Author name: Sufi Anwar Raza Qadri

Harut Maarut Ka Wakiya

नफ़्स ने 2 फ़रिस्तो से भी गुनाह कराया
तफ़सीरे अज़ीज़ी ने इब्ने जरीर और इब्ने अबी हातिम वगै़रा के हवाले से बयान किया है कि हज़रत इद्रीस अलैहिस्सलाम के ज़माने में इन्सान बहुत बदअमल हो गए। फरिश्तों ने अल्लाह त’आला की बारगाह में अर्ज किया कि मौला इन्सान बहुत बदकिरदार है।
(ख़्याल रहे कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की पैदाइश से पहले फरिश्तों ने ख़िलाफत के लिए अपना हक़ जताया था। अब उन का मक़सद यह इज़्हार करना था कि इन्सान खलीफ़ा के काबिल नहीं है, उसे मअजूल किया जाए या कम से कम यह खलीफा रहे और वज़ीर हम ताकि उसके बिगड़े हुए काम सम्भाल लिया करें।)
रब तआला ने फरमायाः उसे गुस्सा और शहवत दी गई है जिससे वह गुनाह करता है। अगर यह चीजें तुम्हें मिलें तो तुम भी गुनाह करने लगोगे। फरिश्ते बोलेः मौलाए करीम, हम तो गुनाह के पास भी न जाएंगे चाहे कितना ही गुस्सा और शहवत हो। अल्लाह त’आला का हुक्म हुआः अच्छा तुम अपनी जमाअत में से आला दर्जे के परहेज़गार फरिश्तों को छांट लो। हम उन्हें गुस्सा और शहवत दे देते हैं फिर इम्तिहान हो जाएगा। चुनान्चे हारूत और मारूत जो बड़े ही इबादत गुज़ार फरिश्ते थे, चुने गए। अल्लाह त’आला ने उन्हें गुस्सा और शहवत देकर बाबुल शहर में उतार दिया और फ़रमाया कि तुम काज़ी बनकर लोगों का फैसला किया करो और इस्मे आज़म के ज़रिये रोज़ाना शाम को आसमान पर आ जाया करो। यह दोनों एक माह तक ऐसे ही आते जाते रहे। इतने अर्से में उनके अदलो इन्साफ का चर्चा हो गया और बहुत मुकदमे उनके पास आने लगे ।
एक रोज एक बहुत खूबसूरत औरत आई जिसका नाम ज़ोहरा था। यह मुल्के फारस की रहने वाली थी। हज़रत अली रज़ियल्लाह अन्हु की रिवायत है कि उसका नाम बेदुख़्त था और ज़ोहरा लक़ब। इस औरत ने अपने शौहर के ख़िलाफ मुकदमा दायर किया। हारूत मारूत इसे देखते ही फरेफ़्ता हो गए और उससे बुरे काम (ज़िना) की ख़्वाहिश ज़ाहिर की।
उसने कहा कि मेरा दीन और है तुम्हारा और, यह इख़्तिलाफ हमारे मिलन में आड़ है। दूसरे मेरा शौहर बहुत गैरत वाला है, अगर उसे ख़बर हो गई तो मुझे कत्ल कर देगा। लिहाज़ा पहले तो तुम मेरे बुत को सज्दा करके मेरे दीन में आओ फिर मेरे शौहर को कत्ल करो फिर मैं तुम्हारी और तुम मेरे। इन्हों ने इन्कार किया। वह चली गई मगर इन के दिलों में इश्क की आग भड़क उठी थी। आख़िर उसे पैग़ाम भेजा कि हम तेरे घर आना चाहते हैं। वह बोलीः मेरे सर आँखों पर, यह दोनों उस के घर पहुंचे। उसने अपने आप को खूब सजाया सँवारा और उन से बोलीः आप मुझे इस्मे आज़म सिखा दें या बुतों को सज्दा करें या मेरे शौहर को कत्ल करें या शराब पी लें। उन्हों ने सोचा कि इस्मे आज़म अल्लाह तआला के राज़ों में से है उसको ज़ाहिर करना जुल्म है, बुत परस्ती करना शिर्क है और क़त्ल बन्दों के हक़ की ख़िलाफवर्जी। लाओ शराब पी लें। चुनान्चे उन्हों ने शराब पी ली। जब शराब पीकर मस्त हो गए तो उसने उन से बुतों को सज्दा भी करा लिया। उनके हाथों शौहर को कत्ल भी करा लिया और इस्मे आज़म भी सीख लिया। वह तो इस्मे आज़म पढ़ कर सूरत बदल कर आसमान पर पहुँच गई। हक तआला ने उसकी रूह को ज़ोहरा सितारे से जोड़ दिया और उसकी शक्ल ज़ोहरा सितारे की तरह हो गई। जब हारूत और मारूत का नशा उत्तरा तो यह इस्मे आज़म भूल चुके थे और अपने किये पर नादिम थे। हक़ तआला ने फरिश्तों से फ़रमाया कि इन्सान मेरी तजल्ली से दूर रहता है।
यह दोनों शाम को हाज़िरे बारगाह होते थे फिर भी शहवत से मग़लूब हो कर सब कुछ कर बैठे। अगर इन्सानों से गुनाह सरज़द हों तो क्या तअज्जुब है। तमाम फरिश्तों ने अपनी ख़ता का एतराफ किया और ज़मीन वालों पर लअन तअन करने की जगह उनके लिए मग़फिरत की दुआ करने लगे। फिर हारूत मारूत हज़रत इद्रीस अलैहिस्सलाम की बारगाह में हाज़िर होकर शफाअत के तालिब हुए। आप ने उनके हक़ में मग़फ़ित की हुआ की। बहुत रोज़ के बाद अल्लाह तआला का हुक़्म आया कि इन को इख़्तियार दीजिये कि यह या तो दुनियावी अज़ाब कुबूल करें या आख़िरत का। हज़रत इद्रीस अलैहिस्सलाम ने इन्हें अल्लाह का हुक्म पहुँचाया। उन्हों ने अर्ज कियाः ऐ अल्लाह के नबी दुनिया का अज़ाब फ़ानी है और आख़िरत का अज़ाब हमेशा के लिए है हमको दुनियावी अज़ाब मंजूर है। चुनान्चे अल्लाह त’आला ने फ़रिशतो को हुक़्म दिया कि इन दोनों को लोहे की ज़न्जीरों में जकड़ कर बाबुल के कुंवे में औंधा लटका दिया जाए। इस कुंवे में आग भड़क रही है और यह लटके हुए हैं और फरिश्ते बारी बरी कोड़े मारते हैं। सख़्त प्यास की बजह से उन की ज़बानें बाहर लटकी हुई हैं। (तफसीरे नईमी) (क्या आप जानते है , पेज 226)

