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Amal O Ibadaat

Ummat Par Nabi ﷺ Ke Huqooq I उम्मत पर हुज़ूर ﷺ के हुक़ूक

हुक़ूके नबी ﷺ के लिए उम्मत पर तक़ाज़े

ज़ाहिर है कि हुजूर सरवरे अंबिया महबूबे किब्रिया ने अपनी उम्मत के लिए जो जो मशक्कतें उठाई उनका तकाज़ा है कि उम्मत पर हुजूर के कुछ हुकूक है जिनको अदा करना हर उम्मती पर फ़र्ज़ व वाजिब है (यानी हर हाल में करना है)।

उम्मतियों पर नबी के 8 हुक़ूक

हज़रत अल्लामा काजी अयाज़ ने नबी के मुकद्दस हुकूक को अपनी किताब ‘शिफा शरीफ’ में बहुत ही मुफस्सल तौर पर बयान फ़रमाया है। हम यहाँ उनमें से कुछ का खुलासा तहरीर करते हुए निम्नलिखित 8 हुकूक का ज़िक्र करते हैं।

(1) ईमान बिरर्रसूल ﷺ
ईमान बिरर्रसुल से मुराद यह है कि हुजूरे अकदस की नुबुव्वत, रिसालत, जात व सिफात पर ईमान लाना यानी मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम को सच्चा जानना और हुजूर की हक्कानियत (जात व सिफात) को सिदक दिल से मानना और जो कुछ आप अल्लाह तआला की तरफ से लाए हैं सच्चे दिल से उसको सच्चा मानना हर हर उम्मती पर फर्ज़ ऐन है हर मोमिन का इस पर ईमान है कि बगैर रसूल ﷺ पर ईमान लाए हुए हरगिज़ हरगिज़ कोई मुसलमान नहीं हो सकता। कुरआन में खुदावंदे आलम जल्ला जलालुह का फरमान है किः-
अल्लाह फ़रमाता है : ऐ लोगो तुम्हारे पास ये रसूल ﷺ हक़ के साथ तुम्हारे रब की तरफ़ से तशरीफ़ लाए तो ईमान लाओ अपने भले को। (सूरह निसा, आयत न. 170)
 
तर्जमा : ईमान लाओ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ बे पढ़े ग़ैब बताने वाले पर (सूरह अराफ, आयत न 158)
 
तर्जमा : जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ पर ईमान न लाया तो यकीनन हमने काफिरों के लिए भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है। इस आयत ने बिल्कुल खुल्लम-खुल्ला और सफाई के साथ फैसला कर दिया कि जो लोग रसूल ﷺ की रिसालत पर ईमान नहीं लाएंगे वह अगरचे खुदा की तौहीद का उम्र भर डंका बजाते रहें मगर वह काफिर और जहन्नमी ही रहेंगे। इसलिए इस्लाम का बुनियादी कलिमा यानी कलिमा-ए-तय्यबाः ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह है। यानी मुसलमान होने के लिए ख़ुदा की तौहीद और रसूल ﷺ की रिसालत दोनो पर ईमान लाना जरूरी है।
 
कामिल ईमान की अलामत
हज़रत उमामा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि हुजूर ﷺ ने फरमाया कि जिस शख़्स ने अल्लाह तआला के लिये दिया और अल्लाह तआला के लिये रोका और जिसने अल्लाह ही के लिये मुहब्बत की अल्लाह ही के लिये दुश्मनी की तो उसका ईमान मुकम्मल हो गया। (अबू दाऊद-सुनन-6/555-ह-4681) 
हज़रत अब्दुल्लाह बिन हिशाम (रजिअल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि हज़रत उमर (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) ने हुजूर ﷺ से अर्ज़ किया कि या रसूल ﷺ मेरी जान के अलावा आप मुझे हर चीज से ज़्यादा महबूब हैं तो आप ﷺ ने फ़रमाया नहीं मुझे उस ज़ात की कसम जिसके कब्ज़े कुदरत में मेरी जान है कि ईमान उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं हो सकता जब तक मेरी जात तुम्हें अपनी जान से भी ज़्यादा महबूब न हो जाये तो हज़रत उमर (रजिअल्लाहु तआला अन्हु ने अर्ज़ किया कि अल्लाह की कसम आप मुझे मेरी जान से भी ज़्यादा महबूब और प्यारे हैं तो आपﷺ ने फ़रमाया ऐ उमर अब ( तेरा ईमान मुकम्मल हुआ) (बुखारी – सही – 6/143-ह-6632)
 
ईमान लाने वाले मेरे भाई है
हज़रत अनस (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि रसूल ﷺ अकरम ﷺ ने फ़रमाया कि मैंने ये चाहा कि मैं अपने भाइयों से मिलूँ तो सहाबा किराम (रजिअल्लाहु तआला अन्हुम) ने अर्ज़ किया या रसूल ﷺ क्या हम आपके भाई नहीं हैं तो आप (सल्लल्लाहु तआला ़) ने फ़रमाया कि तुम मेरे सहाबा हो लेकिन मेरे भाई वो होंगे जो मुझ पर ईमान लायेंगे हालाँकि उन्होंने मुझे देखा न होगा ।     ( मुस्नद अहमद – 5/476 हदीस-12607)
 
बगैर देखे ईमान लाने का हिसाब
हज़रत अबू उमामा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि हुजूर नबी ﷺ अलैहि व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमाया खुशख़बरी और मुबारक बाद हो उसके लिये कि जिसने मुझे देखा और मुझ पर ईमान लाया और सात बार खुशख़बरी और मुबारक बाद हो उसके लिये कि जिसने मुझे नहीं देखा और मुझ पर ईमान लाया । (इब्ने हिब्बान-सही-8/401 – ह-7233)
 
1 हुज़ूर के इल्मे गैब पर ईमान 
मुतलकन इल्मे गैब का मुंकिर (इनकार करने वाला) काफिर है कि वह सरे ही से नबुव्वत का मुंकिर है, 
नबुव्वत कहते ही इल्मे गैब देने को।
इमाम काजी अयाज मालिकी रहमतुल्लाह तआला अलैह शिफा शरीफ में फरमाते हैंः नबुव्वत ग़ैब पर मुत्तला होने का नाम है (अल मलफूज जिल्द 3, पेज 8)
आयाते कुरआनिया से हुजूर के इल्मे गैब का सुबूत कुरआने अजीम फरमाता है।
ऐ मेहबूब अगर अल्लाह का फ़ज़्ल व रहमत तुमपर न होता  तो उनमें के कुछ लोग यह चाहते कि तुम्हें धोखा दे दे और वो अपने ही आपको बहका रहे हैं और तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेंगे और अल्लाह ने तुम पर किताब और हिकमत (बोध) उतारी  और तुम्हें सिखा दिया जो कुछ तुम न जानते थे  और  अल्लाह का तुमपर बड़ा फ़ज़्ल है  (सूरह निसा 113) तर्रजमा : ’ ऐ आम लोगो! अल्लाह इसलिए नहीं कि तुम्हें गैब पर मुत्तला फरमा दे हाँ अपने रसूल ﷺसे चुन लेता है जिसे चाहे ।
अल्लाह तआला आलेमुल-गुयूब है तो अपने गैब पर किसी को मुसल्लत नहीं फरमाता मगर अपने पसन्दीदा रसूल ﷺ को।
सिर्फ इज़हार ही नहीं बल्कि रसूल ﷺ को इल्मे गैब पर मुसल्लत फरमा दिया। 
और कुरआने करीम में इरशाद फरमाता है : यानी मेरा महबूब गैब पर बखील नहीं। (अल-तकवीर, 24 )
 
