Author name: Sufi Anwar Raza Qadri
Duniya Ki Mazammat (Side Effect)
तमाम गुनाहों की जड़़
हदीस : हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : दुनिया की महब्बत तमाम गुनाहों की जड़़ (असल) है।(मुकाशिफतुल क़ुलूब, बाब 31)
वाज़ेह हो जब इंसान आखि़रत की बजाए दुनिया की ज़िन्दगी को पसन्द करता है तो गुनाह को करने के लिए मजबूर और अल्लाह त‘आला से दूर हो जाता है।
अल्लाह फ़रमाता है (तर्जुमा) : क़ाफ़िर दुनिया की ज़िन्दगी पर इतरा गए और दुनिया की ज़िन्दगी आख़रित के मुक़ाबले नहीं मगर कुछ दिन बरत लेना (सूरह-रअद, आयत न. 26)
गुनाहों की तमाम अक़साम जैसे कुफ़्र व शिर्क व निफ़ाक़, सगीरा व कबीरा, फ़िस्क़ व फ़ुजूर, नाजाइज़ व हराम, ऐलानिया व ख़ूफ़िया में मुब्तला हो जाने की वजह यही दुनिया की महब्बत है यानी आख़रित को भूल कर दुनिया को तरजीह देना।
दुनिया की महब्बत सब से बड़ा गुनाह हैः-
अल्लाह त‘आला ने हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम की तरफ वही की ऐ मूसा! दुनिया की महब्बत में मशगूल न होना, मेरी बारगाह में इस से बड़ा कोई गुनाह नहीं है। रिवायत है कि हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम एक रोते हुए शख़्स के पास से गुजरे, जब आप वापस हुए तो वह शख़्स वैसे ही रो रहा था, मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह त‘आला से अर्ज़ किया या अल्लाह! तेरा बन्दा तेरे डर से रो रहा है, अल्लाह त‘आला ने कहा, ऐ मूसा! अगर आँसू के रास्ते उस का दिमाग़ बाहर निकल आए और उसके उठे हुए हाथ टूट जायें तब भी मैं उसे नहीं माफ करूँगा, क्योंकि यह दुनिया से मुहब्बत रखता है। (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 31)
माल की मुहब्बत ही दुनियादारी है
हज़रते अताअ बिन जियाद कहते हैं मेरे सामने दुनिया तमाम जीनतों से सज कर आई तो मैं ने कहा मैं तेरी बुराई से अल्लाह की पनाह चाहता हूं। दुनिया ने कहा अगर तुम मेरे शर (ख़तरात) से बचना चाहते हो तो रुपये पैसे से दुश्मनी रखो क्यों कि दौलत और रुपये पैसे हासिल करना दुनिया को हासिल करना है जो उन से अलग थलग रहे वह दुनिया से बच जाता है। (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 38, पेज 251)
दुनिया ईमान को बर्बाद कर देती है
हदीस क़ुदसे हैः तरजुमाः दुनिया ईमान को इस तरह से खा जाती है जिस तरह से आग सूखे लकड़ी को खा जाती है।
दुनिया की महब्बत का डर
फरमाने नबवी है कि जायदाद न बनाओ, तुम दुनिया से मुहब्बत करने लग जाओगे (यानी दुनियादार बन जाओगे)। (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 38, पेज 250)
दुनियादारी का अंज़ाम
आज मुसलमानों को दीनदार बनकर अपना ईमान मजबूत करने की जरूरत है । ये बात समझ लेना चाहिए कि दुनियादारी के वजह से ईमान व अक़ीदे में कमजोरी और बिगाड़ पैदा हुआ और कमजोर ईमान के सबब ज़हालत व बदअमालियां और मुआशरे में तमाम खराबियां, बुराइयाँ और गुमराहियाँ पैदा हुई है नतीजतन अल्लाह का अजा़ब, दुश्मने इस्लाम (कुफ्फार) के हौसले बढ़े,नफ्स और शैतान गालिब हुए, ज़ालिम बादशाह मुसल्लत किये गए, भगवा लव ट्रेप, मोबलीचिंग और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड जैसे मामले पैदा हुए, आपसी महब्बत खत्म हुई, बालितो से जिहाद व मुखालफल के बजाय इत्त्तेहाद और मुहब्बत की चाहत है । तमाम हालात का ईलाज यही है कि दुनियादारी को तर्क किया जाए और दीनदारी की चाहत दिल में पैदा करके ईमान, इल्म व अमल में दुरूस्तगी और मज़बूती लाए।
दिल का बिगड़ना दुनियादारी के वहज से
हदीस : हज़रते हसन रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सहाबए किराम में तशरीफ़ लाये और फ़रमाया कौन है जो अल्लाह तआला से अंधेपन (जिहालत) का नहीं बल्कि बसारत (इल्मो हिदायत) का सवाल (मांग) करता है? होशियार हो जाओ, जो दुनिया की तरफ माइल हो गया और उस से बे-इन्तेहा उम्मीदें रखने लगा उसका दिल अंधा हो गया और जिसने दुनिया से अलाहिदगी करली और उस से कोई ख़ास उम्मीदें न रखीं, अल्लाह तआला उसे नूरे बसीरत अता फरमा दिया, वह तालीम के बगैर इल्म और तलाश के बग़ैर हिदायतयाब (हिदायत हासिल कर लिया) हो गया। (मुकाशफुतुल क़ुलूब, बाब न. 31, पेज 192)
