता है जो जनाज़े के साथ आए हैं। और कोई उस से बात नहीं करता मगर क़ब्र बोलती है और कहती है: ‘ऐ शख़्स! क्या मेरे हाल और मेरी फिशार की खबर तुझ से लोग बार-बार ना कहते थे? तू ने मेरे वास्ते क्या तैयारी की?’”
मुनकर नकीर के सवालात
हुज़ूर पुर-नूर ﷺ ने फरमाया के जब आदमी मरता है तो दो फरिश्ते आते हैं, काले मुँह, आँखें नीली। एक का नाम मुनकर और दूसरे का नाम नकीर है। फिर ये मय्यित से पूछते हैं: “रसूल-ए-आखिर-उज़-ज़मान ﷺ के बारे में तू क्या कहता है?” अगर मुर्दा मोमिन है तो जवाब देता है: “के वो खुदा के बंदा और उस के रसूल हैं। और मैं गवाही देता हूँ के खुदा एक है और मुहम्मद मुस्तफा ﷺ उस के रसूल हैं।” ये कहते ही ज़मीन तूल और अर्ज़ में सत्तर-सत्तर गज़ कुशादा हो जाती है और उस को रौशन ओ पुर-नूर करके कहते हैं: “सो जा।” इस तरह जैसे दुल्हा सोता है, ऐसा सो के तुझे कोई बेदार ना कर सके सिवाये उस के जो अज़ीज़ क़रीब हो।
अगर मुर्दा मुनाफिक है तो कहेगा: “मैं मुहम्मद मुस्तफा ﷺ को नहीं जानता। हाँ, लोगों से सुना था वो उन के बारे में कुछ कहते थे, मैं भी कुछ कहता था।” पस ज़मीन को हुक्म होगा: “के इस मुर्दा को दबा।” वो ऐसा दबाएगी के उस की दोनों तरफ की पसलियाँ एक दूसरे से मिल जाएंगी। और वो इसी तरह क़यामत तक अज़ाब में रहेगा।
हुज़ूर अकरम ﷺ ने हज़रत उमर رضي الله عنه से फरमाया: “ऐ उमर رضي الله عنه! तुम खुद को कैसा पाते हो जबके तुम मर जाओ और तुम्हारे लिए क़ब्र खोद दी जाए, चार गज़ लंबी, सवा गज़ चौड़ी। उस के बाद तुम को नहलाए, पुचारे। और दो शख़्स तुम्हारे पास आएँ, काले मुँह, काले बाल, उन की आँखें बिजली की मानिंद रौशन, उन के बाल ज़मीन से लगते हुए हों गे। वो अपने दाँतों से क़ब्र की मिट्टी तलपट कर के तुम को पकड़ते और हिलाते हों गे।”
हज़रत उमर رضي الله عنه ने फरमाया: “परवाह नहीं, मैं उन का जवाब दूंगा।”
एक और हदीस में है के दो जानवर को काफिर की क़ब्र में भेजते हैं, दोनों बहरे और अंधे होते हैं। हर एक के हाथ में लोहे का गुर्ज़ होगा जिस का सर इतना बड़ा होगा जितना उस दौल का जिस में ऊँट को पानी पिलाते हैं। वो जाएँ और काफिर को क़यामत तक उस गुर्ज़ से मारेंगे। ना उन के आँख है जिस से देख सकें और उन को रहम आए, और ना कान के उस की फरयाद सुन सकें।
हज़रत आयशा رضي الله عنها ने फरमाया है: हुज़ूर अकरम ﷺ ने इरशाद फरमाया: “क़ब्र हर एक मय्यित को दबाती है। अगर कोई शख़्स फिशार-ए-क़ब्र से बचता तो वो साद बिन मुआज़ رضي الله عنه होते।”
हज़रत अनस رضي الله عنه ने कहा है के हज़रत ज़ैनब رضي الله عنها बिन्त-ए-रसूल अकरम ﷺ ने जब वफात पाई तो हुज़ूर ﷺ ने उन को क़ब्र में उतारा। आप का चेहरा निहायत मुतग़य्यर हुआ। और जब आप बाहर तशरीफ ले आए तो मिजाज-ए-मुबारक बहाल हुए। आप से दरयाफ्त किया: “या रसूलल्लाह ﷺ! आप के तगय्युर-ए-मिजाज का क्या सबब था?” फरमाया: “के मैंने क़ब्र के फिशार और अज़ाब को जान लिया था। मुझे ग़ैब से मालूम हुआ के खातून ज़ैनब पर उन को आसान कर दिया गया है। ब-वुजूद इस के उस की घूँट ने उस को इतना दबाया के उस की आवाज़ दवाब्बे जानवर सुनते थे।”