जिसमें इस्तेअदाद पाते हैं उसे बताते भी हैं, और जाहिर है कि बखील वह कि जिसके पास माल हो और सर्फ न करे, यह कि जिसके पास माल ही नहीं क्या बखील कहा जाएगा और यहाँ बखील की नफी की गई तो जब तक कोई चीज सर्फ की न हो क्या मफ़ाद हुआ, लिहाजा मालूम हुआ कि हुजूर गैब पर मुत्तला है और अपने गुलामों को उस पर इत्तिला बख्शते हैं। और फरमाता है 
हमने तुम पर यह किताब हर शय का रौशन ब्यान कर देने के लिए उतारी (अल-बहल 89) 
अल्लाह व रसूल ﷺ की मुहब्बत पैदा होने का जरिया
तिलावते कुरआन मजीद और दरूद शरीफ़ की कसरत और नाअत शरीफ के सही अश्आर खुश इल्हानों से बकसरत सुने और अल्लाह व रसूल ﷺ की नेअमतों और रहमतों में जो उस पर हैं गौर करें तो इन चीज़ों से दिल में ख़ुदा व रसूल ﷺ  सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की मुहब्बत पैदा होगी। (अल-मल्फूज अव्वल, स 115 ) 
 
हुज़ूर पर हर चीज रौशन हो गई
हदीस में है जिसे इमाम तिर्मिज़ी वगैरह ने दस सहाबा से रिवायत किया कि सहाबा किराम फरमाते हैं कि एक रोज़ हम सुबह को नमाज़े फ़ज के लिए मस्जिदे नब्बी में हाज़िर हुए और हुज़ूर की तशरीफ़ आवरी में देर हुई, यानी करीब था कि आफताब तुलूअ कर आए इतने में हुजूर तशरीफ फरमा हुए और नमाज़ पढ़ाई, फिर सहाबा से मुखातिब होकर फरमाया कि तुम जानते हो क्यों देर सबने अर्ज़ की अल्लाह व रसूल ﷺ खूब जानते हैं. इरशाद फरमाया मेरा रब सबसे अच्छी तजल्ली मैं मेरे पास तशरीफ लाया। यानी मैं एक दूसरी नमाज में मशगूल था इस नमाज में अब्द दरगाह माबूद में हाज़िर होता है और वहाँ खुद ही माबूद की अब्द पर तजल्ली हुई. उसने फरमाया ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम यह फरिश्ते किस बात में मुखासमा और मुवाहात करते हैं. मैंने अर्ज की कि मैं बे तेरे बताए क्या जानूँ?
“तो रब्बुल इज्जत ने अपना दस्ते कुदरत मेरे शानों के दरम्यान रखा और उसकी ठंडक मैंने अपने सीने में पाई और मेरे सामने हर चीज़ रौशन हो गई और मैंने पहचान ली। (तिर्मिज़ी) “
सिर्फ इसी पर इक्तिफा न फरमाया कि किसी वहाबी साहब को यह कहने की गुंजाइश न रहे कि “कुल्लु शैइन“ से मुराद हर शय मुतअल्लिक ब-शराए है, बल्कि एक रिवायत में फरमायाः
मैंने जान लिया जो कुछ आसमान और ज़मीन में है। और दूसरी रिवायत में फरमाया और मैंने जान लिया जो कुछ मश्रिक व मरिब तक है।
यह तीनों रिवायतें सही हैं तो तीनों लफ्ज़ इरशादे अक्दस से साबित हैं, यानी मैंने जान लिया जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, और जो कुछ मश्रिक से मग्रिब तक है हर चीज़ मुझ पर रौशन हो गई और मैंने पहचान लिया।
और रौशन होने के साथ पहचान लेना इसलिए फरमाया कि कभी शय मारूफ होती है, पेशे नज़र नहीं, और कभी राय पेश नजर होती है और मारूफ नहीं, जैसे हज़ार आदमियों की मज्लिस को छत पर से देखो वह सब तुम्हारे पेशे नज़र होंगे, मगर उनमें बहुत को पहचानते न होगे, इसलिए इरशाद फरमाया कि तमान अश्यिए आलम हमारे पेशे नज़र भी हो गई और हमने पहचान भी लिया कि उनमें न कोई हमारी निगाह से बाहर रही न इल्म से खारिज मुसलमान
 
देखें सूस
में बिला ज़रूरत तावील व तख्सीस बातिल व ना मस्मूअ है, अल्लाह अज्जा व जल्ल ने फरमाया हर चीज़ का रौशन ब्यान कर देने को यह किताब हमने तुम पर उतारी,
नबी ﷺ सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फरमाया हर चीज़ मुझ पर रौशन हो गई और मैंने पहचान ली।
तो बिलाशुबह यह रुयत व मारिफ़त जमीअ भक्नूनाते कलम व मक्तूबाते लौह को शामिल है जिसमें सब माकाना वमायकून रोजे अव्वल से रोज़े आखिरत तक व जुमला ख़्वातिर व जमाइर सब कुछ दाखिल । रसूल ﷺ फरमाते हैं बेशक अल्लाह ने मेरे सामने
दुनिया उठा ली है तो मैं इसे और इसमें जो कुछ क्यामत तक होने वाला है सबको ऐसा देख रहा हूँ जैसे अपनी इस हथेली को (कंजुल उम्माल )
और हुजूर के सदका में अल्लाह तआला ने हुज़ूर के गुलामों को यह मरतबा इनायत फरमायाः  एक बुजुर्ग फरमाते हैं वह मर्द नहीं जो तमाम दुनिया को मिस्लं हथेली के न देखे, 
 
2 हुज़ूर की तवस्सुल पर ईमान
अल्लाह का फरमान (तर्जमा) : अगर जब वह अपनी जानों पर ज़ुल्म करें तो ऐ मेहबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों और फिर अल्लाह से माफ़ी चाहें और रसूल ﷺ उनकी शफ़ाअत फ़रमाए तो (इस वसीले के जरिये) ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान पाएं (सूरह निसा, आयत न. 64)
 
बारगाहे खुदावंदी में रसूल ﷺ का वसीला
हुजूरे अकदस का बारगाहे इलाही में वसीला बना कर दुआ मांगना जायज़ बल्कि मुस्तहब है। इसीको तवस्सुल व इस्तिगासा व तशफ्फुअ वग़ैरह मुख्तलिफ नामों के साथ बोला जाता है। हुजूर को खुदा के दरबार में वसीला बनाना यह हज़राते अंबिया व मुरसलीन की सुन्नत और सलफे सालिहीन का अच्छा तरीका है। यह तवस्सुल (वसीला) हुजूर की पैदाइश से पहले आपकी जाहिरी जिंदगी में और आपकी वफाते अकदस के बाद तीनों हालतों में साबित है। चुनान्चे हम यहाँ तीनों हालतों में आप से तवस्ल करने की चन्द मिसालें निहायत ही इख़्तिसार के तौर पर ज़िक्र करते हैं।
 