दुनियादारी के वजह से कलमा रद्द
हदीस : हज़रत अनस बिन मलिक रदिअल्लाहु अन्हु से रिवायत है के रसूलल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “ कलमा बंदों से खुदा के अजाब को रोकता है जब तक के बंदे दुनिया के मामले को दिन के मामले पर तरजीह न दे, लेकिन जब वो अपनी दुनिया के मामले को दिन के मामले पर तरजीह दे (यानी जब दीन से ज्यादा दुनिया को मान्यता दे ) और फिर कलमा पढ़े तो ये कलमा उन पर रद्द कर दिया जाता है और अल्लाह तआला फरमाता है के तुम झूठे हो। (इब्ने अबिददुनिया)
दुनियादारी के वजह से आमाल बेकार
अल्लाह फ़रमाता है : (तर्जुमा) क्या हम तुम्हें बतादें कि सब से बढ़कर नाक़िस (अधूरा) अमल किन के हैं, उनके जिनकी सारी कोशिश दुनिया की ज़िन्दगी में गुम गई और वो इस ख़याल में हैं कि अच्छा काम कर रहे हैं। (सुरह का’फ, आयत न. 103-104)
हजरते विश्र रहमतुल्लाह अलैह से कहा गया कि फला आदमी मर गया है. आपने फ़रमाया उस ने दुनिया को जमा किया और आखिरत को जाया कर दिया, लोगों ने कहा वह तो यह यह नेंकिया किया करता था। आप ने फरमाया जिस के दिल में दुनिया की मुहब्बत हो उसे नेकी नफा नहीं पहुंचाती। (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 31, पेज 206)
दुनियादार की इबादत मक़बूल नहीं
हदीस : हुज़ूर सरकारे दो आलम ﷺ ने फरमायाः क़ियामत के दिन कुछ लोग ऐसे आएंगे कि उन के (नेक) आमाल वादिये तिहामा के पहाड़ों की मानिन्द होंगे, उन के लिये हुक्म होगा कि “इन को जहन्नम में ले जाओ।“ सहाबा ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! क्या वोह लोग नमाज़ी होंगे ? फरमायाः हां! वोह लोग नमाजें भी पढ़ते होंगे और रोज़े भी रखते होंगे और रात का कुछ हिस्सा जाग कर अल्लाह की इबादत भी करते होंगे, लेकिन उन में (बुरी) बात येह होगी कि जब दुन्या की कोई चीज़ उन के सामने आती उस पर कूद पड़ते थे । (यानी दुनिया से मुहब्ब्त करते थे) (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 31, पेज 206)
दुनियादारी के वजह से दुअ़ा रद्द
हिकायत : हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम एक रोते हुए शख़्स के पास से गुजरे, जब आप वापस हुए तो वह शख़्स वैसे ही रो रहा था, मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह त‘आला से अर्ज़ किया या अल्लाह! तेरा बन्दा तेरे डर से रो रहा है, अल्लाह त‘आला ने कहा, ऐ मूसा! अगर आँसू के रास्ते उस का दिमाग़ बाहर निकल आए और उसके (दुआ के लिए) उठे हुए हाथ टूट जायें तब भी मैं उसे नहीं माफ करूँगा क्योंकि यह दुनिया से मुहब्बत रखता है। (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 31, पेज 196)
मोबलिचिंग दुनियादारी के वजह से
हदीस : ह़जरत सोबान रदिअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ ने फरमाया अन करीब तमाम धर्म की कौमे तुम पर यूं टूट पड़ेगी जैसे खाने वाले खाने के बर्तन पर टूट पड़ते हैं सहाबा रदिअल्लाह अन्हु ने कहा क्या ऐसा मुसलमानों की आबादी की कमी के वजह से होगा आपने फरमाया मुसलमान उस जमाने में ज्यादा होंगे लेकिन सैलाब की झाग (कोई काम का नही) की तरह, दुश्मन के दिल से मुसलमानों का रोब व दबदबा निकल जाएगा (यानी मुसलमानों से काफिर नहीं डरेंगे) तुम्हारे दिल में वहन डाल दी जाएगी सहाबा रदिअल्लाहु अन्हुम ने पूछा कि वहन क्या चीज है आपने फरमाया दुनिया से मोहब्बत और मौत से नफरत (सुनन इब्ने दाउद, हदीस न. 2245)
मालो दौलत की लालच अल्लाह को भुलने का सबब
अल्लाह फ़रमाता हैः तुम्हें ग़ाफ़िल रखा माल की ज़ियादा तलबी (लालच) ने , यहाँ तक कि तुमने क़ब्रों का मुंह देखा (यानी मर गया) हाँ हाँ जल्द जान जाओगे (आखि़रत में), फिर हाँ हाँ जल्द जान जाओगे, हाँ हाँ अगर यक़ीन का जानना चाहते तो (अगर हक़ीक़त जानने की कोशिश करते) तो माल की मोहब्बत न रखते (सुरहः तकासुर, आयत न 1-5)
अल्लाह को भूलने वाले मुसलमान नुकसान में
अल्लाह फ़रमाता हैः ऐ ईमान वालो, तुम्हारे माल न तुम्हारी औलाद कोई चीज़ तुम्हें, अल्लाह के याद से ग़ाफ़िल न करे और जो ऐसा करे तो वही लोग नुक़सान में हैं (सुरहः मुनाफिकीन, आयत न 9)