हुज़ूर ﷺ ने ये भी इरशाद फरमाया के क़ब्र में काफिर को अज़ाब इस तरह होता है के 99 अज़दहे उस पर भेजे जाते हैं, और एक अज़दहा नौ सर वाला होता है। ये उस को काटते हैं और उस पर फंकार मारते हैं, और ये सिलसिला क़यामत तक जारी रहेगा।
हुज़ूर अकरम ﷺ ने ये भी इरशाद किया है: “क़ब्र आख़िरत की पहली मंजिल है। अगर आसान गुज़र जाए तो जो अज़ाब के बाद होगा वो भी आसान होगा। और अगर ये मंजिल कठिन और दुशवार हो तो अज़ाब जो उस के बाद है वो सख्त-तर होगा।”
ऐ अज़ीज़! मालूम होना चाहिए के अज़ाब-ए-क़ब्र के बाद नफखा-ए-सूर की हैबत, रोज़-ए-क़यामत की हैबत, रोज़-ए-क़यामत की दराजी, उस की गर्मी और पसीना में डूब जाना, उस के बाद गुनाहों की पुर्सिश की हैबत है। जो उस के बाद नामा-ए-आमाल के बाइस हुई उस की हैबत है। उस के बाद उस की रुसवाई की हैबत है जो उस नामा-ए-आमाल की वजह से होगी। उस के बाद मीज़ान की हैबत है के नेकियों का पल्ला भारी रहता है या गुनाहों का। उस के बाद हक़दारों और मुद्दईयों की फरयाद की हैबत है और उन के सवाल ओ जवाब का धड़का है। फिर पुल-सिरात की हैबत है। फिर दोज़ख़ की हैबत है और वहाँ के फरिश्तों की अज़ीयत, तौक ओ ज़ंजीर, थोड़ा और साँप-बिच्छू वगैरह के अज़ाबों की हैबत है।
और ये अज़ाब दो तरह के हैं: एक जिस्मानी और दूसरे रूहानी। जिस्मानी अज़ाब का बयान “अहया-उल-उलूम” के आखिर में तफसील से किया गया है, और जो दलाइल इस बारे में बयान किए गए हैं हम ने उन को बयान किया है। और मौत की हकीकत, रूह की माहियत का अहवाल जो मौत के बाद होता है, उनवानात कायम करके लिखा है। जो कोई अज़ाब-ए-जिस्मानी की तफसील मालूम करना चाहते हैं वो “अहया-उल-उलूम” में मुतालिआ करें। और रूहानी अज़ाब का बयान उस के उनवान के तहत किया गया है। अब यहाँ दोबारा ज़िक्र करना तवालत का मूजिब था, पस हम इस पर इकतिफा करते हैं।
ख्वाब में मुर्दों के अहवाल
और इस बाब के आखिर में बुज़ुर्गान-ए-दीन ने जिन मुर्दों का अहवाल ख्वाब में देखा है, हम तहरीर करेंगे। क्यूंके जिंदों को मुर्दों का अहवाल कश्फ-ए-बातिन से मालूम होता है, ख्वाब में या बेदारी में। लेकिन हवास-ए-ज़ाहिरी से उस का इल्म मुमकिन नहीं है। क्यूंके भाईयों ऐसे आलम में गए हैं के सारे हवास को उन का हाल मालूम करने की ताकत नहीं है, जिस तरह कान रंग से बे-खबर है।
और बातिन की आँख का खुलना इस लिए ज़रूरी है के वो उस आलम के मुसाफिरों को देख सके। लेकिन जो इस ज़ाहिरी और मुशग़ला दुनिया के सबब से वो खासियत मख्फी रहती है, जब नींद के ग़ालिब हो जाने से इंसान इशगाल-ए-दुनिया से आज़ादी पाता है और मुर्दों की मानिंद हो जाता है, तो उन का अहवाल उन पर ज़ाहिर ओ मकशूफ हो जाता है।