पैदाइश से पहले वसीला का सबूत
रिवायत है कि हज़रते आदम अलैहिस्सलाम ने दुनिया में आ कर बारी तआला से यूँ दुआ मांगी कि तरजमाः ऐ मेरे परवरदिगार में तुझ से मुहम्मद के वसीला से सवाल करता हूँ कि तू मुझे माफ़ फ़रमा दे। अल्लाह तआला ने इर्शाद फ़रमाया कि ऐ आदम! तुमने मुहम्मद  को किस तरह पहचाना। हालांकि मैंने अभी तक उनको पैदा भी नहीं फ़रमाया। हज़रते आदम अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! जब तूने मुझे पैदा फ़रमा कर मेरे बदन में रूह फूँकी तो मैंने सर उठा कर देखा कि अशें मजीद के पायों पर ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह लिखा हुआ है। उससे मैंने समझ लिया कि तूने जिसके नाम को अपने नाम के साथ मिला कर अर्श पर तहरीर कराया है वह यकीनन तेरा सबसे बड़ा महबूब होगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि ऐ आदम! (अलैहिस्सलाम) बेशक! तुमने सच कहा । वो मेरे नज़दीक तमाम मख्लूक से ज़्यादा महबूब हैं। चूँकि तुमने उनको मेरे दरबार में वसीला बनाया है इसलिए मैंने तुमको माफ़ कर दिया। सुन लो कि अगर मुहम्मद न होते तो मैं तुमको पैदा न करता । इस हदीस को इमाम बैहकी ने रिवायत फ़रमाया है। (रूहुल बयान सूरए अहजाब, सफा-230)
 
नबी ﷺ के वसीले से जंग जितना
हुजूर नबीये करीम ﷺ की तशरीफ आवरी से पहले यहूद का यह तरीका था कि जब कभी काफिरों और मुश्रिकों से जंग होती थी और उन्हें ऐसा महसूस होता कि वह जंग हार जाएंगे तो उस वक़्त तौरात को सामने रखते और वह जगह खोल कर, जहाँ हुजूर नबीये करीम ﷺ की सिफात और कमालात का ज़िक्र होता, वहाँ हाथ रखते और यूँ दुआ मागंतेः ऐ खुदा हम तुझ से तेरे उस नबी का वास्ता देकर अर्ज करते हैं, जिस की बेअसत (यानी आखिरी नबी का आने) का तूने हम से वादा किया है, आज हमें अपने दुशमनों पर फतह दे। अल्लाह तआला हुजूर ﷺ के सदके में उन्हें फतह (जीत) देता। (क्या आप जानते है,19 )
 
जाहिरी हयाते अक़दस में वसीला का सबूत
 हज़राते सहाब-ए-किराम आपकी मुकद्दस मजलिस में हाज़िर होकर जिस एक नाबीना बारगाहे अकदस में हाज़िर हुआ अर्ज़ किया कि आप अल्लाह तआला से दुआ कर दें कि वह मुझे आराम बख़्शे । आपने फ़रमाया कि अगर तू चाहे तो मैं दुआ कर देता हूँ। अगर तू चाहे तो सब्र कर। सब्र तेरे हक में अच्छा है जब उसने दुआ के लिए इसरार किया तो आपने उसको हुक्म दिया कि तुम अच्छी तरह वुजू करके यूँ दुआ मांगो कि
तर्जुमा : या अल्लाह ! मैं तेरी बारगाह में सवाल करता हूँ और तेरे नबी -ए- रहमत का वसीला पेश करता हूँ या मुहम्मद  मैंने अपने परवरदिगार की बारगाह में आपका वसीला पेश किया है। अपनी इस ज़रूरत में ताकि वे पूरी हो जाए या अल्लाह तू मेरे हक में हुजूर की शफाअत कुबूल फरमा।
इस हदीस को तिर्मिज़ी व निसाई ने रिवायत किया है और तिर्मिज़ी ने फ़रमाया कि इमाम बैहकी व तबरानी ने भी इस हदीस को सही कहा है। मगर इमाम बैहकी ने इतना और कहा है कि उस नाबीना ने ऐसा किया और उसकी आँखें अच्छी हो गई। (वफाउल वफा, जिल्द-2, सफा 420 )
 
वफ़ाते अकदस के बाद वसीला
वफाते अकदस के बाद भी हज़राते सहाब-ए-किराम अपनी जरूरतों और मुसीबतों के वक़्त हुजूर को अपनी दुआओं में वसीला बनाया करते थे। बल्कि आपको पुकार कर आपसे मदद माँगा करते थे।
हिकायत गुनाहों की माफी के लिए नबी ﷺ का वसीला
 सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ाते शरीफ़ के बाद एक अरब देहाती आपके मुबारक रौज़े पर हाज़िर हुआ और रोज़ए शरीफ़ की पाक मिट्टी अपने सर पर डाली और अर्ज़ करने लगा, या रसूल ﷺ, जो आपने फ़रमाया हमने सुना और जो आप पर उतरा उसमें यह आयत भी है “वलौ अन्नहुम इज़ ज़लमू”. मैंने बेशक अपनी जान पर ज़ुल्म किया और मैं आपके हुज़ूर में अल्लाह से अपने गुनाह की बख़्शिश चाहने हाज़िर हुआ तो मेरे रब से मेरे गुनाह की बख़्शिश कराईये. इस पर क़ब्र शरीफ़ से आवाज़ आई कि तेरी बख़्शिश की गई.
 इससे कुछ मसअले मालूम हुए. अल्लाह तआला की बारगाह में हाजत अर्ज़ करने के लिये उसके प्यारों को वसीला बनाना कामयाबी का ज़रिया है. क़ब्र पर हाजत के लिये जाना भी ” जाऊका” में दाख़लि है। (खजाइनुल इरफान)
 
बारिश के लिए इस्तिगासा ( मदद ) : 
हज़रते अमीरूल – मोमिनीन फारूके आज़म के दौरे खिलाफ़त में सूखा पड़ गया तो हज़रते बिलाल बिन हारिस सहाबीने रसूल ﷺकी कब्रे अनवर पर हाज़िर होकर अर्ज किया कि या रसूल ﷺ! (3) अपनी उम्मत के लिए बारिश की दुआ फ़रमाएँ। वह हलाक हो रही है। रसूल ﷺने ख़्वाब में उनसे इर्शाद फ़रमाया कि तुम हज़रते उमर के पास जाकर मेरा सलाम कहो। खुशखबरी दे दो कि बारिश होगी। यह भी कह दो कि वह नर्मी इख़्तियार करें। उस शख्स ने बारगाहे ख़लिफ़त में हाज़िर होकर ख़बर दी। हज़रते उम यह सुन कर रोए । फिर कहा ऐ रब ! में कोताही नहीं करता मगर उसी चीज़ में कि जिससे मैं आजिज़ हूँ।
 
