Iman Ki





ईमाने मुजमल 

امَنتُ بِاللَّهِ كَمَا هُوَ بِأَسْمَائِهِ وَصِفَاتِهِ وَقَبِلْتُ جَمِيعَ أَحْكَامِهِ إِقْرَارُ بِاللَّسَانِ وَتَصْدِيقُ بِالْقَلْبِ 

तर्जुमा :– मैं ईमान लाया अल्लाह पर जैसा कि वोह अपने नामों और अपनी सिफ्तों के साथ है और मैं ने कुबूल किये उस के तमाम अहकाम मुझे इस का ज़बान से इकरार है और दिल से यकीन ।

 

ईमाने मुफस्सल (7 बातों पर ईमान लाना)
امَنتُ بِاللهِ وَمَلئِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَالْقَدْرِ خَيْرِهِ وَشَرِّهِ مِنَ اللَّهِ تَعَالَى وَالْبَعْثِ بَعْدَ الْمَوْتِ

“आमन्तु बिल्लाहि व मलाइकतिही व कुतुबिही व रूसुलिही वल यौमिल आखिर वल क़दरि खैरिही व शर्रिही मिनल्लाहि त’आला वल बअसि बा’दल मौत“
तर्जुमा :– मैं ईमान लाया अल्लाह पर और उस के फरिश्तों पर। और उसकी किताबों पर। और उसके रसूलों पर और आखि़रत के दिन पर । और उस पर कि अच्छी और बुरी तक़दीर का खालिक़ अल्लाह है। और मौत के बाद उठाऐ जाने (कियामत) पर ।

1. ईमान बिल्लाह (अल्लाह पर ईमान)

ईमान बिल्लाह (अल्लाह त’आला पर ईमान)
अल्लाह पर ईमान लाने का यह मतलब कि अल्लाह त’आला को मौजूद वाजिबुल वुजूद वाहिद हकीकी, वहदहू ला शरीक, खालिके कायनात मानते हुए उसकी तमाम सिफात मसलन हयात, इल्मो कुदरत, इरादा, कलाम, सम’अ, बसर, तकवीन को सिदक दिल से मान कर इस पर यकीने कामिल रखा जाए और उसके हर ऐब व नुक्स से पाक मानते हुए उसको हर सिफ्ते कमाल के साथ मुत्तसिफ माना जाये।

रूहों का अल्लाह पर ईमान लाना
अल्लाह तबारक व त’आला ने आलमे अरवाह ही में रूहों से अपनी रबूबियत पर ईमान का इक़रार व अहद व पैमान ले लिया था जो पाकीज़ा रूहें उसी इकरार पर गामजन रही वह मोमिना हुई और जिनको दुनिया में आने के बाद ईमान की तौफीक न मिली वह काफिरा हुईं फिर ईमान व कुफ़्र का मैदान गर्म हुआ और हमेशा यह दोनों कुव्वतें बरसरे पैकार रही, रब अज़्ज़ा व जल्ल ने ईमान वालों के लिए जन्नत और उसकी नेअमतों का वादा फरमाया है और काफिरों के लिए जहन्नम और उसकी भयानक सज़ाओं की वईदें वारिद हुई। (फैजाने आ’ला हज़रत, पेज 78)