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Asal Qurbani

असल कुर्बानी का बयान

मुसलमां सुन यह नुकतह दर्से कुरआनी में है , 

अजमते इस्लाम व ईमान सिर्फ कुरबानी में है।

जानवर का क़ुरबानी यादे इब्राहिमी है 

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बारगाहे किब्रिया में यह दुआ मांगी थी। वजअल ली लिसाना सिकिन फ़िल – आखिरीन (तर्जमा) ऐ अल्लाह आने वाली नस्लों में मेरा जिक्र सच्चाई के साथ जारी रख। (अल-कौलुल-बदीअ स० 85)

अल्लाह तआला ने दुआए खलीली को शर्फे कबूलियत से नवाज़ा और हुजुरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ उन पर दुरुदे इब्राहिम भेजना उम्मते मुस्लेमा की जुबान पर जारी फरमाया और जानवर का क़ुरबानी करने का भी हुक़्म हुआ। 

ख़ुद का क़ुरबानी 

हर इंसान को दुनिया में कुछ न कुछ क़ुरबानी का हुक़्म हुआ जिससे हुक़ूक़ूल इबाद और हुक़ूक़ुल्लाह अदा किया जाए जो बंदों के आज़माइश के लिए है यानी अल्लाह की रज़ा के लिए अल्लाह के राह में प्यारी चीज को खर्च करना क़ुरबानी कहलाता है। जो कोई क़ुरबानी न करता हो गोया वो आजमाइश में नाकाम (Fail) हुआ। 