जीत के लिए आपका वसीलाः 
अमीरुल मोमिनीन हज़रते फारूके आज़म ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन कुर्त के हाथ अपना ख़त अमीरे लश्कर हज़रते अबू-उबैदा बिन- जर्राह के नाम मकामे ’यरमूक’ में भेजा। सलामती की दुआ मांगी। हज़रते अब्दुल्लाह बिन कुर्त जब मस्जिदे नबवी से बाहर आए तो उनको ख़याल आया कि मुझसे बड़ी गलती हुई कि मैं ने रोज़- -ए-अकदस पर सलाम नहीं अर्ज़ किया। चुनान्चे वापस लौट कर जब कब्रे अनवर के पास हाज़िर हुए तो वहाँ हज़रते आइशा हज़रते अब्बास व हज़रते अली व हज़रते इमाम हसन व हज़रते इमाम हुसैन हाज़िर थे। हज़रते अब्दुल्लाह बिन कुर्त ने उन हज़रात से जंगे यरमूक में इस्लाम की फतह के लिए दुआ की दरख्वास्त की तो हज़रते अली व हज़रते अब्बास ने हाथ उठा कर यूँ दुआ मांगी कि :- (वफाउल वफा)
“या अल्लाह ! हम उस नबी ﷺ-ए-मुस्तफा व रसूल ﷺे मुज्तबा कि जिनके वसीले से हज़रते आदम अलैहिस्सलाम की दुआ कुबूल हो गई और खुदा ने उनको माफ फरमा दिया, उनहीं के वसीला से दुआ करते हैं कि तू हज़रते अब्दुल्लाह बिन कुर्त पर उसका रास्ता आसान कर दे। दूर को नज़दीक कर दे। अपने नबी ﷺ के अस्हाब की मदद फ़रमा कर उनको कामयाबी अता फरमा दे।
उसके बाद हज़रते अली ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन कृर्त से फ़रमाया कि अब आप जाइए। अल्लाह तआला हज़रते उमर व अब्बास व अली व हसन व हुसैन व अज़्वाजे नबी ﷺ (3) की दुआ को रद्द नहीं फरमाएगा जबकि उन लोगों ने उसकी बारगाह में उस नबी ﷺ का वसीला पकड़ा है जो अकरमुल ( फतहुश्शाम जिल्द 1 सफा -105) 
 
3 इख्तियारे नबी ﷺ पर ईमान 
क़ुरआन में अल्लाह का फरमान (तर्जमा) : यह नबी ﷺ मुसलमानों का उनकी जान से ज़्यादा मालिक है(सूरह अहज़ाब, आयत न. 6)
तफ़्सीर :दुनिया और दीन के तमाम मामलों में. और नबी ﷺ का हुक्म उनपर लागू और नबी ﷺ की फ़रमाँबरदारी ज़रूरी. और नबी ﷺ के हुक्म के मुक़ाबले में नफ़्स की ख़्वाहिश का तर्क हर हाल में जरुरी है.
 
हुज़ूर के चाहने से क़िब्ला बदल गया
क़ुरआन में अल्लाह का फरमान है ( तर्जमा) : (ऐ नबी ﷺ) हम देख रहे हैं बार बार तुम्हारा आसमान की तरफ़ मुंह करना तो जरूर हम तुम्हें फेर देंगे उस क़िबले की तरफ़ जिसमें तुम्हारी ख़ुशी है अभी अपना मुंह फेर दो मस्जिदे हराम की तरफ़, और ऐ मुसलमानों तुम जहां कहीं हो अपना मुंह उसी की तरफ़ करो और वो जिन्हें किताब मिली है ज़रूर जानते है कि यह उनके रब की तरफ़ से हक़ है और अल्लाह उनके कौतुकों से बेख़बर नहीं (सूरह बक़रह, आयत न. 144)
पहले मुसलमानों का क़िब्ला काअबा नहीं था बल्कि बैतूल मुकद्दस क़िब्ला था । नबी ﷺ  को बैतुल मुकद्दस की तरफ मुँह करके नमाज़ पढ़ने का हुक्म दिया गया था और आप ﷺ रब तआला के हुक्म की पैरवी करते हुये बैतुल मुकद्दस की तरफ मुँह मुबारक करके नमाज़ अदा करते रहे अलबत्ता हुजूर ﷺ की चाहत ये थी कि कअबा को मुसलमानों का किब्ला बना दिया जाये और इसकी वजह ये नहीं थी कि आपको बैतुल मुकद्दस का किब्ला बनाया जाना पसंद नहीं था बल्कि इसकी कई वजह थीं एक ये कि खाना-ए-काबा हज़रत सय्यदना इब्राहीम अलैहिस्सलाम व उनके अलावा कसीर अम्बिया किराम (अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम ) का किब्ला था  चुनांचा एक दिन हालते नमाज़ में रसूल ﷺ अकरम ﷺ इस उम्मीद में बार बार आसमान की तरफ देख रहे थे कि अल्लाह के हुक़्म से किब्ले की तब्दीली का हुक्म आ जाये चुनांचा दौराने नमाज़ यही आयते करीमा नाज़िल हुई (यानी सूरह बक़रह, आयत न. 144)
 
आग दस्तर ख़्वान को नहीं जला सकी
हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु के घर सहाबए किराम की दावत थी। एक कपड़े का दस्तरख्वान लाया गया जो बहुत मैला था। आप ने वह दस्तर- ख़्वान भड़कते हुए तन्नूर में डाल दिया। सारा मैल जल गया लेकिन दस्तर- ख़्वान के कपड़े के तार भी गर्म न हुए। साथियों ने पूछाः ऐ सहाबिए रसूल, आग में कपड़ा क्यों न जला और इतना साफ कैसे हो गया? हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमायाः एक दिन हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस दस्तर ख़्वान से अपना हाथ और मुंह पोंछा था, उस दिन से आग इसे नहीं जलाती । ( मसनवी शरीफ)
 
ज़मज़म से भी अफ़ज़ल पानी
उलमा का कहना है कि दुनिया व आखि़रत के तमाम पानियों से अफज़ल और मुकद्दस वह पानी है जो हुजूरे अकदस सल्ललाहु अलैहि वसल्लम की उंगलियों से निकला, यहाँ तक कि यह पानी ज़मज़म से भी अफज़ल है। ( तफसीरे नईमी)
सरकार के कदमों की बरकत से फसल दो गुना 
 एक बार हुजूर शफीउल मुज़निबीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज़रतअनस रज़ियल्लाहु अन्हु के बाग़ में तशरीफ ले गए। सरकार के कदमों की बरकत से उनका बाग़ साल में दो बार फसल देने लगा। (बुखारी शरीफ) 
 