मीसाक़ का दिन और अरवाह से वादा
उबय बिन कअब से रिवायत है कि अल्लाह तबारक व तआला ने मीसाक़ के दिन दुनिया बनाने से क़ब्ल औलादे आदम अलैहिस्सलाम की तमाम अरवाह को जमा किया उन से तरह तरह की करार दाद मन्जू़र कराई फिर तमाम अरवाह में किसी को ग़रीब, किसी को अमीर बनाया. किसी को खू़बसूरत किसी को बदसूरत बनाया, किसी को छोटा और किसी को बड़ा बना कर उनको क़ुव्वते गोयाई अता की और फिर उन से अहदो पैमान लिया और अपने आप सबको गवाह बना कर पूछा अलस्तु बेरब्बेकुम (तर्जमा क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ।) तमाम अरवाह ने इक़रार किया और कहा कालू बला (तर्जमा : बोले क्यों नहीं तू ही हमारा रब है)
उसके बाद अल्लाह तआला ने फ़रमाया में सातों आसमानों और सातों जमीनों को गवाह बनाता हूं और तुम्हारा बाप भी शाहिद है। वह इसलिए कि कहीं तुम क्यामत यानी हिसाब व किताब के दिन यह न कहने लगो कि हम इस बात से वाकिफ न थे (यानी मालूम न था)। और अच्छी तरह जान लो कि मेरे सिवा न कोई माबूद (इबादत के लाइक़) न कोई रब (पालने वाला) है। तुम मेरे साथ किसी को शरीक मत करना। मैं तुम्हारे पास रसूल भेजूंगा जो तुम्हें मेरा अहदो पैमान याद दिलायेंगे। और उन पर अपनी किताबें भी नाज़िल करूंगा। जिस से वह तुम्हे सिराते मुस्तकीम पर चलने की तस्कीन करते रहेंगे। तमाम औलादे आदम ने इन बातों का इक़रार करके गवाही दी कि तू ही हमारा ख़ुदा है । हज़रत आदम अलैहिस्सलाम वहां खड़े अपनी आंखों से यह मंजर देख रहे थे उन्होंने देखा कि उनकी औलाद में किसी को काला किसी को गोरा, कोई खूबसूरत कोई बद सूरत तो किसी को ग़रीब किसी को अमीर बनाया गया है। उन्होंने अर्ज किया कि ऐ रब तआला तूने तमाम बन्दों को यक्सां क्यों नहीं बनाया। यह भेद भाव क्यों रखा। अल्लाह तआला ने फरमाया मैं चाहता हूँ कि मेरे यह बन्चे हर हाल में मेरा शुक्र अदा करते रहे और सब्र करते रहे। फिर आप ने अंबियाए किराम के गरोहों को देखा कि चिरागों के मानिन्द उनके चेहरे रौशन है उन से खुसूसी अहदो पैमान लिया गया। उस गरोह में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम बिन मरयम भी थे अल्लाह के हुक्म से उनकी रूह हज़रत मरयम की मुंह की जानिब से जिस्म में दाखिल हुई। उसके बाद तमाम अबियाए किराम से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाने का और उनकी मदद का अहद लिया। जिसे यौने मीसाक़ कहते है।(इस्लामी तारीखे़ आलम, पेज 350)

मीसाक़ के दिन रूहों की चार सफें

मीसाक़ के दिन रूहों की चार सफें थी। पहली सफ (खासम ख़्वास यानी) नबियों की, दूसरी सफ (ख़्वास यानी) औलिया अल्लाह की, तीसरी सफ (अवाम यानी) आम मुसलमानों की और चौथी में (आम इंसान यानी) काफिरों की रूहें, रब ने फरमायाः क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ? नबियों ने जमाले इलाही देखा और किसी आड़ या पर्दे के बग़ैर यह कलाम सुना और अर्ज़ किया हाँ। इसी लिये वह दुनिया में नबुव्वत और रिसालत और कलामे इलाही के मुस्तहिक (हक़दार) हुए। औलिया अल्लाह ने नबियों की रूहों के पर्दे से यह अनवार देखे और कलामे इलाही सुन कर हाँ कहा। लिहाजा वह नबियों के समर्थक और इल्हाम के मुस्तहिक हुए। आम मुसलमानों ने दो वास्तों यानी अम्बिया और औलिया के ज़रिये सुन कर उलूहियत का इकरार किया लिहाज़ा वह भी दुनिया में नबियों के उम्मती और औलिया के फ़रमाँ बरदार बने और बिना देखे अल्लाह की जात पर ईमान लाए। काफिरों ने बहुत से पर्दों के पीछे से इस खि़ताब की आवाज़ सुनी मगर मक़्सद नहीं समझा, ऐसे ही ’हाँ’ का शोर सुना और खुद भी बिना सोचे समझे ’हाँ’ कह दिया लेकिन जब दुनिया में आए तो सब भूल गए। (तफसीरे नईमी)मीसाक़ के दिन रूहों की चार सफें थी। पहली सफ (खासम ख़्वास यानी) नबियों की, दूसरी सफ (ख़्वास यानी) औलिया अल्लाह की, तीसरी सफ (अवाम यानी) आम मुसलमानों की और चौथी में (आम इंसान यानी) काफिरों की रूहें, रब ने फरमायाः क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ? नबियों ने जमाले इलाही देखा और किसी आड़ या पर्दे के बग़ैर यह कलाम सुना और अर्ज़ किया हाँ। इसी लिये वह दुनिया में नबुव्वत और रिसालत और कलामे इलाही के मुस्तहिक (हक़दार) हुए। औलिया अल्लाह ने नबियों की रूहों के पर्दे से यह अनवार देखे और कलामे इलाही सुन कर हाँ कहा। लिहाजा वह नबियों के समर्थक और इल्हाम के मुस्तहिक हुए। आम मुसलमानों ने दो वास्तों यानी अम्बिया और औलिया के ज़रिये सुन कर उलूहियत का इकरार किया लिहाज़ा वह भी दुनिया में नबियों के उम्मती और औलिया के फ़रमाँ बरदार बने और बिना देखे अल्लाह की जात पर ईमान लाए। काफिरों ने बहुत से पर्दों के पीछे से इस खि़ताब की आवाज़ सुनी मगर मक़्सद नहीं समझा, ऐसे ही ’हाँ’ का शोर सुना और खुद भी बिना सोचे समझे ’हाँ’ कह दिया लेकिन जब दुनिया में आए तो सब भूल गए। (तफसीरे नईमी)