रुपया जमा करने वालो पर जा़लिम बादशाह का अजा़ब
हज़रते अली रदीयल्लाहु अन्हु से मरवी है हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जब लोग फकीरों से दुश्मनी रखें, दुनियावी शौकत व हशमत का इजहार करें और रुपया जमा करने पर लालची हो जायें तो अल्लाह त‘आला उन पर चार मुसीबतें नाजिल फ़रमाता है,1 कहत साली (बेरोजगारी), 2 जालिम बादशाह (प्रधानमंत्रा) , 3 खाइन (खयानत दार) हाकिम और , दुश्मनों की हैबत (जैसे बजरंग दल, शिव सेना , आर एस एस)। (मुकाशफतुल कुलूब, बाब 34, पेज 229)
इस्लामी हुकू़मत का छिन‘ना
रसूल ﷺ ने फरमाया इस उम्मत को बशारत दे दो कि दीनदारी के वजह से ही उसको बुजुर्गी (मर्तबा) हासिल है और शहरों पर हुकूमत (कब्जा और गिरफ्त), जब तक वह दीन का काम दुनिया के हुसूल के लिए न करें यानी मुसलमानों को दुनिया में उस वक्त तक बुजुर्गी और दुनिया के शहरों पर उनकी हुकूमत रहेगी जब तक वह दीन का काम दुनिया हासिल करने के लिए नही करेंगे, उनके आमाल खालिस रहेंगे। (गुनियतुत्तालिबीन, बाब 17, पेज 505)
इल्में दुनिया की मजम्मत (Side Effect) :
हदीस : हज़रत अबु हुरैरा रदीअल्लाहु अन्हु से मरवी है फ़रमाते है रसूले अक़रम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि जिस ने वह इल्म हासिल किया जो सिर्फ अल्लाह त‘आला की रजा़ हासिल हो और अगर उसने इल्स इस लिए हासिल किया हो कि उस इल्म के जरिए दुनियावी माल इकट्ठा करे तो क़ियामत के दिन वह लोग ज़न्नत की खुशबू भी न सुंघ पाएंगे। (अत्तरगी़ब व तरहीब, जिल्द 1)
नसीहत : अगर आप दुनियादार है और दुनियावी माल हासिल करने के लिए स्कूल व कॉलेज में पढ़कर नौकरी तालाश कर रहे है तो फौरन नियत बदल ले और अल्लाह की रज़ा तलाश करने में लग जाए ताकि दुनियावी जिन्दगी और उखरवी ज़िदगी दोनों सवंर जाए सिर्फ दुनियावी जिन्दगी के लिए उखरवी जिन्दगी को खराब करना बेवकूफी, जिल्लत, मुसिबत, लानत और दोनो जहां में हलाक़त ही हलाकत है।
मुसलमानों पर कुफ़्फार का दबदब
हदीस : ह़जरत सोबान रदिअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ ने फरमाया अन करीब तमाम धर्म की कौमे मुसलमानों पर यूं टूट पड़ेगी जैसे खाने वाले खाने के बर्तन पर टूट पड़ते हैं सहाबा रदिअल्लाह अन्हु ने कहा क्या ऐसा मुसलमानों की आबादी की कमी के वजह से होगा आपने फरमाया मुसलमान उस जमाने में ज्यादा होंगे लेकिन सैलाब की झाग (कोई काम का नही) की तरह, दुश्मन के दिल से मुसलमानों का रोब व दबदबा निकल जाएगा (यानी मुसलमानों से काफिर नहीं डरेंगे) तुम्हारे दिल में वहन डाल दी जाएगी सहाबा रदिअल्लाहु अन्हुम ने पूछा कि वहन क्या चीज है आपने फरमाया दुनिया से मोहब्बत और मौत से नफ़रत (सुनन इब्ने दाउद, हदीस न. 2245)
पिछली उम्मत की हलाकत की वजह दुनियादारी है
फ़रमाने नबवी है दुनिया सब्ज़ (खुश आइन्द) और मीठी है। अल्लाह तआला ने तुम्हें अपना ख़लीफा बना कर भेजा है और वह तुम्हारे आमाल से बा-ख़बर है। बनी इस्राईल पर जब दुनिया फ़राख़ कर दी गई तो उन्होंने अपनी सभी कोशिशें, जेवरात, कपड़ों, औरतों और इतरियात के लिए वक्फ कर दी थी। (और उनका अंजाम तुम ने देख लिया यानी वो हलाक हो गये) (मुकाशफतुल , बाब 31, पेज 188)
बनी इस्राईल दुनियादारी के वजह से मूर्ति पूजा की शुरुआत की
हजरते हसन रज़ियल्लाहु अन्हु का कौल है कि दुनिया की मुहब्बत में डूब कर बनीं इस्राईल (पिछली उम्मत) ने अल्लाह की इबादत को छोड़ कर मूर्ति की इबादत शुरू की थी। (मुकाशिफतुल क़ुलूब, बाब 31)
दुनियादार के लिए आखि़रत में हिस्सा नही
अल्लाह फरमाता है : जो आखि़रत की खेती ( नेयमत) चाहे हम उसके लिये उसकी खेती (नेयमत) बढ़ाएं और जो दुनिया की खेती चाहे हम उसे उसमें से कुछ देंगे और आख़रित में उसका कुछ हिस्सा नही ; सूरह – शूरा, आयत नं. 20
हदीस : रसूल ﷺुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि आखिरत की नियत पर (अमल करने वाले को) अल्लाह तआला दुनिया भी देता है लेकिन दुनिया की नियत पर अमल करने वाले को) आखिरत नहीं मिलेगी। (गुनियतुत्तालिबीन, बाब 17, पेज 505
मौत के वक़्त दुनिया क्या कहती है?
