Asal Qurbani

असल कुर्बानी का बयान

मुसलमां सुन यह नुकतह दर्से कुरआनी में है , 

अजमते इस्लाम व ईमान सिर्फ कुरबानी में है।

जानवर का क़ुरबानी यादे इब्राहिमी है 

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बारगाहे किब्रिया में यह दुआ मांगी थी। वजअल ली लिसाना सिकिन फ़िल – आखिरीन (तर्जमा) ऐ अल्लाह आने वाली नस्लों में मेरा जिक्र सच्चाई के साथ जारी रख। (अल-कौलुल-बदीअ स० 85)

अल्लाह तआला ने दुआए खलीली को शर्फे कबूलियत से नवाज़ा और हुजुरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ उन पर दुरुदे इब्राहिम भेजना उम्मते मुस्लेमा की जुबान पर जारी फरमाया और जानवर का क़ुरबानी करने का भी हुक़्म हुआ। 

ख़ुद का क़ुरबानी 

हर इंसान को दुनिया में कुछ न कुछ क़ुरबानी का हुक़्म हुआ जिससे हुक़ूक़ूल इबाद और हुक़ूक़ुल्लाह अदा किया जाए जो बंदों के आज़माइश के लिए है यानी अल्लाह की रज़ा के लिए अल्लाह के राह में प्यारी चीज को खर्च करना क़ुरबानी कहलाता है। जो कोई क़ुरबानी न करता हो गोया वो आजमाइश में नाकाम (Fail) हुआ। 

क़ायमायबी क़ुरबानी देने में है

क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है : (तर्जुमा) “तुम हरगिज़ कामयाबी को न पहुंचोगे जब तक राहे खुदा में अपनी प्यारी चीज़ ख़र्च न करो और तुम जो कुछ ख़र्च करो अल्लाह को मालूम है। (सूरह इमरान, आयत नं. 92)”

जान का क़ुरबानी – मुसलमानों पर ज़िहाद  फ़र्ज़ किया गया ये जान की कुर्बानी है।

क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है : (तर्जुमा) “तुमपर फ़र्ज़ हुआ खुदा की राह में लड़ना और वह तुम्हें नागवार है और क़रीब है कि कोई बात तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो और क़रीब है कि कोई बात तुम्हें पसन्द आए और वह तुम्हारे हक़ में बुरी हो. और अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते। (सुरहः बक़रह, आयत न 216)

दिल की क़ुरबानी – दोस्ती यानी हक़ वालों से मुहब्बत अल्लाह के लिए और दुश्मनी यानी बातिलों से नफ़रत अल्लाह के लिए। अगर्चे अपना रिस्तेदार ही क्यों न हो।

क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है : (तर्जुमा) ऐ ईमान वालो अपने बाप और अपने भाईयों को दोस्त न समझो अगर वो ईमान पर कुफ़्र पसन्द करें, और तुम में जो कोई उनसे दोस्ती करेगा तो वही ज़ालिम हैं।(सूरह तौबा, आयत न. 23)

ज़िस्म का क़ुरबानी – तमाम बदनी इबादत जो बग़ैर माल का किया जाए जैसे , किताबों का मुताअला, नमाज़, रोज़ा, ज़िक्र, दरूद, तिलावत वग़ैरह के लिए वक़्त, अक़्ल, नफ़्स और सेहत का क़ुरबानी है।

माल का क़ुरबानी : वो इबादत जिसको करने के लिए जिस्म के साथ माल दरकार हो जैसे हज़्ज़, ज़कात, सदक़ात, सखावत, ईसार, खिदमते ख़ल्क़ वग़ैरह के लिए माल की क़ुरबानी।

क़ुरआन में है (तर्जमा) : वो जो अपने माल अल्लाह की राह में ख़र्च करते है फिर देने के बाद न एहसान रखें न तकलीफ़ दें उनका इनआम उनके रब के पास है और उन्हें न कुछ डर हो न कुछ ग़म। (कंजूल ईमान, सूरह बक़रह, आयत नं. 262)

तसव्वुफ़ की रौशनी में क़ुरबानी

क़ुरआन में है (तर्जमा) : जब अर्ज़ की इब्राहीम ने ऐ रब मेरे मुझे दिखादे तू क्योंकर मुर्दें जिलाएगा, फ़रमाया क्या तुझे यक़ीन नहीं अर्ज़ की यक़ीन क्यों नहीं मगर यह चाहता हूँ कि मेरे दिल को क़रार आजाए फ़रमाया तो अच्छा चार परिन्दे लेकर अपने साथ हिला ले फिर उनका एक एक टुकड़ा हर पहाड़ पर रख दे फिर उन्हें बुला वो तेरे पास चले आएंगे पाँव से दौड़ते अौर जान रख कि अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है। (सूरह बक़रह, आयत न. 260)

आयत की तफ़्सीर : 

हज़रते इब्राहीम  अलैहिस्सलाम ने जिन चार परन्दों को ज़ब्ह किया इन में से हर परन्द एक बुरी खस्लत में मशहूर है मषलन मोर को अपनी शक्लो सूरत की खूब सूरती पर घमन्ड रहता है और मुर्ग में कषरते शहवत की बुरी खस्लत है और गिध में हिर्स और लालच की बुरी आदत है और कबूतर को अपनी बुलन्द परवाज़ी और ऊंची उड़ान पर नखवत व गुरूर होता है। तो इन चारों परन्दों के ज़ब्ह करने से इन चारों खस्लतों को ज़ब्ह करने की तरफ इशारा है कि चारों परन्द ज़ब्ह किये गए तो हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम  को मुर्दों के ज़िन्दा होने का मन्ज़र नज़र आया और इन के दिल में नूरे इत्‌मीनान की तजल्ली हुई। जिस की बदौलत इन्हें नफ्से मुतमइन्ना की दौलत मिल गई तो जो शख़्स येह चाहता है कि उस का दिल ज़िन्दा हो जाए और उस को नफ़्से मुतुमइन्ना की दौलत नसीब हो जाए उस को चाहिये कि मुर्ग ज़ब्ह करे या’नी अपनी शहवत पर छुरी फेर दे और मोर को ज़ब्ह करे या’नी अपनी शक्लो सूरत और लिबास के घमन्ड को ज़ब्ह कर डाले और गिध को ज़ब्ह करे या’नी हिर्स और लालच का गला काट डाले और कबूतर को ज़ब्ह करे या’नी अपनी बुलन्द परवाज़ी और ऊंचे मर्तबों के गुरूरो नखवत पर छुरी चला दे। अगर कोई इन चारों बुरी खस्लतों को ज़ब्ह कर डालेगा तो इन्शाल्लाह तआला वोह अपने दिल के ज़िन्दा होने का मन्ज़र अपनी आंखों से देख लेगा और उस को नफ़्से मुतमइन्ना की सरफराज़ी का शरफ हासिल हो जाएगा।(अज़ाईबुल क़ुरआन, अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी अलैहिर्रहमा )

सूफ़ी अनवर रज़ा खान क़ादरी

बानी ग़ौस व ख़्वाजा व रज़ा ट्रस्ट, रांची (झारखंड)

ख़ादिम ख़ानक़ाह चिश्ती क़ादरी, रांची

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