दीन का काम बग़ैर पैसों से न होगा
(फतावा रज़्वीया के हवाले से)
हदीस में इरशादे मुस्तफ़ा ﷺ है कि (तर्जमा) “एक ज़माना ऐसा आएगा की दीन का काम भी बे रुपया के न चलेगा।”
हुज़ूर आला हज़रत फरमाते है कोई बाकायदा (ढंग का) आलीशान मदरसा तो आपके (मुसलमानों के) हाथ में नहीं, कोई अख़बार पर्चा आपके यहाँ नहीं, मुदर्रेसीन, वाइजीन, मुनाजेरीन, मुसन्नेफीन की कसरत बक़दरे हाजत (जितना जरूरत है) आपके (मुसलमानों के) पास नहीं, जो कर सकते (काबिल) हैं वो फारिगुल-बाली (उनके पास वक़्त) नहीं, जो फारिगुल बाली (जिनके पास वक़्त है) हैं वह अहल (क़ाबिल) नहीं, बाज़ ने खूने जिगर खाकर किताबे लिखी तो छपीं कहाँ , किसी तरह से कुछ छपा तो तक़सीम कैसे हो. दीवान नहीं, नाविल नहीं कि हमारे भाई कम पैसे के चीज को थोड़ा ज्यादा पैसा देकर शौक से खरीदें (यह सोच कर की मुसलमान भाई को ही तो दे रहा हु), यहाँ तो सर चपेटना (यानी दाम कम करा कर दीनी किताबों को भी खरीदना है), रुपया ज्यादा हो तो मुम्किन कि यह सब शिकायात रफा (खत्म) हों।
- अज़ीमुश्शान मदारिस खोले जाएं, बाकायदा तालीमें हों।
- तलबा को वज़ाइफ (स्कॉलरशिप) मिलें कि ख़्वाही नख्वाही गिरवीदह हों। (यानी चाह के भी किसी के तरफ पैसा के लिए न झुके)
- मुदर्रिसों की ज्यादा से ज्यादा तन्ख्वाहें उनकी कार्रवाइयों पर दी जाएं कि लालच से जान तोड़ कर (यानी जरूरत पूरा हो ताकि) कोशिश करें।
- तबाए तलबा (मदारिस के बच्चो) की जाँच हो जो जिस काम के ज़्यादा मुनासिब देखा जाए मकूल वज़ीफा (पेमेंट) देकर उसमें लगाया जाए। यूं उनमें कुछ मुदर्रेसीन बनाए जाएं, कुछ वाइज़ीन, कुछ मुसन्नेफीन, कुछ मुनाजेरीन, फिर तस्नीफ व मुनाज़रा में भी तौजीअ हो। कोइ किसी फन पर कोई किसी फन पर।
- उन में जो तैयार होते जाएं, तन्ख़्वाहें देकर मुल्क में फैलाए जाएं कि तहरीरन (लिखकर) और तक़रीरन वअज़न (बयान) व मुनाज़रतन (मुनाजरा के जरिये) दीन व मज़हब को फैलाये , जब आपके उलमाए हक़ मुल्क में फैलें उस वक़्त कौन उनकी कुव्वत का सामना कर सकता है।
- हिमायत मज़हब व रददे बद मज़हब में मुफीदे कुतुब व रसाइल, मुसन्निफों को नज़राने देकर तस्नीफ कराए जाएं।
- तस्नीफ शुदह और नए तस्नीफ रसाइल उम्दा और खुश ख़त (पम्पलेट) छाप कर मुल्क में मुफ्त शाए किए जाएं।
- शहर शहर में अक़ाइद व आमाल का निगरानी करने वाला कोई रहें जहाँ जिस किस्म के वाइज़, मनाज़िर या तस्नीफ की हाजत हो आपको इत्तिला दें, आप सरकूबी आदा के लिए अपनी फौजें, मैगज़ीन, रिसाले, भेजते रहें।
- जो हम में काबिलकार (दीनी ख़िदमत के लायक का शख्स) मौजूद हो लेकिन अपनी रोजगार के वजह से मशगूल हैं. वजा़इफ़ मुक़र्रर (पेमेंट दे) कर के फा़रिगु़ल- बाली (दीन के लिए वक़्त देने वाला) बनाए जाएं, और जिस काम में उन्हें महारत हो, लगाए जाएं।
- आपके मज़हबी अख़बार शाए हों और वक़्तन फ़वक़्तन हर किस्म के हिमायते मज़हब में मज़मीन तमाम मुल्क में बकीमत व बिला कीमत (फ्री) में रोज़ाना या कम अज कम हफ़्तावार पहुँचाते रहें। उसके बाद आप आगे फरमाते हैं:
मेरे (यानी आला हजरत के) ख्याल में तो यह तदाबीर हैं, रुपया होने की सूरत में अपनी कुव्वत फैलाने के अलाया गुमराहियों की ताकतें तोड़ना भी इन्शाअल्लाहुल-अजीज आसान होगा। मैं देख रहा हूँ कि गुमराहों के बहुत से लोग सिर्फ तन्ख्वाहों के लालच से जहर उगलते (यानी बातिल मसाइल बताते) फिरते हैं, उनमें जिसे दस की जगह बारह (हज़ार) दीजिए अब आपकी सी कहेगा (जो बोलना बोले जाए वही बोलेंगे) , या कम अज़ कम बलुक्मा दोख़्ता बह तो होगा।
देखिए हदीस का इरशाद सादिक है कि (तर्जमा)’आखिर जमाना में दीन का काम भी दिरहम व दीनार से चलेगा।”
और क्यों न हो कि सादिक व मज़दूक सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का कलाम है, आलिम मा काना वमा यकूनु सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की खबर है। (फतावा रज़्वीया जिल्द 12, स० 133, 134)


