Ilm Ki Ahmiyat

ilm ki Ahmiat

इल्म की अहमियत
कु़रआने अज़ीम में है कि ‘जानने वाले और न जानने वाले बराबर नहीं इल्म नूर है और जिहालत जु़ल्मत व अंधेरा, इल्म व अक्ल ही से इंसान हैवानात से मुम्ताज व जुदा हैं इमाम ग़जा़ली नक़्ल फरमाते हैं कि जिस इंसान के अन्दर इल्म नहीं वह हैवान के मुतरादिफ़ है। खाना, पीना, सोना, जागना, चलना फिरना वगैरह इंसान करता है तो जानवर भी यह चीजें करते हैं दोनों के दरम्यान फर्क़ करने वाली चीज़ सिर्फ़ इल्म है, अहादीस व आसार में इल्म और उलमा की काफी फ़जीलते इरशाद हुई हैं, जहाँ हुशूले इल्म की ताकीद की गई है, वहीं उलमा का एहतराम व अदब भी बताया गया है। (फ़ैज़ाने आला हज़रत, पेज 94)

इल्म से ईमान की हिफाज़त और अमल की दुरुस्तगी
ईमान लाने के बाद और नेक अमल करने से पहले, इल्मे दीन का हुसुल बहुत जरुरी है क्योंकि इल्मे दीन हक़ व बतिला को पहचान कर ईमान की हिफ़ाजत और नेक अमल को इख़लास व दुरुस्त तरीके से अदा करने का एक जरिया है। ईमाने मुफ़सस्ल के बाद इल्मे नाफ़े का हुसुल नेक अमल से पहले है यानी पहले ईमान फिर इल्म फिर अमल ये तीन स्टेप्स है। इल्म से ही ईमान मजबूत और अमल दुरुस्त होता है। जहालत पूरा पूरी हलाक़त है। अल्लाह जब किसी से भलाई का इरादा करता है तो उसे इल्म के जरिये हिदायत यानी हक़ व बातिल को पहचाने का समझ बुझ अता करता है। (फाउंडर)

इल्मे दीन हासिल करने का हुक़्म

किताब मिन्हाजुल आबिदीन में इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह तहरीर फ़रमाते है  “ऐ इख़्लास की आरज़ू करने वाले और ऐ सच्ची इबादत की तलब करने वाले, अल्लाह ﷻ तुझे नेक अमल करने की तौफीक दे। सब से अव्वल तुझ पर येह लाज़िम है कि शरीअत का इल्म हासिल कर क्यूंकि येह इबादत का बुनियाद है और इसी पर इस का दारोमदार है और तू जान ले कि इल्म और इस के मुताबिक़ इबादत दो ऐसे कमाल हैं कि मुसन्निफीन की तस्नीफात, मुअल्लिमीन की ता’लीमें, वाइज़ीन के नसीहतों, ग़ौर फिक्र करने वालो की नज़रो फ़िक वगैरा जो भी तुम देख या सुन रहे हो सब कुछ इस इल्म व अमल में कमाल हासिल करने के लिये हैं बल्कि आसमानी किताब, अम्बिया का भेजा जाना, सातों आस्मानों और ज़मीनों और इन की दरमियानी मख़्लूक की पैदाइश भी इसी लिये है।

तुम कुरआने मजीद की इन दो आयतों पर तो ज़रा गौर करो :

पहली आयात (तर्जुमा) अल्लाह है जिसने सात आसमान बनाए और उन्हीं के बराबर ज़मीनें हुक्म उनके बीच उतरता है ताकि तुम जान लो कि अल्लाह सब कुछ कर सकता है अल्लाह का इल्म हर चीज़ को घेरे है (सूरह तलाक, आयत न. 12)

सिर्फ येही एक आयत फ़ज़ीलते इल्म के सुबूत काफ़ी है, ख़ास कर इल्मे तौहीद के लिये ।

दूसरी आयात (तर्जुमा) “मैं ने जिन्नों और इन्सानों को सिर्फ अपनी इबादत के लिये पैदा किया है। (सूरह जारियात, आयत न. 56 )

येह आयते करीमा शराफ़ते इबादत के सुबूत के लिये काफ़ी है, इस आयत से येह मालूम हुवा कि बन्दे पर अपने रब की बन्दगी लाज़िम है, तो इस इल्म व इबादत को ही सब से ज़ियादा अज़मत वाली चीज़ तसव्वुर करना चाहिये क्यूंकि पैदाइशे काइनात से मक्सूद इन्हीं दो चीज़ों में कमाल हासिल करना है, इस लिये बन्दे को चाहिये कि इन्हीं दो के साथ मश्गुल रहे, इन्हीं दो के हुसूल के लिये मशक्कतें बरदाश्त करे और इन्हीं दो में गौरो फ़िक्र करता रहे।

ऐ अज़ीज़ ! तू यकीन कर कि इन दो के सिवा जो कुछ दुन्या में है सब बातिल है क्योंकि ईमान जैसी कीमती दौलत की हिफ़ाज़त इन्ही दोनों के जरिये मुमकिन है इसके अलावा जो कुछ है फुजूल है जिससे कुछ हासिल नहीं और उससे कोई भलाई नहीं । (मिन्हाजुल आबिदीन, बाब 1 )

इल्म वाले ही अल्लाह से डरते है
अल्लाह फ़रमाता है :  (तर्जमा) अल्लाह से वही डरते हैं जो इल्म वाले हैं।(कंज़ुल ईमान, सूरह फ़ातिर, आयत न 28)