उन हज़रात की इसी खासियत के सबब से मुर्दों को हमारी खबर होती है, के वो हमारे नेक आमाल से शाद और हमारे गुनाहों से गमगीन होते हैं। ये बात अहादीस-ए-सहीहा से साबित है।
और हकीकत ये है के उन को हमारी खबर और उन की खबर हम को लौह-ए-महफूज़ के वास्ते से होती है। क्यूंके हमारा और उन का हाल लौह-ए-महफूज़ में तहरीर है। जब आदमी का दिल वो लौह-ए-महफूज़ के साथ एक निसबत पैदा हो जाती है तो वो ख्वाब में मुर्दों का हाल लौह-ए-महफूज़ के ज़रिये से मालूम करता है। और जब मुर्दे साहिब-ए-निसबत हों तो वो हमारा हाल मालूम करते हैं।
लौह-ए-महफूज़ की मिसाल एक आइना की सी है जिस में तमाम अश्या की सूरतें जल्वा-गर होती हैं। आदमी की रूह भी आइना की तरह है और मुर्दे की रूह भी उसी तरह है। बस जिस तरह एक आइना में दूसरे आइना का अक्स पड़ता है, इसी तरह लौह-ए-महफूज़ पर लिखी हुई बात हमारे और मुर्दों के आइना-हा-ए-दिल पर जल्वा-गर होती है।
तुम ये ना समझ लेना के लौह-ए-महफूज़ एक जिस्म है जो मुरब्बा लकड़ी या बाँस या किसी और चीज़ का बना हुआ है, जिस को ज़ाहिर की आँख से देख सकते हैं और वो अहवाल जो उस में तहरीर हैं उन को पढ़ सकें। अगर तुम उस की मिसाल मालूम करना चाहते हो तो उस को अपने बातिन में तलाश करो। के हक़ तआला ने तुम में सारी मख़्लूक का नमूना पैदा किया है, ताके उस के ज़रिये से तुम सारी काइनात को मालूम कर सको। जबके तुम खुद अपनी ज़ात से बे-खबर हो, दूसरे को किस तरह पहचानोगे?
लौह-ए-महफूज़ का नमूना क़ारी का दिमाग़ है जिस को सारा क़ुरान अज़बर है। गोया उस में तहरीर है। वो उस में क़ुरान को, उस की सुतूर को और हुरूफ को देखता है और पढ़ता चला जाता है। अब अगर कोई शख़्स ऐसे दिमाग़ को रेज़ा-रेज़ा करके चश्म-ए-जाहिर से उस को देखे तो उस को उस में कहीं भी क़ुरान तहरीर किया हुआ नज़र नहीं आएगा।
पस लौह-ए-महफूज़ में इसी तरह से चीज़ें तहरीर हैं। चूंके उस में बे-निहायत ओ बे-शुमार अश्या तहरीर हैं और मनकूश हैं, और चश्म की बसारत महदूद है, ज़ाहिर है के ना-मुतनाही को मुतनाही में किस तरह महसूस नुकूश में तहरीर किया जा सकता है। बस उस का खत और उस की तख्ती, उस का क़लम और लिखने वाला हाथ, इन सब में कोई भी तुम्हारे आज़ा के मानिंद नहीं है। जिस तरह उस का कातिल तुम से मुशाबेह नहीं है। बल्के यहाँ तो ये मुआमला है के घर का जो कुछ भी है सिवाये मालिक के से है मुशाबेह।
इस तमाम गुफ्तगू से मक़सूद ये है के मुर्दों को हमारे हाल की और हम को उन की खबर होती है, इस को तुम मुहाल मत समझो। मुर्दों को अच्छे और बुरे हाल में देखना इस बात की दलील है के वो जीते हैं, राहत में हैं या अज़ाब में। दुनिया से जो गुज़र गए वो नीस्त नहीं हुए हैं और मरे नहीं हैं, जैसा के हक़ तआला का इरशाद है: “और तुम उन को मुर्दा गुमान ना करो जो राह-ए-खुदा में मारे गए, बल्के वो जिंदा हैं अपने परवरदिगार के पास, और उन को रोज़ी दी जाती है। और इस पर शादमान हैं जो कुछ उन के रब्ब ने अपने फज़्ल से अता किया है।”
मुर्दों के अहवाल जो ख्वाब में मकशूफ हुए:
हुज़ूर अकरम ﷺ ने इरशाद फरमाया है: “जिस ने मुझे ख्वाब में देखा उस ने सच्चा देखा, क्यूंके शैतान मेरी सूरत नहीं बना सकता।”
हज़रत उमर رضي الله عنه ने फरमाया के हुज़ूर अकरम ﷺ को मैं ने ख्वाब में देखा के मुझ से ना-खुश हैं। मैं ने दरयाफ्त किया: “हुज़ूर! इस ना-खुशी का मौजिब क्या है?” तो हुज़ूर علیہ التحیۃ و السلام ने फरमाया: “क्या तू रोज़ा की हालत में अपनी बीवी के बोसे लेने से परहेज़ नहीं कर सकता था?” फिर कभी हज़रत उमर رضي الله عنه ने ऐसा नहीं किया। अगरचह ये बोसा हराम नहीं, लेकिन उस का ना करना ही औला है। लेकिन ऐसे दक़ाइक़ में सिद्दीक़ों को मुआफ नहीं किया जाता है, अगरचह दूसरों को मुआफ कर दिया जाता है।
हज़रत अब्बास رضي الله عنه फरमाते हैं के मुझे हज़रत उमर رضي الله عنه से बड़ी मुहब्बत थी। आप की वफात के बाद मैंने चाहा के आप को ख्वाब में देखूँ। एक साल के बाद मैंने आप को ख्वाब में देखा, आप अपनी आँखें मल रहे थे। फरमाया: “के मैं अभी हिसाब से फारिग हुआ हूँ।”
हज़रत अब्बास رضي الله عنه फरमाते हैं: “मैंने अबू लहब को ख्वाब में देखा, आग में जल रहा था। मैंने पूछा: ‘तेरा क्या हाल है?’ कहा: ‘के हमेशा से अज़ाब में गिरफ्तार हूँ, सिर्फ पीर की शब अज़ाब नहीं होता, जिस में रसूलल्लाह ﷺ पैदा हुए थे। तो जब मैंने ये बिशारत-ए-विलादत सुनी, तो एक लौंडी को खुशी से आज़ाद कर दिया था। उस की जज़ा पीर की रात को मुझ पर अज़ाब नहीं होता।’”
हज़रत उमर इब्न अब्दुल अज़ीज़ رضي الله عنه फरमाते हैं के मैंने हुज़ूर अकरम ﷺ को ख्वाब में देखा के आप हज़रत अबू बक्र ओ उमर رضي الله عنهما के साथ तशरीफ फरमा हैं। मैं भी उस मजलिस में हाज़िर था। इतने में हज़रत अली رضي الله عنه को देखा के घर से बाहर आ कर वो फरमाने लगे: “वल्लाही! मुझे मेरा हक़ दिलवा दिया गया।” उस वक़्त हज़रत अमीर मुआविया رضي الله عنه बाहर आए और कहा: “वल्लाही! मुझे बख्श दिया गया।”
नक़ल है के इब्न अब्बास رضي الله عنهما ने एक दिन हज़रत हुसैन رضي الله عنه की शहादत से क़ब्ल नींद से उठ कर “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन” पढ़ा। लोग कहने लगे: “क्या हादसा हो गया?” उन्होंने कहा: “के हज़रत हुसैन رضي الله عنه को दुश्मनों ने शहीद कर दिया。” लोगों ने पूछा: “आप को कैसे मालूम हो गया?” तो उन्होंने कहा: “के मैंने रसूल-ए-खुदा ﷺ को ख्वाब में देखा के आप के साथ एक आबगीना खून से भरा हुआ है। हुज़ूर अकरम ﷺ ने मुझ से फरमाया: ‘तू ने देखा के मेरी उम्मत के लोगों ने मेरे साथ क्या सुलूक किया? मेरे फरज़ंद को ना-हक़ मार डाला। ये उस का और उस के रफीक़ों का खून है। इस को हक़ तआला के पास दाद-ख्वाही के लिए ले कर जा रहा हूँ।’” उस ख्वाब के चौबीस दिन के बाद हज़रत हुसैन رضي الله عنه की शहादत की खबर आ गई।