अल्लाह त‘आला दुनिया को बूढ़ी औरत के शक़्ल में मरने वालों के सामने पेश करता है और वो दुनिया उसे कहती है ऐ आसी तू शर्म नहीं करता था तू मेरी तलब में गुनाहों में मुबतला हो जाता था और गुनाहों से बाज़ नहीं रहता था तू ने मुझे तलब क्या मैं ने तुझे तलब नहीं किया यहां तक के तू हलाल ओ हराम में तमीज नहीं करता तेरा गुमान था के तो दुनिया से जुदा नहीं होगा पस अब मैं तुझ से और तेरे अमल से बेज़ार हूं । (कुर्रतुल अबसार, पेज 38)
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Zalim Badshah Allah Ke Huqm Se
ज़ालिम बादशाह अल्लाह के हुक्म से
हर काम अल्लाह के हुक़्म से
जान लो और मान लो कि हर काम अल्लाह के हुक़्म से ही होता है। क़ुरआन में है ” उसके (अल्लह के) हुक्म से आसमान और ज़मीन क़ायम हैं। (सूरह रूम, आयत 25)
क़ुरआन में दूसरी जगह है ” उसी के हैं जो कोई आसमानों और ज़मीन में हैं, सब उसके (अल्लाह के) ज़ेरे हुक्म हैं।(सूरह रूम, आयत 26)
आगर किसी के साथ बुरा हुवा तो वो भी अल्लाह का हुक़्म से हुवा क्योंकि किसी के साथ बुरा इसलिये हुवा की वो उसी लायक था, अगर किसी के साथ अच्छा हुआ तो वो भी अल्लाह के हुक़्म से हुवा क्योंकि वो उसी लायक था। अल्लाह फ़रमाता है : जो शुक्र करे वह अपने भले को शुक्र करता है और जो नाशुक्री करे तो बेशक अल्लाह बेपर्वाह है। (सुरह लुकमान, आयत न 12)
बुराई खुद की तरफ से
अल्लाह फ़रमाता है तर्जमा : ऐ सुनने वाले तुझे जो भलाई पहुँचे वो अल्लाह की तरफ से है और जो बुराई पहुंचे वो तेरी अपनी तरफ से है। (कंजुल ईमान, सूरह निसा, आयात न 79)
मुसीबत खुद की वजह से
अल्लाह फ़रमाता है (तर्जुमा) : जो मुसीबत पहुंची वह इसके सबब से है जो तुम्हारे हाथों ने कमाया (यानी खुद से गुनाह किया) । (सूरह शूरा, आयत न. 30)
मुसलमान अपनी परेशानी का वजह खुद है
क़ुरआन में है : बेशक हम उस शहर वालों पर आसमान से अज़ाब उतारने वाले हैं बदला उनकी नाफ़रमानियों का। (सूरह-अंकबूत, आयात न. 34)
क़ुरआन में है : बेशक जो ईज़ा (तकलीफ) देते हैं अल्लाह और उसके रसूल को उनपर अल्लाह की लअनत है दुनिया और आखि़रत में और अल्लाह ने उनके लिये ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है।(सूरह अहजाब, 57)
अल्लाह को भूलने का अंजाम
अल्लाह फ़रमाता है (तर्जुमा) : उन जैसे न हो जो अल्लाह को भूल बैठे तो अल्लाह ने उन्हें बला में डाला कि अपनी जानें याद न रही वही फ़ासिक़ हैं । (सूरह हस्र, आयत न. 19)
जैसा करेगा वैसा भरेगा
सरकारे दो आलम का फरमाने आलीशान है कि “नेकी पुरानी नही होती और गुनाह भुलाया नही जाता, जजा देने वाला यानी अल्लाह कभी फ़ना नही होगा, लिहाजा जो चाहे कर, तू जैसा करेगा वैसा भरेगा।“ (बहरूद्दमुअ, पेज 38)
ज़ालिम लोग पर ज़ालिम बादशाह
हज़रत यहया बिन हाशिम और हजरत यूसुफ बिन इस्हाक से रिवायत है कि नबी सलल्लाहो अलैहे वसल्लम का इरसद पाक है कि “जैसे तुम होगे वैसे ही तुम्हारे सरदार (हाकिम) मोकर्रर किये जायेंगे।“ (वैहेकी)
गुनाहगार अजाब का हक़दार
जो लोग अल्लाह तआला के अहकामात की मुखालिफत करते हैं वह इस अमर (अंजाम ) से डरें कि उन्हें फितना या दर्दनाक अज़ाब पहुँचे।“ (मुकाशफुतुल कुलूब, बाब 52)
ज़ालिम बादशाह (मोदी) गुनाहों के वजह से