क़ायमायबी क़ुरबानी देने में है

क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है : (तर्जुमा) “तुम हरगिज़ कामयाबी को न पहुंचोगे जब तक राहे खुदा में अपनी प्यारी चीज़ ख़र्च न करो और तुम जो कुछ ख़र्च करो अल्लाह को मालूम है। (सूरह इमरान, आयत नं. 92)”

जान का क़ुरबानी – मुसलमानों पर ज़िहाद  फ़र्ज़ किया गया ये जान की कुर्बानी है।

क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है : (तर्जुमा) “तुमपर फ़र्ज़ हुआ खुदा की राह में लड़ना और वह तुम्हें नागवार है और क़रीब है कि कोई बात तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो और क़रीब है कि कोई बात तुम्हें पसन्द आए और वह तुम्हारे हक़ में बुरी हो. और अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते। (सुरहः बक़रह, आयत न 216)

दिल की क़ुरबानी – दोस्ती यानी हक़ वालों से मुहब्बत अल्लाह के लिए और दुश्मनी यानी बातिलों से नफ़रत अल्लाह के लिए। अगर्चे अपना रिस्तेदार ही क्यों न हो।

क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है : (तर्जुमा) ऐ ईमान वालो अपने बाप और अपने भाईयों को दोस्त न समझो अगर वो ईमान पर कुफ़्र पसन्द करें, और तुम में जो कोई उनसे दोस्ती करेगा तो वही ज़ालिम हैं।(सूरह तौबा, आयत न. 23)

ज़िस्म का क़ुरबानी – तमाम बदनी इबादत जो बग़ैर माल का किया जाए जैसे , किताबों का मुताअला, नमाज़, रोज़ा, ज़िक्र, दरूद, तिलावत वग़ैरह के लिए वक़्त, अक़्ल, नफ़्स और सेहत का क़ुरबानी है।

माल का क़ुरबानी : वो इबादत जिसको करने के लिए जिस्म के साथ माल दरकार हो जैसे हज़्ज़, ज़कात, सदक़ात, सखावत, ईसार, खिदमते ख़ल्क़ वग़ैरह के लिए माल की क़ुरबानी।

क़ुरआन में है (तर्जमा) : वो जो अपने माल अल्लाह की राह में ख़र्च करते है फिर देने के बाद न एहसान रखें न तकलीफ़ दें उनका इनआम उनके रब के पास है और उन्हें न कुछ डर हो न कुछ ग़म। (कंजूल ईमान, सूरह बक़रह, आयत नं. 262)

तसव्वुफ़ की रौशनी में क़ुरबानी

क़ुरआन में है (तर्जमा) : जब अर्ज़ की इब्राहीम ने ऐ रब मेरे मुझे दिखादे तू क्योंकर मुर्दें जिलाएगा, फ़रमाया क्या तुझे यक़ीन नहीं अर्ज़ की यक़ीन क्यों नहीं मगर यह चाहता हूँ कि मेरे दिल को क़रार आजाए फ़रमाया तो अच्छा चार परिन्दे लेकर अपने साथ हिला ले फिर उनका एक एक टुकड़ा हर पहाड़ पर रख दे फिर उन्हें बुला वो तेरे पास चले आएंगे पाँव से दौड़ते अौर जान रख कि अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है। (सूरह बक़रह, आयत न. 260)

आयत की तफ़्सीर : 