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه को किसी शख़्स ने ख्वाब में देखा तो पूछा: “के आप हमेशा ज़बान की तरफ इशारा करके कहते थे: ‘मेरे सामने बहुत से काम रखे हैं।’” आप ने फरमाया: “हाँ, इस ज़बान से ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कहा था, तो बेहिश्त मेरे सामने रखी गई है, बेहिश्त अता की गई है।”
शेख यूसुफ बिन अल-हुसैन को किसी ने ख्वाब में देखा और दरयाफ्त किया: “के हक़ तआला ने आप के साथ क्या मुआमला किया?” कहा: “उस ने रहमत से नवाज़ा।” पूछा: “किस अमल के बाइस?” उन्होंने कहा: “के सिर्फ इसी बात से के मैंने सच्चाई में कभी मज़ाक को शामिल नहीं किया।”
शेख मंसूर इब्न इस्माइल फरमाते हैं के मैंने शेख अब्दुल्लाह बज़्ज़ाज़ को ख्वाब में देखा तो उन से दरयाफ्त किया: “के हक़ तआला ने आप के साथ क्या मुआमला किया?” उन्होंने कहा: “मैंने हर एक गुनाह का इक़रार किया, उस को मुआफ कर दिया गया। एक गुनाह का इक़रार करते हुए उस के हुज़ूर मुझे शर्म आई। मुझे ऐसे खड़ा किया गया के मेरे मुँह का तमाम गोश्त गल कर ज़मीन पर गिर पड़ा।” मैंने पूछा: “वो कौनसा गुनाह था जिस की ये सज़ा है?” उन्होंने कहा: “के एक खूबसूरत गुलाम को मैंने बा-नज़र-ए-शहवत देखा था।”
शेख अबू जाफर सद्दलान कहते हैं के मैंने हुज़ूर अकरम ﷺ को ख्वाब में देखा था। एक गिरोह दरवेशों, यानी सुफियों, का साथ बैठा था। दो फरिश्ते आसमान से उतरे, एक के हाथ में आफ़ताबा था और दूसरे के हाथ में तश्त। हुज़ूर अकरम ﷺ ने दस्त-हा-ए-अक़दस धोए, फिर तमाम दरवेशों ने। उस के बाद मेरे सामने भी तश्त रखा गया ताके मैं भी हाथ धो लूँ। उन दरवेशों में से एक ने कहा: “इस के हाथ पर पानी ना डालो के ये इन दरवेशों में से नहीं है।” ये सुन कर मैंने कहा: “या रसूलल्लाह ﷺ! आप का इरशाद है के जो कुछ इस क़ौम को दोस्त रखता है वो उन्हीं में शुमार होता है, और मैं इन दरवेशों और सुफियों को दोस्त रखता हूँ।” ये सुनकर रसूल अकरम ﷺ ने फरमाया: “इस के हाथ भी धुलाओ, ये भी उन में से है।”
शेख मुजम्मि’ رحمت اللہ علیہ को ख्वाब में देखा तो दरयाफ्त किया: “के क्या मुआमला पेश आया? उन के साथ कैसा बरताव किया गया?” तो शेख मुजम्मि’ رحمت اللہ علیہ ने कहा: “के दुनिया और आख़िरत की ज़्यादा भलाई उन के हिस्से में आई。”
हज़रत रबी’ رحمت اللہ علیہ इब्न अबी औफा को ख्वाब में किसी ने देखा तो उन से दरयाफ्त किया: “के आप ने तमाम आमाल से बढ़ कर किस चीज़ को पाया?” उन्होंने जवाब दिया: “दरगाह-ए-रज़ा ब-हुक्म-ए-खुदा, सब से बेहतर अमल है।”
जरीर बिन मज़ूर कहते हैं के मैंने इमाम अज़ई को ख्वाब में देखा तो मैंने उन से दरयाफ्त किया: “के मुझे बेहतरीन अमल से आगाह फरमाइए ताके मैं उस के हुसूल की कोशिश करूँ।” उन्होंने कहा: “मैंने आलिमों के दर्जे से बुलंद कोई दर्जा नहीं देखा। लेकिन इस से भी एक बुलंद दर्जा है, और वो गमगीन रहने वालों का है, जो दुनिया का ग़म ओ अंदोह करते रहते हैं।” इब्न जैद رحمت اللہ علیہ एक बूढ़े शख़्स थे। इस ख्वाब के बाद से उन्हें हमेशा रोता पाया गया, जब तक वो जिंदा रहे, यहाँ तक के रोते-रोते उन की बसारत खत्म हो गई, यानी दम-ए-मर्ग तक रोते ही रहे।