4 शफ़ाअते मुस्तफ़ा पर ईमान 
 
रसूल ﷺ पर ईमान लाने का एक मतलब ये भी है कि ये अक़ीदा रखा जाए कि नबी ﷺ उम्मतियों के लिए शफ़ाअत करेंगे लेकिन जिसका अक़ीदा ये हो कि नबी किसी का शफ़ाअत नहीं करेंगे वैसा शख्स बदअक़ीदा है ऐसे लोग शफ़ाते मुस्तफ़ा से महरूम रहेंगे जिसका अंजाम ये होगा कि उसे जहन्नम में रहना पड़ेगा।
 
हदीस 1 (तर्जमा) : मेरी शफ़ाअत रोज़े कयामत हक है जो इस पर ईमान न लाएगा इस के काबिल न होगा। (40 हदीसे शफ़ाअत)
हदीस 2 (तर्जमा) : मेरी शफाअत मेरी उम्मत में उनके लिए है जो कबीरा गुनाह वाले हैं।(40 हदीसे शफ़ाअत, पेज 13)
हदीस 3ः (तर्जमा) अबूबक्र अहमद इब्ने अली बग़दादी हज़रते अबू दाऊद रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी हुज़र शफीउल मुज्नेबीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं :- तर्जमा : मेरी शफअत मेरे गुनाहगार उम्मतियों के लिए है।(40 हदीसे शफ़ाअत, पेज 13)
अबू दरदा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने अर्ज की अगरचे जानी हो अगरचे चोर हो तब फ़रमाया अगरचे जानी हो अगरचे चोर हो बरखिलाफ ख़्वाहिशे अबू दरदा के (यानी जैसा कि अबू दरदा सोच रहे हैं वैसा नहीं बल्कि चोरों और जिनाकारों तक के लिए हुजूर की शफाअत है) (40 हदीसे शफ़ाअत, पेज 13)
हदीस (तर्जमा)ः  हज़रते अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी हुज़ूर शफीउल मुज्नेबीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं :-  रू-ए-ज़मीन पर जितने पेड़ पत्थर ढेले हैं मैं कयामत में उन सबसे ज्यादा आदमियों की शफअत फरआऊँगा । (40 हदीसे शफ़ाअत, पेज 14)
 
5 खत्मे नबूवत पर ईमान 
 
तमाम उम्मतियों पर हक़ है कि अल्लाह व रसूल के फ़रमान के मुताबिक नबी करीम को आख़री नबी जाने और खत्मे नबूवत को हक़ माने यानी इसके बाद कोई नबी नहीं आ सकता।
हुजूरे अकदस ﷺ ने फरमायाः अल्लाह तआला ने अपने पास लिख रखा है कि मैं ख़ातिमुल अम्बिया हूँ और मेरा ख़ातिमुन्बीय्यीन होना खुदा ने उस वक़्त लिख दिया था जब आदम अलैहिस्सलाम मिट्टी और पानी की हालत में थे और में तुम को अपनी इब्तिदाई हालत के बारे में ख़बर देता हूँ। मैं इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ हूँ और अपनी मां का वह ख़्वाब हूँ जो मेरी पैदाइश के वक्त उन्हों ने देखा था कि उनके अन्दर से एक नूर निकला था जिससे शाम के महल जगमगा उठे थे। (क्या आप जानते है, पेज 22)
 
6 हयाते नबी ﷺ बादे वफात पर ईमान
 
तमाम अंबिया किराम अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम की हयात, हकीकी हिस्सी दुनियवी है।
सही हदीस में है बेशक अल्लाह तआला ने ज़मीन पर अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम के ज़िस्म को खाना हराम फरमा दिया है, तो अल्लाह के नवी ज़िन्दा है, रिज़्क दिए जाते है । (निसाई )
 
नबी ﷺ जिन्दा है
दूसरी सही हदीस में है अंबिया सब जिन्दा हैं अपनी कब्रों में नमाजें पढ़ते हैं। (मिश्कात) 
 
मसला हयाते अंबिया
अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम हाले हयात व हाले वफात में हमेशा हर वक्त तैय्यिब व ताहिर हैं। अंबिया किराम अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम की मौत यानी उनके अज्सामे तैय्यबा से अरवाहे ताहिरा का जुदा होना सिर्फ एक आन के लिए होता है फिर वैसे ही जिन्दा हो जाते हैं जैसे हाले हयाते जाहिरी में थे जिस्म व रूह से मअन व लिहाज़ा उनका तरका नहीं बटता न उनके बाद उनकी अज़्वाज से निकाह जाइज़ (फ़ैज़ाने आला हज़रत, 61 )
अंबिया किराम अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम को मुर्दा कहना हराम, बल्कि मआजल्लाह बतौर तौहीन हो तो सरीह कुछ है, अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल ने शोहदा को मुर्दा कहने से मना फरमाया. अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम की हयात उन से बदरजहा जाइद है शहीद की हयात अहकामे दुनिया में नहीं उसका तरका बढ़ेगा. उसकी बीबी इद्दत के बाद निकाह कर सकेगी, बखिलाफ अंबिया किराम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ( हाशिया फतावा रज्वीया जिल्द अव्वल, सफा, 611)
 
7 हाज़िर व नाज़िर पर ईमान
 
 शरीअत  में हाज़िर नाज़िर के माना हैं। सारी दुनिया को देखना और दूर व नज़दीक की आवाज़ों को सुनना । या थोड़े से वक़्त में दुनिया भर की सैर कर लेना और एक आन में रूहानी या जिस्म मिसाली के साथ सैंकड़ों किलोमीटर की दूरी पर मदद के लिए पहुंच जाना ।(बुज़ुर्गों के अक़ाइद, पेज 300)
अल्लाह के महबूब बन्दों का हाज़िर व नाज़िर होना हक है। हुजूर सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और बड़े-बड़े उलमा-ए-किराम व बुजुर्गाने दीन का यही अकीदा है।  सुबूत मुलाहजा हो । 
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा से रवायत है। उन्होंने कहा कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया । अल्लाह ने मेरे लिए दुनिया के पर्दे उठा दिए हैं। तो मैं दुनिया को और जो कुछ भी उस में कयामत तक होने वाला है सब को ऐसा देखता हूँ जैसे कि अपनी इस हथेली को। (जरकानी अलल मवाहिब जि0ः 7 पे0ः 204 )
(2) मुहब्बते रसूल ﷺ
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(3) ताज़ीमे रसूल ﷺ
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(4) इताअते रसूल ﷺ
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(5) इत्तिबा-ए-सुन्नते रसूल ﷺ
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(6) दुरूद शरीफ की कसरत
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(7) मदहे रसूल ﷺ
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(8) कब्रे अनवर की ज़ियारत।