दुनिया मे ईमान बिल्लाह

आलमे अरवाह यानी रूहों की दुनिया में रूहों का अल्लाह पर ईमान लाना ये अपने पढ़ा अब दुनिया मे अल्लाह के बाजे जो ईमान व अक़ाइद रखने का है वो निम्नलिखित है।

 

2. ईमान बिरर्रसुल (रसूलों पर ईमान)

रसूलों पर ईमान
रसूलों पर ईमान लाना जरूरी है कि जितने अम्बिया व मुरसलीन दुनिया में तशरीफ लाऐ वह सब अल्लाह के मुकद्दस बन्दे और उसके बरगुज़ीदा पैगम्बर है वह सब सच्चे और वह जो कुछ अल्लाह त’आला की तरफ से लाये यह सब हक़ है और उन सब नबियों और रसूलों ने अपने फराइजे नुबुव्वत को कमा हक्कहू अदा किया।

ईमान बिन्नबी (नबी ए करीम पर ईमान) : नबी ए करीम की नबूवत का इक़रार और असबात।

ईमान लिन्नबी (नबी करीम के लिए ईमान) : नबी की त’अज़ीम, शान, खूबी, सुन्नत, ख़ुसूसियत का इकरार और नबी की फरमाबरदारी और मवाफिक करना।

3. आस्मानी किताबों पर ईमान

आस्मानी किताबों पर ईमान
अल्लाह त’आला ने जितने सहीफ़े और किताबें आस्मान से नाज़िल फ़रमाई हैं सब हक हैं और सब अल्लाह त’आला का कलाम हैं। इन किताबों में जो कुछ इरशादे खुदावन्दी हुवा सब पर ईमान लाना और इन सच मानना ज़रूरी है।
किसी एक किताब का इन्कार करना कुफ़्र है। (जन्नती जेवर, पेज 185)

4. फरिश्तों पर ईमान:

फरिश्तों पर ईमान:
फरिश्तों पर ईमान लाने से यह मुराद है कि सिद्क़ दिल से यह मान लिया जाए कि फरिश्ते अल्लाह त’आला की एक नूरी मखलूक़ हैं और उसके मोहतरम बन्दे हैं जिनमें गुनाहों का माद्दा ही नहीं है। वह हर छोटे बड़े गुनाहों से मासूम और पाक हैं। न वह औरत हैं न मर्द न वह खाते हैं न पीते है। बस खुदा की बन्दगी उनकी ज़िन्दगी है।

कुरआन में अल्लाह त’आला ने फरिश्तों की यह सिफत बयान फरमायी है। “ला यअसूनल्लाह मा अमर हुम व यफअलूना मा यूअमरुन” यानी वह कभी भी और किसी काम में भी और किसी हाल में अल्लाह की कोई ना फरमानी नहीं करते और खुदा ए त’आला जो कुछ उन्हें हुक्म देता है वही करते हैं। कोई वह्यी लाता है। कोई पानी बरसाता है। कोई इन्सानों के आ’माल की निगहबानी और उनकी हिफाज़त करता है।

5. तक़दीर पर ईमान

तक़दीर पर ईमान
तक़दीर पर ईमान लाना भी ईमान का हिस्सा है । आलम में जो कुछ भला, बुरा होता है। सब को अल्लाह त’आला इस के होने से पहले हमेशा से जानता है और उस ने अपने इसी इल्मे अज़ली के मुवाफ़िक़ पर भलाई बुराई मुक़द्दर फ़रमा दी है। तक़दीर इसी का नाम है जैसा होने वाला है और जो जैसा करने वाला था इस को पहले ही अल्लाह त’आला ने अपने इल्म से जाना और इसी को लौहे महफूज़ पर लिख दिया। तो येह न समझो कि जैसा उस ने लिख दिया मजबूरन हम को वैसा ही करना पड़ता है बल्कि वाके़आ येह है जैसा हम करने वाले थे वैसा ही उस ने बहुत पहले लिख दिया । ज़ैद के ज़िम्मे बुराई लिखी इस लिये कि ज़ैद बुराई करने वाला था। अगर ज़ैद भलाई करने वाला होता तो वोह ज़ैद के लिये भलाई लिखता । तो अल्लाह त’आला ने तक़दीर लिख कर किसी को भलाई या बुराई करने पर मजबूर नहीं कर दिया है। (जन्नती ज़ेवर, पेज 186)