इमाम इब्न उयैना फरमाते हैं के मैंने अपने भाई को ख्वाब में देखा। मैंने दरयाफ्त किया: “के अल्लाह तआला ने तुम्हारे साथ क्या मुआमला किया?” उन्होंने कहा: “के अल्लाह तआला ने मेरे हर उस गुनाह को बख्श दिया जिस पर मैंने इस्तिग़फार कर लिया था। लेकिन जिस गुनाह पर इस्तिग़फार नहीं की थी, उस को मुआफ नहीं फरमाया।”
ज़ुबैदा खातून رحمت اللہ علیہا, ज़ौजा-ए-हारून रशीद, को ख्वाब में देखा। दरयाफ्त किया: “के अल्लाह तआला ने तुम्हारे साथ क्या मुआमला किया?” उन्होंने फरमाया: “के मैंने एक क़दम पुल-सिरात पर रखा, तो दूसरा क़दम मेरा जन्नत में था।”
शेख अहमद बिन अल-हवारी رحمت اللہ علیہ फरमाते हैं के मैंने अपनी बीवी को ख्वाब में देखा। उस की ऐसी हसीन शक्ल थी के किसी ने भी ऐसी हसीन शक्ल नहीं देखी होगी। उस के चेहरे पर एक नूर चमक रहा था। मैंने उस से पूछा: “के तेरे चेहरे का ये नूर और ये ताबानी किस सबब से है?” उस ने जवाब दिया: “के तुम को याद होगा के फुलाँ दिन तुम अल्लाह तआला की याद में खूब गिर्या ओ ज़ारी कर रहे थे।” मैंने कहा: “हाँ, मुझे याद है।” मेरी बीवी ने कहा: “तुम्हारे वही आँसू मैंने अपने मुँह पर मल लिए थे। ये उसी का नूर है।”
शेख कनानी का दस्तरख्वान फरमाते हैं: “मैंने शेख जुनैद का दस्तरख्वान को ख्वाब में देखा तो मैंने दरयाफ्त किया: ‘के खुदावंद तआला ने तुम्हारे साथ क्या मुआमला किया?’ फरमाया: ‘के मुझ पर रहमत फरमाई, और मेरी वो तमाम रियाज़त ओ इबादत बरबाद गई, उन से मुझे कुछ भी हासिल ना हुआ। बस नमाज़ की बरकतें काम आईं जो मैं रात में पढ़ता था।’”
किसी शख़्स ने ज़ुबैदा खातून को ख्वाब में देखा और दरयाफ्त किया: “के अल्लाह तआला ने तुम को क्या जज़ा दी?” उन्होंने कहा: “के इन चार कलिमात के पढ़ने के बाइस मुझ पर रहमत फरमाई।”
हज़रत बिश्र हाफी رحمت اللہ علیہ को किसी ने ख्वाब में देखा कर उन से पूछा: “के अल्लाह तआला ने तुम्हारे साथ क्या मुआमला किया?” उन्होंने फरमाया: “मुझ पर रहमत फरमाई और फरमाया: ‘मुझ से इस क़दर तरसा और खौफ़-ज़दा रहते हुए तुझे शर्म नहीं आती थी?’”
शेख अबू सुलेमान दारानी رحمت اللہ علیہ को ख्वाब में देखा और दरयाफ्त किया: “कैसे गुज़री?” फरमाया: “अल्लाह तआला ने मुझ पर रहमत फरमाई। और किसी चीज़ ने मुझे इतना नुक़सान नहीं पहुँचाया जितना अहल-ए-दीन में अंगुश्त-नुमाई बने रहने से, यानी लोग मुझ पर अंगुश्त-नुमाई करते और कहते के ये साहिब-ए-ईमान है।”
शेख अबू सईद खर्राज़ رحمت اللہ علیہ फरमाते हैं के मैंने इब्लीस को ख्वाब में देखा। मैंने अपना असा उठाया ताके उसे मारूँ, लेकिन उस ने कुछ भी परवाह नहीं की, यानी ज़रा भी ना डरा। हातिफ-ए-ग़ैबी ने उस वक़्त आवाज़ दी: “के शैतान ऐसे दंडों से नहीं डरता है। ये तो उस नूर-ए-ईमान से डरता है जो दिल में होता है।”