हज़रते इब्राहीम  अलैहिस्सलाम ने जिन चार परन्दों को ज़ब्ह किया इन में से हर परन्द एक बुरी खस्लत में मशहूर है मषलन मोर को अपनी शक्लो सूरत की खूब सूरती पर घमन्ड रहता है और मुर्ग में कषरते शहवत की बुरी खस्लत है और गिध में हिर्स और लालच की बुरी आदत है और कबूतर को अपनी बुलन्द परवाज़ी और ऊंची उड़ान पर नखवत व गुरूर होता है। तो इन चारों परन्दों के ज़ब्ह करने से इन चारों खस्लतों को ज़ब्ह करने की तरफ इशारा है कि चारों परन्द ज़ब्ह किये गए तो हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम  को मुर्दों के ज़िन्दा होने का मन्ज़र नज़र आया और इन के दिल में नूरे इत्‌मीनान की तजल्ली हुई। जिस की बदौलत इन्हें नफ्से मुतमइन्ना की दौलत मिल गई तो जो शख़्स येह चाहता है कि उस का दिल ज़िन्दा हो जाए और उस को नफ़्से मुतुमइन्ना की दौलत नसीब हो जाए उस को चाहिये कि मुर्ग ज़ब्ह करे या’नी अपनी शहवत पर छुरी फेर दे और मोर को ज़ब्ह करे या’नी अपनी शक्लो सूरत और लिबास के घमन्ड को ज़ब्ह कर डाले और गिध को ज़ब्ह करे या’नी हिर्स और लालच का गला काट डाले और कबूतर को ज़ब्ह करे या’नी अपनी बुलन्द परवाज़ी और ऊंचे मर्तबों के गुरूरो नखवत पर छुरी चला दे। अगर कोई इन चारों बुरी खस्लतों को ज़ब्ह कर डालेगा तो इन्शाल्लाह तआला वोह अपने दिल के ज़िन्दा होने का मन्ज़र अपनी आंखों से देख लेगा और उस को नफ़्से मुतमइन्ना की सरफराज़ी का शरफ हासिल हो जाएगा।(अज़ाईबुल क़ुरआन, अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी अलैहिर्रहमा )

सूफ़ी अनवर रज़ा खान क़ादरी

बानी ग़ौस व ख़्वाजा व रज़ा ट्रस्ट, रांची (झारखंड)

ख़ादिम ख़ानक़ाह चिश्ती क़ादरी, रांची

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Qurbani Ki Qubuliyat

गोस्त खाने का नाम मुसलमान नहीं 

“मेरी ज़िन्दगी का मक़सद तेरे दीन की सरफराजी। 

इसलिए मैं मुसलमान इसलिए मैं नमाजी !”

बे ऐब जानवर और ऐबदार मुसलमान 

याद रहे जिस तरह कुर्बानी का जानवर बे ऐब होना चाहिए उसी तरह कुर्बानी करने वाला मुसलमान भी बेऐब यानी गुनाहों से पाक व मुत्तक़ी होना चाहिए । जिस तरह तुम्हारे नज़दीक बे ऐब जानवर का कुर्बानी जायज नही उसी तरह अल्लाह के नज़दीक ऐबदार यानी गुनहगार का  कुर्बानी क़ुबूल नहीं । दुनियादार मुसलमानों का कुर्बानी से सिर्फ दुनिया मे गोश्त हासिल हो सकता है आख़िरत का सवाब तो दीनदारो और परहेजगारों के लिए है। 

जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है। 

तर्जुमा : तेरे रब के नजदीक आख़िरत परहेजगारों के लिए है। (सूरह ज़ुखरूफ़, आयत . 35)

 दूसरी जगह क़ुरआन में है (तर्जुमा) : अल्लाह को हरगिज़ न उनके गोश्त पहुचँते हैं न उनके ख़ून, हाँ तुम्हारी परहेज़गारी उस तक पहुँचती है। (सूरह हज़्ज़, आयत न. 37)

तफ़्सीर : यानी क़ुरबानी करने वाले सिर्फ़ नियत की सच्चाई और तक़वा की शर्तों  की रिआयत से अल्लाह त’आला को राज़ी कर सकते हैं. 

इसलिए जानवर कैसा हो ये मसाइल जानने के साथ साथ कुर्बानी देने वाला कैसा हो ये जानना सबसे पहले जरूरी है। 

कुर्बानी का जानवर कैसा होना चाहिए ? 