क़ब्रे अनवर की ज़ियारत
हुज़ूरे अक़दस के रोज़ा-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत सुन्नते मुअक्कदा क़रीब (वाजिब) यानी ज़रूरी है। मुसलमानों पर नबी ﷺ के हुक़ूक में से एक हक़ ये भी है कि हुज़ूरे अक़दस के रोज़ा-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत की जाए। मदीना मुनव्वरा में सरवरे दो आलम सल्लल्लाहु त’आ़ला अलैहि व सल्लम की आख़िरी आराम गाह है और यही मस्जिदे नबवी है, यही वोह मक़ाम है जहाँ आप हिजरत के बाद जलवा अफ़रोज़ हुए और तादमे आख़िर रहे। इसलिए अल्लाह त’आला के मुक़द्दस घर ख़ाना ए काबा में हज या उमरा की सआदत हासिल करने के बाद यहाँ की हाज़िरी दीनो दुनिया की फ़लाह व सआदत का मुजिब है। और क़ियामत के रोज़ रसूल ﷺ की शफाअत का ज़रीआ बनेगी। इसलिए क़ब्रे अनवर की ज़ियारत बहुत ज़रूरी है। ज़ियारत के बग़ैर वापस लौट आना सख़्त महरूमी और बद बख़्ती है। क़ुरआने पाक में बारगाहे रिसालत की हाज़िरी को गुनाहों की बख़्शिश व मग़फिरत का ज़रीआ क़रार दिया गया है।

क़ब्रे अनवर की ज़ियारत हर मुसलमान पर हक़ है
हदीस : (तर्जुमा) हज़रत अनस रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ हिजरत कर के जब मक्का शरीफ से तशरीफ लाये तो वहाँ की हर चीज़ पर अंधेरा छा गया और जब मदीना तय्यबा पहुँचे तो वहाँ की हर चीज़ रौशन हो गई हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मदीना मेरा घर है और उसी में मेरी क़ब्र हो गई और हर मुसलमान पर हक़ है कि उसकी ज़ियारत करे। (सीरते मुस्तफ़ा, अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी )

रोज़ा-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत का हुक़्म*
अल्लाह त’आला ने क़ुरआन मजीद में इर्शाद फरमाया किः- (तर्जुमा)
“और अगर ये लोग जिस वक़्त कि अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं आप के पास आ जाते और ख़ुदा से बख़्शिश मांगते और रसूल ﷺ उनके लिए बख़्शिश की दुआ फरमाते, तो ये लोग ख़ुदा को बहुत ज़्यादा बख़्शने वाला मेहरबान पाते”।
इस आयत में गुनाहगारों के गुनाह की बख्शिश के लिए अर्हमुराहिमीन ने तीन शर्तें लगाई हैं। पहले दरबारे रसूल ﷺ में हाज़िरी, दूसरे इस्तिग़फार, तीसरा रसूल ﷺ की दुआ ए मग़फिरत। येह हुक्म हुज़ूर की ज़ाहिरी दुनियावी ज़िंदगी ही तक महदूद नहीं।
बल्कि रोज़ा-ए- अक़दस में हाज़िरी भी यक़ीनन दरबारे रसूल ﷺ ही में हाज़िरी है। इसीलिए उलमा-ए-किराम ने खुलकर फ़रमा दिया है कि हुज़ूर के दरबार का फ़ैज़ आपकी वफ़ाते अक़दस से ख़त्म नहीं हुआ है। इसलिए जो गुनहगार क़ब्रे अनवर के पास हाज़िर हो जाए और वहाँ ख़ुदा से बख़्शिश की दुआ करे।
चूँकि हुज़ूर तो अपनी क़ब्रे अनवर में अपनी उम्मत के लिए इस्तिग़फार फ़रमाते ही रहते हैं इसलिए उस गुनहगार के लिए मग़फिरत की तीनों शर्तें पा ली गईं इसलिए इन्शाअल्लाह त’आला उसकी ज़रूर मग़फिरत हो जाएगी। यही वजह है कि चारों मज़ाहिब के उलमा-ए-किराम ने हज व ज़ियारत के बारे में लिखी हुई किताबों में यह तहरीर फ़रमाया है कि जो शख्स भी रोज़ा-ए-मुनव्वरा पर हाज़िरी दे उसके लिए मुस्तहब है कि इस आयत को पढ़े। फिर ख़ुदा से अपनी बख़्शिश की दुआ मांगे।
ऊपर की आयते मुबारका के अलावा बहुत सी हदीसें भी रोज़ा-ए- मुनव्वरा की ज़ियारत के फज़ाइल में वारिद हुई हैं जिनका अल्लामा समहूदी ने अपनी किताब ’वफ़ाउल वफ़ा’ और दूसरे मुस्तनद सलफ़े
सालिहीन उलमा-ए-दीन ने अपनी-अपनी किताबों में नक़ल फरमाया है। हम यहाँ मिसाल के तौर पर सिर्फ़ चंद अहादीस नक़ल करते हैं।

मस्जिदे नबवी में दाख़िल :
मस्जिदे नबवी में दाख़िल होते वक़्त पहला दाहिना क़दम रखें और मस्जिदे नबवी में दाख़िल होते वक्त यह दुआ पढ़े: (तर्जुमा) ऐ अल्लाह ! दुरूद भेज हमारे सरदार मुहम्मद मुस्तफा स़ल्लल्लाहु त’आला अलैहि वसल्लम और उनकी आल पर ऐ अल्लाह ! मेरे गुनाहों को बख़्श दे और मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे ऐ अल्लाह आज के मुझे तेरी तरफ मुतवज्जह होने वालो में सब से ज़्यादा मुतवज्जह बना ले। तेरा क़ुर्ब हासिल करने वालो में सब से ज़्यादा क़रीब बना ले और ज़्यादा फाइज़ुलमराम कर उन्ही से जिन्हो ने तुझ से दुआ की और अपनी मुरादें मांगी“ (सुन्नी फ़ज़ाइले आमाल, पेज 379)

गोया मेरी ही ज़ाहिरी ज़ियारत की
हदीस 1: (तर्जुमा) : हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जिस ने मेरी हयाते ज़ाहिरी के बाद हज किया और मेरी क़ब्र की ज़ियारत को आया तो गोया उसने मेरी ज़ाहिरी हयात में मेरी ज़ियारत की (बैहक़ी शो’बुल ईमान)

मेरी शिफाअत ज़रूरी हो गई
हदीस 2: (तर्जुमा) : हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जिस शख़्स ने मेरी क़ब्र की ज़ियारत की उसके लिए मेरी शिफाअत ज़रूरी हो गई। (दारे कुतनी)

वोह क़ियामत में मेरे पड़ोसी
हदीस 3: (तर्जुमा) आले ख़िताब के एक आदमी की रिवायत है कि रसूल ﷺ ने फ़रमाया कि जो शख़्स इरादा कर के मेरी ज़ियारत करे वोह क़ियामत में मेरे पड़ोस में होगा और जो शख़्स मदीना में क़ियाम करे और वहाँ की तंगी पर सब्र करे मैं उसके लिए क़ियामत में गवाह और सिफारिशी हूँगा। और जो हरमे मक्का या हरमे मदीना में मर जाए वोह क़ियामत में अमन वालो में उठेगा। (बैहक़ी शो’बुल ईमान)


दो मबरूर हज्जों का सवाब
हदीस 5: (तर्जुमा) हज़रत इब्ने अब्बास रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि जो शख़्स हज्ज के लिए मक्का मुकर्रमा जाए उसके बाद मेरी मस्जिद में आए उस के लिए दो मबरूर हज्जों का सवाब होगा। (अल इतहाफ़)