शेख मसूक़ी رحمت اللہ علیہ फरमाते हैं के मैंने शैतान को ख्वाब में देखा तो मैंने कहा: “के तुझे मर्दों से शर्म नहीं आती?” उस ने कहा: “के ये जवान मर्द कहाँ हैं? अगर ये मर्द होते तो मैं उन के साथ इस तरह ना खेलता जिस तरह बच्चे बंगले के साथ गेंद खेलते हैं। जवामर्द तो वो लोग हैं जिन्होंने मुझे कमज़ोर ना-तवाना कर दिया है, यानी हज़रात-ए-सुफिया।”
शेख अबू सईद खर्राज़ رحمت اللہ علیہ फरमाते हैं के मैं दिमश्क़ में था के रसूल-ए-खुदा ﷺ को ख्वाब में देखा के हज़रत-ए-वाला तशरीफ ला रहे हैं और अबू बक्र और हज़रत उमर رضي الله عنهما पर सहारा लिए हुए हैं। मैं एक शेर पढ़ रहा था और सीना पर उंगली मारता जाता था। ये देख कर हुज़ूर अंवर ﷺ ने फरमाया: “के इस का शर्र उस के खैर से ज़्यादा है।”
हज़रत शिबली رحمت اللہ علیہ को किसी ने ख्वाब में देखा, अभी उन के इंतिक़ाल को सिर्फ तीन दिन हुए थे। पूछा: “के अल्लाह तआला ने आप के साथ क्या मुआमला किया?” तो उन्होंने फरमाया: “के मेरा बहुत सख्त हिसाब लिया गया। मैं तो ना-उम्मीद हो गया था के मेरी ना-उम्मीदी देख कर मुझ पर रहमत नाज़िल फरमा दी।”
हज़रत सुफ्यान सौरी का दस्तरख्वान को ख्वाब में देखा तो पूछा: “कहिए कैसे गुज़री?” उन्होंने फरमाया: “के अल्लाह तआला ने मुझ पर रहमत फरमाई।” उन से पूछा गया: “के अब्दुल्लाह बिन सालिह पर क्या गुज़री?” उन्होंने कहा: “के उन को दो मर्तबा रोज़ाना दीदार-ए-इलाही से नवाज़ा जाता है।”
मालिक बिन अनस رضي الله عنه को ख्वाब में देखा कर पूछा: “के अल्लाह तआला ने आप के साथ क्या किया?” उन्होंने फरमाया: “के महज़ इस कलिमा की बदौलत मुझ पर रहमत फरमाई जो मैंने हज़रत उस्मान इब्न अफ्फान رضي الله عنه से सुना था: जब वो कोई जनाज़ा देखते तो फरमाते: ‘आगाह हो वो अल्लाह जो जिंदा है, जिस के लिए मौत नहीं है।’”
जिस रात में शेख हसन बसरी رحمت اللہ علیہ का इंतिक़ाल हुआ, उसी शब ख्वाब में देखा गया के आसमान के दरवाज़े खोल दिए गए और ये मुनादी की जा रही थी: “के हसन बसरी ने अल्लाह का दीदार किया और शादमान हुए।”
शेख जुनैद رحمت اللہ علیہ ने इब्लीस को ख्वाब में देखा तो कहा: “तुझे मर्दों का मुक़ाबला करने से शर्म नहीं आती?” तो उस ने कहा: “ये मर्द कब हैं? मर्द तो वो हैं जो शुनीज़िया में हैं, जिन्होंने मुझे इतना लागर कर रखा है।” शेख जुनैद ने फरमाया: “के सुबह को मैं जामिआ-ए-शुनीज़िया जाने के लिए घर से निकला तो मैंने उन लोगों को देखा के सर बा-ज़ानू बैठे हुए हैं, और मुझ से फरमाया: ‘के इस मलऊन इब्लीस के क़ौल पर घुरूर ना करना।’”
अतबत-उल-आलम ने एक हूर-ए-बेहिश्ती को ख्वाब में देखा, बहुत ही हुस्न ओ जमाल के साथ। उस हूर ने कहा: “ऐ अतबा! मैं तुम पर आशिक़ हूँ। देखो ऐसा कोई काम ना करना जिस के बाइस मैं तुम को ना मिल सकूँ।” अतबा ने कहा: “के मैं तो दुनिया को तीन तलाक़ें दे चुका हूँ। अब मैं उस के पास ना फटकूंगा के फिर उस में मशग़ूल रह कर तुम को हासिल करने की कोशिश करूँ।”