मसलाः- कुरबानी का जानवर मोटा ताज़ा अच्छा और बे ऐब होना ज़रूरी है। अगर थोड़ा सा ऐब हो तो कुरबानी मकरूह होगी। अगर ज़्यादा ऐब है तो कुरबानी होगी ही नहीं। जैसे अन्धा, लंगड़ा, काना, बेहद, दुबला, तिहाई से ज़्यादा कान, दुम, सींग, थन वगैरह कटा हुआ, पैदाइशी बे-कान का, बीमार, इन सब जानवरों की कुरबानी जाइज़ नहीं।

कुर्बानी देने वाला मुसलमान कैसा होना चाहिए 

कुर्बानी करने वाला इंसान हराम खोर नहीं होना चाहिए गुनाहों से पाक और बे ऐब होना जरूरी है। अगर दुनियादार होगा तो कुर्बानी क़ुबूल न होगी। जैसे दिल का अंधा, पैर गुनाहों से आलूदा, हराम देखने वाला, हराम खाने वाला, सिर्फ गोस्त का पकवान खाने का लालच रखने वाला, कमजोर ईमान वाला, जबान से झूट, हंसी मजाक, गाली गलौज, ग़ीबत, चुगली करने वाला तफसील के लिए नीचे पढ़ते जाए

कुर्बानी की क़बूलियत की शर्तें 

क़ुरआन में है : (तर्जमा) अल्लाह उसी का क़ुबूल करता है जो मुत्तक़ी (परहेजगार) हो। (सूरह माईदा, आयत न. 27)

मुत्तक़ी (परहेजगारों) कौन ? 

किताब मुकाशफतुल क़ुलूब बाब न. 1 के हवाले से 

लिखते है साहबे ईमान वह है जो जिस्म के तमाम आजा के साथ अल्लाह तआला से डर रखता हो, जैसा कि फकीह अबू लैस ने फरमायाः सात बातों में अल्लाह तआला के खौफ का पता चल जाता है।

1.उस की ज़बान गलत बयानी, 

गीबत, चुगली, तुहमत, और फुजूल बोलने से बची हो और अल्लाह तआला का जिक्र करने, तिलावते कलाम पाक करने, और दीनी उलूम सीखने में लगी हो।

2. उस के दिल से दुश्मनी, बुहतान और मुसलमान भाईयों का हसद निकल जाए क्योंकि हसद नेकियों को चाट जाता है जैसा कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है- हसद नेकियों को खा जाता है जैसे आग लकड़ी को खा जाती है। जानना चाहिए कि हसद दिल की सब से घटिया बीमारियों में से एक बीमारी है और दिल की बीमारियों का इलाज सिर्फ इल्म और अमल से ही हो सकता है।

3. उस की नज़र हराम खाने पीने से और हराम लिबास वगैरह से महफूज़ रहे और दुनिया की तरफ लालच की नज़र से न देखे बल्कि सिर्फ इबरत पकड़ने के लिए उस की तरफ देखे और हराम पर तो कभी उसकी निगाह भी न पड़े जैसा कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया- जिस ने अपनी आँख हराम से भरी अल्लाह तआला कियामत के दिन उसको आग से भर देगा।

4. उसके पेट में हराम खाना न जाए। यह गुनाहे कबीरा है। हुजूर नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- बनी आदम के पेट में जब हराम का लुक्मा पड़ा तो ज़मीन व आसमान का हर फरिश्ता उस पर लानत करेगा जब तक कि वह लुक्मा उस के पेट में रहेगा और अगर उसी हालत में मरेगा तो उस का ठिकाना जहन्नम होगा।

5. हराम की तरफ हाथ न बढ़ाए बल्कि ताकत भर उस का हाथ अल्लाह की फरमांबरदारी की तरफ बढे। हज़रते कअब इब्ने अहबार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह तआला ने सब्ज मोती (जबर्जद) का महल पैदा फरमाया, उस में सत्तर हजार घर हैं और हर घर में सत्तर हज़ार कमरे हैं उस में वही दाखिल होगा जिस के सामने हराम पेश किया जाए और वह सिर्फ अल्लाह के डर की वजह से उसे छोड दे।