हज़रत अबूदर्दा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : नेकी का हुक्म देते रहना और गुनाहों से रोकते रहना नही तो अल्लाह तआला तुम पर ऐसे जालिम हाकिम (मोदी सरकार जैसा) मुकर्रर कर देगा । जो तुम्हारे बुजुर्गों का ऐहतिराम नही करेगा, तुम्हारे बच्चों पर रहम नही करेगा, तुम्हारे बड़े बुलायेंगे लेकिन उनकी बात नही मानी जायेगी, वह मदद तलब करेंगे मगर उन की मदद नही की जायेगी और वह बख़्सिस तलब करेंगे मगर उन्हें नही बख़्शा जायेगा । (सुन्नी फजाईले आमाल, सफा न. 792)
ज़ालिम बादशाह (मंत्री) का हुकूमत अल्लाह के हुक़्म से
हज़रत अबू दरदा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है- उन्होंने कहा, नेकी का हुक्म देते रहना और बुराई से रोकते रहना, नहीं तो अल्लाह तआला तुम पर ऐसे हाकिम मुर्कार कर देगा जो तुम्हारे बुजुर्गों का एहतेराम नहीं करेगा, तुम्हारे बच्चों पर रहम नहीं करेगा, तुम्हारे बड़े बुलायेंगे लेकिन उन की बात नहीं मानी जायेगी, वह मददगार तलब करेंगे मगर उन की मदद नहीं की जाएगी और वह बख़्शिश तलब करेंगे मगर उन्हें नहीं बख़्शा जाएगा। (मुकाशफतुल कुलूब, बाब 15)
ज़ालिम बादशाह अल्लाह की नाराज़गी के वजह से
हज़रत कतादा से रिवायत है के हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से अर्ज़ किया की तेरी रज़ा और नाराज़गी का अलामत क्या है? अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया तुम्हारे (लोगों के) ऊपर नेक लोगों को बादशाह बनाना मेरे राजी़ होने की अलामत है और बुरे लोगों (जैसे मोदी और योगी) को बादशाह बनाना मेरे नाराज़ होने की आलमत है। (अज़ाबे इलाही और उसके असबाब, पेज 97)
इस उम्मत में ज़ालिम बादशाह का खास अज़ाब
हदीस: हज़रत उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया आखिरी ज़माने में मेरी उम्मत को अपने हुक्मरानों (मोदी जैसो) से सख्त तकलीफें पहुँचेंगी उन से निजात नहीं पायेगा मगर वह शख्स जिस ने अल्लाह के दीन को पहचाना और उस पर अपनी जबान, हाथ और दिल के साथ जिहाद किया यह वह शख्स है जो पूरी तरह सबक़त ले गया दूसरा वह आदमी जिस ने अल्लाह के दीन को पहचाना और उस की तसदीक की, तीसरा वह आदमी जिस ने अल्लाह के दीन को पहचाना और उस पर खामोश रहा। अगर किसी को नेकी करते देखा तो उस से मोहब्बत करने लगा और अगर किसी को गलत काम करते देखा तो उस से नाखूश रहा। यह सब अपनी अन्दरूनी हालत के बाइस निजात पा जायेंगे। (बैहकी)
ज़ालिम बादशाह का ज़ुल्म का असर
हज़रत मुजाहिद फरमाते हैं के एक बादशाह ने तवील उमर पाई इस के दरबान बहुत सख्त थे एक दिन इस ने कहा मुझे मेरे मुल्क के बहुत कम लोग जानते हैं क्यों नहीं मैं लोगों में फिरूं ताके मुझे इल्म हो जाए के लोग क्या कहते हैं। इस ने -अपने दरबान से कहा मेरे पास कोई नहीं आए और लोगों को बता दो कि बादशाह बीमार है बादशाह वहां से निकल कर ऐक ऐसे आदमी के पास ठहरा जिसकी गाय 3 गाय के बराबर दूध देती थी। बादशाह हेरान हुवा और कहने लगा अगर में इस गाय को ले लूं तो इसका का दूध 3 गायों में के दूध से किफायत केरे गा, पस उस गाय की एक तिहाई दूध ख़ुश्क हो गया। बादशाह ने इस के मालिक से कहा तू ने इस को किसी और चरागाह में चराया है या किसी दूसरे चश्मे से पानी पिलाया है के इस का दूध कम हो गया इस ने कहा नहीं मेरे ख्याल में बादशाह के दिल में जुल्म का ख्याल पैदा हुआ जिसकी वजह से गाये के दूध की बरकत चली गई। बादशाह ने कहा बादशाह को तेरी क्या खबर।
उस ने कहा हक बात वही है जो मैंने तुझे कही है बादशाह के दिल में जब जुल्म का ख्याल पैदा होता है तो बरकत चली जाती है। बादशाह ने अल्लाह तआला से वादा किया कि वो कभी इस शख़्स की गाय नहीं ले सकता। बादशाह के अदल की वजह से गाये का दूध लौट आया। वह बादशाह कहने लगा. मुझे इल्म हो गया के बादशाह के ज़ुल्म की वजह से बरकत उठ जाती है।