शेख अबू अय्यूब सजिस्तानी ने एक मुफ़्सिद शख़्स का जनाज़ा देखा। ये अपने बाला-खाना पर चढ़ गए ताके उस की नमाज़-ए-जनाज़ा ना पढ़ें। उसी रात उन्होंने उस मुर्दा को ख्वाब में देखा तो पूछा: “के अल्लाह तआला ने तेरे साथ क्या किया?” उस ने कहा: “के रहमत फरमाई, और कहा: ‘अबू अय्यूब से कह दो, यानी रहमत-ए-इलाही के खज़ाने अगर तुम्हारे हाथ में होते तो तुम बा-बीना-ए-बुख्ल उस में से कुछ खर्च ना करते।’”
जिस रात शेख दाऊद ताई قُدِّسَ سِرُّهُ ने वफात पाई, उसी रात किसी ने उन को ख्वाब में देखा के फरिश्ते आ-जा रहे हैं। पूछा: “आज ये कैसी रात है?” फरिश्तों ने कहा: “के आज रात दाऊद ताई का इंतिक़ाल हुआ है। बेहिश्त को उस के लिए सजाया जा रहा है।”
शेख अबू सईद शह्हाम رحمت اللہ علیہ ने कहा: “के शेख सुहैल मालिक को मैंने ख्वाब में देखा तो मैंने उन्हें पुकारा: ‘ऐ ख्वाजा!’ उन्होंने जवाब दिया: ‘के मुझे ख्वाजा ना कहो।’ मैंने पूछा: ‘के आप के वो सब आमाल क्या हुए?’ उन्होंने कहा: ‘के मुझे उन से कुछ ना फायदा पहुँचा, जो बूढ़ी औरतें मुझ से दरयाफ्त करती थीं।’”
अबी बिन सुलेमान ने कहा के इमाम शाफि’ई رحمت اللہ علیہ को मैंने ख्वाब में देखा। मैंने पूछा: “के अल्लाह तआला ने आप के साथ क्या सुलूक किया?” फरमाया: “के मुझे सुनहरी कुर्सी पर बिठाया गया, और मुझ पर दुर ओ मोती ब-जबर निछावर किए गए।” इमाम शाफि’ई ने फिर फरमाया: “के मुझे एक मुश्किल दरपेश हुई जिस के बारे में मुझे बड़ी फिक्र थी। ख्वाब में एक शख़्स आया और उस ने मुझ से कहा: ‘ऐ मुहम्मद इदरीस! तुम ये दुआ पढ़ो।’ सुबह को जब मैं उठा और मैंने ये दुआ पढ़ी तो दिन चढ़े वो मुश्किल हल हो गई। तुम इस दुआ को कभी फरामोश ना करना।”
शेख उस्मान अल-आलाम को किसी ने ख्वाब में देखा। पूछा: “के हक़ तआला ने आप के साथ क्या मुआमला किया?” तो उन्होंने कहा: “के तुम्हारे घर की दीवार पर जो ये दुआ लिखी हुई थी, उस दुआ के पढ़ने के सिला में मुझे ये मर्तबा दिया।” ख्वाब देखने वाला शख़्स कहता है के जब सुबह को मैं बेदार हुआ तो मैंने अपने घर की दीवार पर मतबल गुलाम के खत में ये दुआ लिखी हुई थी।
खतमा-ए-बाब
मौत के ज़िक्र का इस क़दर बयान यहाँ काफी है। हम ने किताब किमिया-ए-सआदत को इस पर खतम किया। और ऐसे नेक बंदों से जो इस का मुताला करें और इस से नफा-बज़ीर हों, हम को उम्मीद है के मुसन्निफ को दुआ-ए-खैर से याद करेंगे, यानी दुआ-ए-खैर में फरामोश नहीं करेंगे। और हक़ तआला से मुसन्निफ की मगफिरत की दुआ मांगेंगे।
ताके अगर बयान में कुछ तक़सीर हुई हो, या तकल्लुफ और रिया का खयाल उस के दिल में आया हो, तो हक़ तआला अपने फज़्ल ओ करम से और इन मुताला करने वाले हज़रात की दुआ की बरकत से उस को बख्श दे, और इस किताब की तालीफ के सवाब से उस को महरूम ना करे। के कोई नुक़सान उस से अज़ीम-तर ना होगा के कोई शख़्स मख़्लूक को खुदा की तरफ बुलाए, और खुद रिया और अग़राज़-ए-नफसानी की वजह से हक़ तआला की दरगाह से दूर रहे।
खत्म शुद उर्दू तर्जुमा किमिया-ए-सआदत
अस-सलाम अलैकुम