6. उसका कदम अल्लाह तआला की नाफरमानी में न चले बल्कि सिर्फ उसकी इताअत व खुशनूदी में रहे. आलिमों और नेकों की तरफ हरकत करे। 

7. इबादत व मुजाहिदा, इन्सान को चाहिए कि खालिस अल्लाह तआला के लिए इबादत करे, रियाकारी व मुनाफिकत से बचता रहे, अगर ऐसा किया तो यह उन लोगों में शामिल हो गया।  

तक़वा का वसीयत 

हदीस :- हजरत अबू ज़र गफ्फारी रदियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि मैनें कहा कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ! आप मुझको कोई वसीयत फ़रमायें तो आप ने फरमाया कि मैं तुम को तक़वा (यानी अल्लाह से डरते रहने) की वसीयत करता हूँ। क्योंकि यह तुम्हारे आमाल को बहुत ज़्यादा संवार देने वाली चीज़ है।(मिश्कात, जिल्द 2, सफा 415)

मगर अफ़सोस 

जो लोग मालिके निसाब नही है और उस पर कुर्बानी वाजिब नही है फिर भी गोस्त खाने के लिए 2 या 3 हज़ार कही से उपाय करके कुर्बानी देते है लेकिन वही सख्स अगर ज़कात अदा करने के लिए मालिके निसाब को पहुँच जाए फिर भी सही से ज़कात अदा नही करता क्योंकि यहां खाने का मामला नही है और ये माल का असल कुर्बानी। अगर कुर्बानी का गोस्त खाने का हुक़्म न होता तो इस दौर का 90% दुनियादार मुसलमान कुर्बानी नहीं देते इसका अंदाज़ा ज़कात देने का मामला से लगाया जा सकता है।

 

सूफ़ी अनवर रज़ा खान क़ादरी

बानी ग़ौस व ख़्वाजा व रज़ा ट्रस्ट, रांची (झारखंड)

ख़ादिम ख़ानक़ाह क़ादरी चिश्ती (रांची)

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दीन का काम बग़ैर पैसों के न होगा

दीन का काम बग़ैर पैसों से न होगा
(फतावा रज़्वीया के हवाले से)

हदीस में इरशादे मुस्तफ़ा ﷺ है कि (तर्जमा) “एक ज़माना ऐसा आएगा की दीन का काम भी बे रुपया के न चलेगा।”

हुज़ूर आला हज़रत फरमाते है कोई बाकायदा (ढंग का) आलीशान मदरसा तो आपके (मुसलमानों के) हाथ में नहीं, कोई अख़बार पर्चा आपके यहाँ नहीं, मुदर्रेसीन, वाइजीन, मुनाजेरीन, मुसन्नेफीन की कसरत बक़दरे हाजत (जितना जरूरत है) आपके (मुसलमानों के) पास नहीं, जो कर सकते (काबिल) हैं वो फारिगुल-बाली (उनके पास वक़्त) नहीं, जो फारिगुल बाली (जिनके पास वक़्त है) हैं वह अहल (क़ाबिल) नहीं, बाज़ ने खूने जिगर खाकर किताबे लिखी तो छपीं कहाँ , किसी तरह से कुछ छपा तो तक़सीम कैसे हो. दीवान नहीं, नाविल नहीं कि हमारे भाई कम पैसे के चीज को थोड़ा ज्यादा पैसा देकर शौक से खरीदें (यह सोच कर की मुसलमान भाई को ही तो दे रहा हु), यहाँ तो सर चपेटना (यानी दाम कम करा कर दीनी किताबों को भी खरीदना है), रुपया ज्यादा हो तो मुम्किन कि यह सब शिकायात रफा (खत्म) हों।