हज़रत मूस इब्न ऐन फ़रमाते हैं हम हज़रत उमर बिन अब्दुल अल अज़ीज़ के ज़माना ख़िलाफ़त में किरमान के इलाक़े में बकरीयाँ चराते थे और जंगली जानवर और भेड़ें एक ही जगह में चरते थे एक रात अचानक एक भेड़िया एक बकरी पर हमलावर हुआ हम ने कहा जरूर किसी नेक आदमी का इंतकाल हुआ है। हज़रत हम्माद कहते हैं कि मुझ से हज़रत मूसा इब्न ऐन या किसी और ने बयान किया के उन्हों ने हिसाब लगाया तो इसी रात हज़रत उमर बिन अब्दुल अल अज़ीज़ का इंतक़ाल हुआ था। (अज़ाबे इलाही और उसके असबाब)
क़ौम पर ज़ालिम बादशाह का अज़ाब
हदीस : हज़रत इब्ने उमर रदियाल्लाहु अन्हु फरमाते है के रसूलल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पास मुहाजरीन सहाब के दस लोग बैठे हुए थे मैं उनमें से दसवां आदमी था, हुजूर सलल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने चेहरा मुबारक के साथ हमारी तरफ मुतवज्जह हुए और फरमायाः “ जिस कौम में बेहयाई आम हो जाए और लोग उसका खुल्लम खुल्ला बार-बार करने लगे तो वो कौम मुख्तलिफ बीमारी और परेशानी और ताऊन में मुब्तिला कर दी जाती है जो बीमारी उनसे पहले गुजरे हुए लोगों में मौजूद न थी और जो कौम नाप तोल में कमी करती है वो कहतसाली (बेरोजगारी), मशक्कत वो शिद्दत और बादशाह(प्रध्ांनमंत्री) के जुल्म में मुब्तिला कर दी जाती है और जो कौम अपने माल की जकात अदा नही करती वो रहमत की बारिश से महरूम (दूर) कर दी जाती है अगर जानवर न होते तो उनपर बरिश ही न बरसती और जो कौम अहद शिकनी/ वादा खि़लाफी करती हैं तो अल्लाह तआला इनपर इनके गैर (दूसरे धर्म जैसे बजरंग दल) से दुश्मन मुसल्लत कर देते है जो उनके माल वो जायदाद पर कबजा कर लेते हैं। और जब लोगों के हुक्मरान अल्लाह तआला के नाज़िल करदा अहकाम वो क़ुरान के मुताबिक अमल नहीं करते और कुरान मजीद के अहकाम को अहमियत और तरजीह नहीं देते तो अल्लाह तआला उनको आपस (लड़ाई) के अजाब में मुब्तिला कर देता हैं। (इब्ने माजा)
बादशाहों (मोदी व योगी) को बुरा न कहो बल्कि तौबा करो
हज़रत मालिक बिन दीनार फरमाते हैं कि तौरेत शरीफ़ में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है कि बादशाहों के दिल मेरे क़ब्ज़े में हैं जो मेरी हुक्म मानेगा मैं उस के लिये बादशाहों को रहमत बनाऊंगा और जो मेरी मुखालफत करेगा उस के लिये उन को अज़ाब बनाऊंगा फिर तुम बादशाहों को बुरा कहने में मश्गूल न हो बल्कि मेरी बारगाह में तौबा करो मैं उन को तुम पर महरबान कर दूंगा। (तम्बीहुल मुग्तरीन, अल बाबुल अव्वल, सब्रहम अला जोरुल हुक्काम, स. 43)
तौबा न करने वाला ज़ालिम है
अल्लाह फ़रमाता है : क्या ही बुरा नाम है मुसलमान होकर फ़ासिक़ कहलाना और जो तौबा न करें तो वही ज़ालिम हैं। (सूरह हुजरात, आयत न. 11)
ज़ालिम क़ौम पर ज़ालिम बादशाह
अल्लाह फ़रमाता है : हम ज़ालिमों में एक को दूसरे पर मुसल्लत करते हैं बदला उनके किये (यानी गुनाह का)। (सूरह – अनआम, आयत न. 129)
अल्लाह फ़रमाता हैः (तर्जमा) : यूंही हम (यानी मेरे हुक़्म से) ज़ालिमों में एक (ज़ालिम) को दूसरे (ज़ालिमों) पर मुसल्लत करते हैं बदला उनके किये का। (सूरह अनआम, आयत न. 129)