6. आख़िरत पर ईमान

मौत के बाद उठाए जाने पर ईमान
खुदा की मुलाकात पर ईमान का मतलब है कि मरने के बाद हश्र व नश्र और कियामत में अल्लाह त’आला के हुज़ूर आजिज़ी और अपने आ’माल की पेशी और जवाब देही और जन्नत दोज़ख वगैरह पर दिल से ऐतिकाद करना ।

मरने के बाद क़ियामत से पहले दुन्या व आखिरत के दरमियान एक और आलम है। जिस को “आलमे बरज़ख” कहते हैं। तमाम इन्सानों और जिन्नों को मरने के बाद इसी आलम में रहना होता है। इस आलमे बरज़ख़ में अपने अपने आमाल के ए’तिबार से किसी को आराम मिलता है और किसी को तकलीफ़ (बहारे शरीअत, हि. 1, स. 24)

7. क़ियामत पर ईमान

क़ियामत पर ईमान
तौहीदो रिसालत की तरह क़ियामत पर भी ईमान लाना ज़रूरियाते दीन में से है जो शख़्स क़ियामत का इन्कार करे वोह खुला हुवा काफ़िर है।
हर मुसलमान के लिये इस अकीदे पर ईमान लाना फ़र्जे ऐन है। कि एक दिन येह ज़मीन आस्मान बल्कि कुल आलम और सारा जहान फ़ना हो जाएगा। इसी दिन का नाम “क़ियामत“ है ।

ईमान की हक़ीक़त

ईमान इंसानी दिल के अंदर एक खस्लत का नाम है जिसके बाइस इंसान इस क़ाबिल बनता है कि उससे अल्लाह राज़ी हो जाता है, …….


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Iman Ki Ahmiyat

ईमान की अहमियत

हज़रते इब्ने मस्ऊद से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने फ़रमाया जिस के दिल में राई के दाने के बराबर भी ईमान होगा वोह जहन्नम में दाखिल नहीं होगा


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Iman Ki Alamat

मोमिन को बेवकूफ ख्याल करना

हज़रते सय्यिदुना अबू हुरैरा रदीयल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर नबिय्ये पाक ने इरशाद फ़रमाया : “मोमिन इतना नर्म तबीअत, नर्म ज़बान वाला होता है कि उस की नर्मी की वजह से लोग उसे अहमक़ (बेवकूफ) ख़याल करते हैं।” (शुअबुल ईमान)


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Iman Ki Quwwat

ईमान की ताकत सबसे बढ़ कर 

अल्लाह फ़रमाता है : न सुस्ती करो और न ग़म खाओ तुम्ही ग़ालिब आओगे अगर ईमान रखते हो (कन्जुल ईमान, सूरह इमरान, आयत न 139)


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Iman Ki Shakhain

ईमान की 60 या 70 से ज़्यादा शाखेंः
हज़रते अबू हुरैरह रदीअल्लाहु त’आला अन्हु नबी अलैहिस्सलाम से रिवायत करते हैं कि आप ﷺ इरशाद फरमाते हैं ईमान की साठ या 70 से ज़्यादा शाखें हैं और इनकी सबसे आ’ला जड़ और बुनियाद ला इलाहा इल्लल्लाह पर यकीन रखना है और सबसे अदना ईमान तकलीफ देह चीज़ का रास्ते से हटा देना और हया ईमान की एक शाख है। (शुअबुल ईमान जिल्द 1)


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Iman Ki Hifazat

ईमान की हिफाज़त

हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह ने फरमाया के जो शख़्स ईमान की दौलत मुयस्सर आने पर हमेशा ख़ुदाय-ए ताला का शुक्रिया अदा करता रहेगा, इस का ईमान भी महफ़ूज़ रहेगा और ख़ात्मा ईमान पर होगा। बल्कि खुदा-ए -त‘आला के वादा के मुताबिक के: (तर्जुमा) के अगर तुम हमारी नेमतों का शुक्र अदा करो तो हम उन नेमतों में इज़ाफ़ा कर देंगे।
ख़ुदाय-ए त‘आला के इस वादे के मुताबिक ईमान में क़ुव्वत और ईमानी कामों में बरकत होगी इंशा अल्लाह (गंजिनाए असरार, पेज न. 16)


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