अल्लाह से डरने वाले यानी इल्म वाले ही शैतान से बचते हैः
अल्लाह फ़रमाता है :  (तर्जमा) बेशक वो जो डर वाले हैं जब उन्हें किसी शैतानी ख़याल (वसवसों) की ठेस लगती है होशियार हो जाते हैं उसी वक़्त उनकी आँखें खुल जाती हैं। । (कंज़ुल ईमान, सूरह आराफ़, आयत न 201)

अल्लाह डरने वालों (इल्म वालों) के साथ है
अल्लाह फ़रमाता है :  (तर्जमा) : बेशक अल्लाह उनके साथ है जो डरते हैं और जो नेकियां करते हैं। (कंज़ुल ईमान, सूरह – नहल, आयत न. 128)

इंसान की ज़िंदगी इल्म से
हदीस : इंसान की ज़िंदगी रूह से है और रूह की ज़िंदगी अक़्ल से है और अक़्ल की ज़िंदगी इल्म पर मुनहसिर (निर्भर) है । (नूरुल हुदा, पेज 8)

जहालत हलाकत है
हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: तुम ख़ुद आलिम हो जाओ, या तालिबे इल्म (इल्म सीखने वाले) हो जाओ, या आलिम की बातें सुनने वाले हो जाओ, या अदना दर्जा ये कि आलिम से महब्बत रखने वाले हो जाओ, और पाँचवा (यानी इन चार के अलावा) ना होना कि हलाक हो जाओगे ।
(शुअबुल ईमान, जिल्द: 3, पेज: 229, हदीस : 1581 मकतबातुर रूशद)

इल्म दिल की जान है
दिल मुर्दा है और उसकी जान इल्म है, इल्म भी मुर्दा है और उसकी जान इल्म हासिल करने से है (यानी इल्म की हद नहीं तो इल्म हासिल करने का भी हद नही और इल्म हासिल करने से कभी भी सुस्ती या रुकना नही चाहिए)
(हज़रत सिद्दिके अक़बर रदीयल्लाहु अन्हु)

सिर्फ इल्म वाले ज़िंदा है
तमाम इंसान मुर्दा हैं ज़िंदा वो हैं जो इल्म वाले हैं,
तमाम इल्म वाले सोये हुए हैं बेदार वो हैं जो अमल वाले हैं, तमाम अमल वाले घाटे में हैं फायदे में वो हैं जो इख्लास वाले हैं, तमाम इख्लास वाले खतरे में हैं कामयाब वो हैं जो तकब्बुर से पाक हैं।

दिल – दिल ज़िंदा तब होगा जब इल्म होगा।

इल्म – इल्म ज़िंदा तब होगा जब इल्म का हासिल करना जारी रहे यानी इल्म का तलब।

हुसूले इल्म – हुसूले इल्म ज़िंदा तब होगा जब किताबो को पढ़ा जाए और इल्म वालो की सोहबत में रहा जाए

अपना जायजा ले क्या आपका दिल ज़िन्दा है क्या आपका इल्म ज़िंदा है, क्या आपका हुसूले इल्म यानी इल्मी जज्बा ज़िंदा है।

याद रहे वो हुसूले इल्म (इल्मी तलब या जज्बा) मुर्दा है जिससे दुनिया कमाने की नीयत हो , वो इल्म जो हासिल किया हुआ है वो भी मुर्दा है अगर उससे दुनिया कमाया जाए , और वैसे इल्म वाले लोग का दिल मुर्दा है जिसके दिल मे दुनिया की मुहब्बत यानी दुनियादारी हो।
दीनी इल्म इसलिए है की उससे हक़ को पहचाना जाए नाकि बातिल (दुनिया) को अपनाया जाए।

नोट : फिर जब दिल के आ’माल, बातिनी अस्बाब और उन अश्या पर गौर करोगे जिन का जाइज़ या नाजाइज़ होना इस किताब में मज़कूर है फिर तुम्हें उन उमूर की पहचान भी हो जाए जिन की  तुम्हें इबादत में ज़रूरत है जैसे तुहारत, नमाज़ और रोजा वगैरा का इल्म। खुलासा येह कि जब तुम्हें तमाम मुन्दरिजए बाला चीज़ों का पूरी तरह इल्म व यक़ीन हो गया, तो अब तुम उम्मते मुहम्मदिय्या के पुख्ता ईल्म वाले उलमा के जुमरे में शामिल हो गए। अब अगर तुम ने इल्म के मुताबिक पूरी तरह अमल भी किया और अपनी आखिरत दुरुस्त और आबाद करने में लग गए तो तुम आबिद होने के साथ साथ एक साहिबे बसीरत आलिम भी बन गए और दीन के बारे में अब तुम व फ़ज़्ले खुदा जाहिल या गाफिल नहीं रहे और न ही किसी के मुक़ल्लिद रहे। तुम्हें ऐसे शरफ़ पर मुबारक देनी चाहिये तुम्हारे इल्म की बहुत ज़ियादा कीमत है और तुम्हें इस पर बहुत ज्यिदा सवाब मिलेगा और तुम ने इल्म की घाटी को उबूर कर लिया और तहसीले इल्म के बारे में अल्लाह ﷻ का जो तुम पर हक़ था उसे तुम ने अल्लाह की मदद से अदा कर दिया।
अल्लाह ﷻ से इल्तिजा है कि वोह हमें और तुम्हें दीन पर काइम रहने की तौफीक अता फरमाए ।

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