’आयत की तफ़्सीर :’ हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हु ने फ़रमाया कि अल्लाह जब किसी क़ौम की भलाई चाहता है तो अच्छों को उनपर मुसल्लत करता है, बुराई चाहता है तो बुरों को. इससे यह नतीजा निकलता है कि जो क़ौम ज़ालिम होती है उसपर ज़ालिम बादशाह मुसल्लत किया जाता है. तो जो उस ज़ालिम के पंजे से रिहाई चाहें उन्हें चाहिये कि ज़ुल्म (नाफरमानी) करना छोड़ दें. (ख़जाइनुल इरफान)
ऊपर के आयत से मालूम हो गया कि नाफ़रमान मुसलमानों पर काफ़िर या मुशरिक इतना ज़ुल्म जो कर रहे है ये मुसलमानों के ज़ुल्म का बदला है।
भलाई वाले हो जाओ
अल्लाह फ़रमाता है (तर्जुमा) : अल्लाह की राह में ख़र्च करो और अपने हाथों हलाक़त में न पड़ो, और भलाई वाले हो जाओ बेशक भलाई वाले अल्लाह के मेहबूब हैं। (सूरह – बक़रह, आयत न. 195)
उम्मीद करता हु इस पोस्ट पर अमल करके आप दुनियादारी (यानी माल की मोहब्बत) से तौबा करेंगे क्योंकिं दुनियादरी ही तमाम गुनाहो का जड़ है
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Tarke Duniya
इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह किताब मुकाशफतुल क़ुलूब में लिखते है “कुरआने मजीद में दुनिया की मजम्मत और दुनिया से तवज्जोह हटा कर आखिरत की जानिब माइल करने के लिए बेशुमार आयतें हैं बल्कि अम्बियाए किराम अलैहिमुस्सलाम को भेजने का सबब यही तर्के दुनिया थी (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 31)
दुनिया को तर्क क्यों करे?
हदीस : हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : दुनिया की महब्बत तमाम गुनाहों की जड़़ (असल) है।(मुकाशिफतुल क़ुलूब, बाब 31)
वाज़ेह हो जब इंसान आखि़रत की बजाए दुनिया की ज़िन्दगी को पसन्द करता है तो गुनाह को करने के लिए मजबूर और अल्लाह त‘आला से दूर हो जाता है।
अल्लाह फ़रमाता है (तर्जुमा) : क़ाफ़िर दुनिया की ज़िन्दगी पर इतरा गए और दुनिया की ज़िन्दगी आख़रित के मुक़ाबले नहीं मगर कुछ दिन बरत लेना (सूरह-रअद, आयत न. 26)
इसलिए दुनिया को तर्क करे
गुनाहों की तमाम अक़साम जैसे कुफ़्र व शिर्क व निफ़ाक़, सगीरा व कबीरा, फ़िस्क़ व फ़ुजूर, नाजाइज़ व हराम, ऐलानिया व ख़ूफ़िया में मुब्तला हो जाने की वजह यही दुनिया की महब्बत है यानी आख़रित को भूल कर दुनिया को तरजीह देना।
तर्के दुनिया का हुक़्म
हजरते अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिस ने दुनिया से मुहब्बत की उस ने आखिरत को नुकसान पहुंचाया और जिस ने आखिरत से मुहब्बत की उस ने दुनिया को किसी लाइक न समझा। तुम फानी दुनिया पर बाकी रहने वाली चीजों को तर्जीह दो (यानी आख़िरत से मुहब्बत करो और दुनिया से जरूरत का मामला रखो)।(मुकाशफतुल क़ुलूब, )
दुनिया को दुनियादारों के लिए छोड़ दो:
फरमाने नबवी है कि दुनिया दुनियादारों के लिए छोड़ दो, जिस ने अपनी ज़रूरत से ज़्यादा दुनिया ले ली. उस ने बेख़बरी में अपने लिए हलाकत ले ली। राहे खुदा में खर्च होने वाला माल बाक़ी रहता है (मुकाशफतुल क़ुलूब)
दुनिया को तरजीह (मान्यता) न दो
हज़रत ज़हाक रदियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पास एक शख़्स आया और सवाल किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! लोगों में ज़ाहिद कौन है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो क़ब्र और क़ब्र में जिस्म के गल जाने को नहीं भुलाता और दुनिया की बेजा ज़ेब व जीनत से गुरेज करता है और फ़ानी ( दुनिया ) पर बाक़ी ( आख़रत) को तरजीह देता है रोज़े फ़रदा को ज़िन्दगी में शुमार नहीं करता और अपने आप को मुर्दों में शुमार करता है। (तरगीब जि. 4)
तर्के दुनिया का सही माना