  1. अज़ीमुश्शान मदारिस खोले जाएं, बाकायदा तालीमें हों।
  2. तलबा को वज़ाइफ (स्कॉलरशिप) मिलें कि ख़्वाही नख्वाही गिरवीदह हों। (यानी चाह के भी किसी के तरफ पैसा के लिए न झुके)
  3. मुदर्रिसों की ज्यादा से ज्यादा तन्ख्वाहें उनकी कार्रवाइयों पर दी जाएं कि लालच से जान तोड़ कर (यानी जरूरत पूरा हो ताकि) कोशिश करें।
  4. तबाए तलबा (मदारिस के बच्चो) की जाँच हो जो जिस काम के ज़्यादा मुनासिब देखा जाए मकूल वज़ीफा (पेमेंट) देकर उसमें लगाया जाए। यूं उनमें कुछ मुदर्रेसीन बनाए जाएं, कुछ वाइज़ीन, कुछ मुसन्नेफीन, कुछ मुनाजेरीन, फिर तस्नीफ व मुनाज़रा में भी तौजीअ हो। कोइ किसी फन पर कोई किसी फन पर।
  5. उन में जो तैयार होते जाएं, तन्ख़्वाहें देकर मुल्क में फैलाए जाएं कि तहरीरन (लिखकर) और तक़रीरन वअज़न (बयान) व मुनाज़रतन (मुनाजरा के जरिये) दीन व मज़हब को फैलाये , जब आपके उलमाए हक़ मुल्क में फैलें उस वक़्त कौन उनकी कुव्वत का सामना कर सकता है।
  6. हिमायत मज़हब व रददे बद मज़हब में मुफीदे कुतुब व रसाइल, मुसन्निफों को नज़राने देकर तस्नीफ कराए जाएं।
  7. तस्नीफ शुदह और नए तस्नीफ रसाइल उम्दा और खुश ख़त (पम्पलेट) छाप कर मुल्क में मुफ्त शाए किए जाएं।
  8. शहर शहर में अक़ाइद व आमाल का निगरानी करने वाला कोई रहें जहाँ जिस किस्म के वाइज़, मनाज़िर या तस्नीफ की हाजत हो आपको इत्तिला दें, आप सरकूबी आदा के लिए अपनी फौजें, मैगज़ीन, रिसाले, भेजते रहें।
  9. जो हम में काबिलकार (दीनी ख़िदमत के लायक का शख्स) मौजूद हो लेकिन अपनी रोजगार के वजह से मशगूल हैं. वजा़इफ़ मुक़र्रर (पेमेंट दे) कर के फा़रिगु़ल- बाली (दीन के लिए वक़्त देने वाला) बनाए जाएं, और जिस काम में उन्हें महारत हो, लगाए जाएं।
  10. आपके मज़हबी अख़बार शाए हों और वक़्तन फ़वक़्तन हर किस्म के हिमायते मज़हब में मज़मीन तमाम मुल्क में बकीमत व बिला कीमत (फ्री) में रोज़ाना या कम अज कम हफ़्तावार पहुँचाते रहें। उसके बाद आप आगे फरमाते हैं:

मेरे (यानी आला हजरत के) ख्याल में तो यह तदाबीर हैं, रुपया होने की सूरत में अपनी कुव्वत फैलाने के अलाया गुमराहियों की ताकतें तोड़ना भी इन्शाअल्लाहुल-अजीज आसान होगा। मैं देख रहा हूँ कि गुमराहों के बहुत से लोग सिर्फ तन्ख्वाहों के लालच से जहर उगलते (यानी बातिल मसाइल बताते) फिरते हैं, उनमें जिसे दस की जगह बारह (हज़ार) दीजिए अब आपकी सी कहेगा (जो बोलना बोले जाए वही बोलेंगे) , या कम अज़ कम बलुक्मा दोख़्ता बह तो होगा।

देखिए हदीस का इरशाद सादिक है कि (तर्जमा)’आखिर जमाना में दीन का काम भी दिरहम व दीनार से चलेगा।”

और क्यों न हो कि सादिक व मज़दूक सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का कलाम है, आलिम मा काना वमा यकूनु सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की खबर है। (फतावा रज़्वीया जिल्द 12, स० 133, 134)

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