क़ब्रे अनवर के पास दरूद पढ़ना
हज़रत अबू हुरैरा रदीअल्लाहु अन्हु से रिवायात है कि जो शख़्स भी मेरी क़ब्र के पास आ कर मुझ पर दुरूद और सलाम पेश करे तो अल्लाह त’आला मेरी रूह तक पहुँचा देता है उसके सलाम का जवाब देता हूँ। (सुन्नी फ़ज़ाइले आमाल, पेज 377)

क़ब्रे अनवर के पास से दरूद का जवाब
हज़रत अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु त’आला अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि जो शख़्स मेरी क़ब्र के पास खड़ा हो कर मुझ पर दुरूद पढ़ता है मैं उसको ख़ुद सुनता हूँ और जो किसी और जगह दुरूद पढ़ता है तो उसकी दुनिया और आख़िरत की ज़रूरतें पूरी की जाती हैं और मैं क़ियामत के दिन उसका गवाह और उस की सिफारिशी हूँगा।“ (बैहक़ी)

रहमत का नुज़ूल और हाजत पूरी होना
इब्ने अबी फ़दीस का बयान है कि जो शख़्स हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु त’आला अलैहि वसल्लम की क़ब्रे मुबारक के पास खड़े हो कर यह आयत पढ़े। 3) उसके बाद 70 मर्तबा सल्लल्लाहु अलैका या मुहम्मद कहे तो एक फिरिश्ता कहता है कि ऐ शख्स अल्लाह जल्ल शानोहु तुझ पर रहमत नाज़िल करता है और उसकी हर हाजत पूरी कर दी जाती है“ (बैहकी)

इसीलिए सहाबा ए किराम के मुक़द्दस ज़माने से लेकर आज तक तमाम दुनिया के मुसलमान क़ब्रे मुनव्वर की ज़ियारत करते और आपकी मुक़द्दस बारगाह में वसीला और मदद करते रहे हैं इन्शाअल्लाह त’आला क़ियामत तक यह मुबारक सिलसिला जारी रहेगा।

एक देहाती का वाक़िआ
हज़रते अमीरुल मोमिनीन अली मुर्तजा रदीअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि वफ़ाते अक़दस के तीन दिन बाद एक देहाती मुसलमान आया। क़ब्रे अनवर पर गिर कर लिपट गया। फिर कुछ मिट्टी अपने सर पर डाल कर यूँ अर्ज़ करने लगा कि ’या रसूल ﷺ आपने जो कुछ फ़रमाया हम उस पर ईमान लाए हैं। अल्लाह त’आला ने आप पर क़ुरआन नाज़िल फरमाया जिसमें उसने इरशाद फ़रमाया कि (तर्जुमा :अगर ये लोग जिस वक़्त कि अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं आप के पास आ जाते और ख़ुदा से बख़्शिश मांगते और रसूल ﷺ उनके लिए बख़्शिश की दुआ फरमाते, तो ये लोग ख़ुदा को बहुत ज़्यादा बख़्शने वाला मेहरबान पाते।) तो या रसूल ﷺ मैंने अपनी जान पर (गुनाह करके) ज़ुल्म किया है इसलिए मैं आपके पास आया हूं ताकि आप मेरे हक़ में मग़फिरत की दुआ फरमाएँ। देहाती की इस फरियाद के जवाब में क़ब्रे अनवर से आवाज़ आई कि ऐ देहाती तू बख़्श दिया गया“ (वफ़ा उल वफ़ा, जिल्द-2, सफ़ा 412)

हुज़ूर अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी अलैहिर्रहमह सीरते मुस्तफ़ा किताब में लिखते है
ज़रूरी तंबीहः नाज़िरीने किराम येह सुन कर हैरान होंगे कि मैंने अपनी आँखों से देखा है कि गुंबदे ख़ज़रा के अन्दर मवाजले अक़दस और उसके क़रीब मस्जिदे नबवी की दीवारों पर क़ब्रे मुनव्वरा की ज़ियारत की फज़ीलतों के बारे में जो हदीसें कुन्दा की हुई थीं नज्दी हुकूमत ने इन हदीसों पर मसाला लगवाकर उनको मिटाने की कोशिश की है। अगरचे अब भी उसके कुछ हुरूफ़ ज़ाहिर हैं। इस तरह मस्जिदे नबवी के गुंबदों के अन्दरूनी हिस्से में क़सीद-ए-बुर्दा शरीफ के जिन अशआर में तवस्सुल और इस्तिग़ासा के मज़ामीन थे, उन सबको मिटा दिया गया है। बाकी अशआर बाकी गुंबद पर उस वक्त तक बाकी थे। मैंने जो कुछ देखा है वह जुलाई 1959 ईसवी का वाक़िआ है। इसके बाद वहाँ क्या तब्दीली हुई? उसका हाल नए हुज्जाजे किराम से पूछना चाहिए। (सीरते मुस्तफ़ा, पेज 534 हिदी)

(1) ईमान बिरर्रसूल ﷺ

Ummat Par Nabi ﷺ Ke Huqooq I उम्मत पर हुज़ूर ﷺ के हुक़ूक Read More »

Zakat

जका़त तहसीलने का हुक़्म
अल्लाह फ़रमाता है (तर्जमा) : ऐ महबूब उनके माल में से जका़त तहसील करो जिससे तुम और भी उन्हें सुथरा और पाकीज़ा कर दो उनके हक़ में दुआए खैर करो बेशक तुम्हारी दुआ उनके दिलों का चैन है और अल्लाह सुनता जानता है। (कंजूल ईमान, सूरह तौबा, आयत न. 103)

ज़कात से हिदायत और परहेज़गारी का हुसुल
क़ुरआन में है (तर्जमा) : हिदायतयाफ्ता और परहेज़गार वो है जो हमारी दी हुई रोज़ी में से हमारी राह में उठाएं (खर्च करे)। (कंजूल ईमान, सूरह बक़रह, आयत नं. 2,3)

कामयाबी ज़कात की अदायगी में
क़ुरआन में है (तर्जमा) : कामयाब होते है वो जो ज़कात अदा करते है। (कंजूल ईमान, सूरह मोमीनून, आयत नं. 4)

ज़ाक़त देने वाले को न कुछ डर न कुछ ग़म
क़ुरआन में है (तर्जमा) : वो जो अपने माल अल्लाह की राह में ख़र्च करते है फिर दिये पीछे न एहसान रखें न तकलीफ़ दें उनका नेग उनके रब के पास है और उन्हें न कुछ डर हो न कुछ ग़म। (कंजूल ईमान, सूरह बक़रह, आयत नं. 262)

ज़कात देने वालो को दो गुना अजर
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है (तर्जमा) : उनको उनका अजर दो गुना दिया जाएगा बदला उनके सब्र का और वो भलाई से बुराई को टालते हैं और हमारे दिये से कुछ (2.5%) हमारी राह में ख़र्च करते हैं। (कंजूल ईमान, सूरह क़सस, आयत नं. 54)