दुनियावी ज़िन्दगी मे आख़िरत का तलब दिल मे रखते हुवे तमाम हक़ वालों से दिली मुहब्बत करना और दुनिया को दीन का दुश्मन मानकर दुनिया और दुनिया की तमाम फ़ानी चीज़ों से मुहब्बत ना करना, सिर्फ जरूरतन इस्तेमाल करना वो भी अल्लाह, रसूलअल्लाह और औलिया अल्लाह के हुक़्म के दायरे में रहकर इसी काम का नाम तर्के दुनिया है।
तर्के दुनिया का गलत माना
बहुत सारे लोग तर्के दुनिया का गलत माना जानकर दुनियावी चीजो को इस्तेमाल करना ही छोड़ देता है जबकि दुनियावी सामान का इस्तेमाल उस चीज से मुहब्बत किये बगैर जरूरत के लिए इस्तेमाल करना जायज है जैसे माल की जरूरत जायज है लेकिन माल की मुहब्बत नाज़ायज़ है। जो आबादी से दूर रहकर जंगलों में ज़िन्दगी गुजारने की चाहत तय कर लेते है। खूब जान लेना चाहिए कि दौर के हिसाब से शैतान का ग़लबा एडवांस हुआ और जो सख्स दौर के मुताबिक शैतान का मुखालफ़त न करे ऐसा शख़्स मोहताजी का शिकार हो जाएगा जो शैतान के तरफ से है यानी उसपर शैतान का ग़लबा होगा , मोहताजी इंसान को कुफ्र की हद तक पहुचा सकता है। इसलिए मुआशरे में रहकर ज़िन्दगी जीना चाहिए ताकि हुक़ूक़ूल इबाद के फावायद से महरूम न रह जाये।
अक़्ल से दुनिया को तर्क करो
जो कुछ चीज़ तुम्हें दी गई है वह दुनियावी ज़िन्दगी का बर्तावा और उसका सिंगार और जो अल्लाह के पास है और वह बेहतर और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला तो क्या तुम्हें अक़्ल नहीं। (सुरह कसस, आयत न. 60)
दुनियादारो के लिए आख़िरत में कुछ हिस्सा नहीं
कोई आदमी यूँ कहता है कि ऐ रब हमारे हमें दुनिया में दे, और आख़िरत में उसका कुछ हिस्सा नहीं.
(सुरह बकरा , आयत न. 200)
काफ़िरों की निगाह में दुनिया की ज़िन्दगी आरास्ता की गई और मुसलमानों से हंसते हैं और डर वाले उनसे ऊपर होंगे क़यामत के दिन और ख़ुदा जिसे चाहे बेगिनती दे
(सुरह बकरा , आयात न. 212)
दुनियादारी से बचो
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है (तर्जमा) : तुम्हारे लिये रात और दिन बनाए कि रात में आराम करो और दिन में उसका फज़ल ढूंढो और इसलिये कि तुम हक़ मानो (यानी दीनदारी अपनाओ)। (कंजूल ईमान, सूरह क़सस, आयत नं. 73)
दुनिया को तर्क करना असल नेकी है
दुनिया की महब्बत दिल से निकाले बगै़र तौबा मुम्किन नहीं। बगै़र तौबा के हकी़की नेकी नहीं। हकी़की़ नेकी व तौबा के लिए दुनिया की महब्बत दिल से निकालना शर्त है। जो आख़रित से महब्बत करके उख़रवी ज़िन्दगी को हासिल करने के लिए सिर्फ़ दुनियवी चीज़ों को ज़रूरत के तहत इस्तेमाल करे वोह कामयाब हो जाएगा । अगर आख़रित को भूल कर दुनियवी चीज़ों से महब्बत करे और कुफ़्फ़ार की तरह दुनियवी ज़िन्दगी को पसन्द करे और कुफ़्फ़ार के तौर तरीके को अपनाए वोह हलाक़ हो जाएगा।
दुनिया की मिसाल गधे की तरह है जैसे कि मुसाफ़िर अपनी मंज़िल तक पहुंचने के लिए गधे का इस्तेमाल करता है वैसे ही तू आख़रित का मुसाफ़िर है और दुनियवी ज़िन्दगी एक सफ़र है और जितने भी इस्तेमाल के सामान है सब गधे की मानिन्द है लिहाज़ा तेरा माल व दौलत, सोना, चांदी, मकान, दुकान, मोबाईल, कंप्यूटर, कार, बाइक वग़ैरह चीज़े सब लानत के क़ाबिल हैं जो मौत के बाद साथ नहीं जाती। लिहाज़ा इन दुनियवी चीज़ों से महब्बत न करते हुए सिर्फ ज़रूरतन इस्तेमाल कर और हो सके तो जरूरत भी कम कर ले ये ख़ास लोगों यानी अल्लाह वालों की अलामत हैं। याद रख दुनिया व दुनियवी चीज़ों की ज़रूरत जाइज़ है लेकिन महब्बत नाजाइज़ है यहां तक की कुफ़्र है।