ज़कात अदा किए बगैर भलाई हासिल नहीं कर सकते
क़ुरआन में है (तर्जमा) : तुम हरगिज़ भलाई को न पहुंचोगे जब तक राहे खुदा में अपनी प्यारी चीज़ ख़र्च न करो और तुम जो कुछ ख़र्च करो अल्लाह को मालूम है। (कंजूल ईमान, सूरह इमरान, आयत नं. 92)

ज़कात देना असल नेकी और परहेज़गारी है
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है (तर्जमा) : कुछ अस्ल नेकी यह नहीं कि मुंह मश्रिक़ (पूर्व) या मग़रिब (पश्चिम) की तरफ़ करो हाँ अस्ल नेकी ये कि ईमान लाए अल्लाह और क़यामत और फ़रिश्तों और किताब और पैग़म्बर पर और अल्लाह की महब्बत में अपना अज़ीज़ माल दे रिश्तेदारों और यतीमों और मिस्कीनों और राहगीर और सायलों (याचकों) को और गर्दन छुड़ाने में और नमाज़ क़ायम रखे और ज़कात दे, और अपना क़ौल पूरा करने वाले जब अहद करें,और सब्र वाले मुसीबत और सख़्ती में और जिहाद के वक़्त, यही हैं जिन्होंने अपनी बात सच्ची की, और यही परहेज़गार हैं। (कंजूल ईमान, सूरह बक़रह, आयत नं. 177)

ज़कात न देने वालो के लिए दर्दनाक अज़ाब
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है (तर्जमा) : वो जो जोड़ कर रखते हैं सोना और चांदी और उसे अल्लाह की राह में ख़र्च नहीं करते उन्हें ख़ुशख़बरी सुनाओ दर्दनाक अज़ाब की, जिस दिन वह तपाया जाएगा जहन्नम की आग में फिर उससे दाग़ेंगे उनकी पेशानियाँ और कर्वटें और पीठें यह है वह जो तुमने अपने लिये जोड़ कर रखा था अब चखो मज़ा उस जोड़ने का।
(कंजूल ईमान, सूरह तौबा, आयत नं. 34- 35)

वो माल अच्छा नही बल्कि बुरा है
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है (तर्जमा) :
जो बुख़्ल (कंजूसी) करते हैं उस चीज़ में जो अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से दी हरगिज़ उसे अपने लिये अच्छा न समझें बल्कि वह उनके लिये बुरा है अन्करिब वह जिसमें बुख़्ल किया था क़यामत के दिन उनके गले का तौक़ होगा और अल्लाह ही वारिस है आसमानों और ज़मीन का और अल्लाह तुम्हारे कामों से ख़बरदार है।(कंजूल ईमान, सूरह इमरान, आयत नं. 180)

माल जमा करने वालो का अंजाम
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है (तर्जमा) : जिसने माल जोड़ा और गिन गिन कर रखा, क्या वह समझता है कि उसका माल उसे दुनिया में हमेशा रखेगा हरगिज़ नहीं ज़रूर वह रौंदने वाली में फ़ैका जाएगा और तूने क्या जाना क्या रौंदने वाली अल्लाह की आग के भड़क रही है वह जो दिलों पर चढ़ जाएगी बेशक वह उनपर बन्द कर दी जाएगी लम्बे लम्बे सुतूनों में।(कंजूल ईमान, सूरह हुमाज़ह, आयत नं. 2-9)

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सदक़ा की फज़ीलत

सदक़ा की फज़ीलत

बहारे शरीअत हिस्सा 5 में है “अल्लाह तआ़ला की राह में माल खर्च करना निहायत अच्छा काम है। माल से तुम अगर अल्लाह को राज़ी न कर सके तो वो माल तुम्हारे क्या काम का है और अपने काम का वही है जो खा लिया, पहन लिया और आखि़रत के लिए अल्लाह के राह में ख़र्च किया न कि वह जो जमा किया । (बहारे शरीअ़त, हिस्सा 5)”

ज़न्नती ज़ेवर बाब 5 में है  ” ज़कात व उश्र व सदक़ए फित्र येह तीनों तो वाजिब हैं जो इन तीनों को न अदा करेगा सख़्त गुनहगार होगा। इन तीनों के इलावा नफ्ली सद़का देने और ख़ुदा की राह में खै़रात करने का भी बहुत बड़ा सवाब है और दुनिया व आख़िरत में इस के बड़े बड़े फ़वाइद व मनाफ़ेअ हैं।”

हदीस न.1 :- सही मुस्लिम शरीफ में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी हुज़ूरे अक़दस ﷺ फ़रमाते हैं बन्दा कहता है मेरा माल है, मेरा माल है और उसे तो उसके माल से तीन ही क़िस्म का फ़ायदा है जो खाकर फ़ना कर दिया या पहन कर पुराना कर दिया या अदा करके आख़िरत के लिए जमा किया और उसके सिवा जाने वाला है कि औरों के लिए छोड़ जाएगा।

हदीस न. 2 :– बुखारी व नसई इब्ने मसऊद रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी हुज़ूर ﷺ फ़रमाते हैं तुम में कौन है कि उसे अपने वारिस का माल अपने माल से ज़्यादा महबूब है। सहाबा ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह! हम में कोई ऐसा नहीं जिसे अपना माल ज़्यादा महबूब न हो। फ़रमाया अपना माल तो वह है जो आगे रवाना कर चुका और जो पीछे छोड़ गया वह वारिस का माल है।

हदीस न. 3 : इमाम बुखा़री अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं अगर मेरे पास उहुद (अरब के एक पहाड़ का नाम) बराबर सोना हो तो मुझे यही पसन्द आता है कि तीन रातें न गुज़रने पाएं और उसमें का मेरे पास कुछ रह जाये हाँ अगर मुझ पर दैन (क़र्ज़) हो तो उसके लिए कुछ रख लूँगा।

हदीस न. 4,5 :– सही मुस्लिम में उन्हीं से मरवी हुज़ूरे अक़दस ﷺ ने फ़रमाया कोई दिन ऐसा नहीं कि सुबह होती है मगर दो फ़िरिश्ते नाज़िल होते हैं और उनमें एक कहता है ऐ अल्लाह! ख़र्च करने वाले को बदला दे और दूसरा कहता है ऐ अल्लाह ! रोकने वाले के माल को तल्फ़ (बरबाद) कर और इसी के मिस्ल इमाम अहमद व इब्ने हब्बान व हाकिम ने अबू दरदा रदीकल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत की।

हदीस न.6 :– सहीहैन में है कि हुज़ूरे अक़दस ﷺ ने असमा रदीअल्लाहु त’आला अन्हा से फ़रमाया ख़र्च कर और शुमार न कर कि अल्लाह त’आला शुमार करके देगा और बन्द न कर कि अल्लाह त’आला भी तुझ पर बन्द कर देगा कुछ दे जो तुझे इस्तिताअत हो।

हदीस न.7 :- नीज़ सहीहैने में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं कि अल्लाह त’आला ने फ़रमाया ऐ इब्ने आदम ! ख़र्च कर मैं तुझ पर ख़र्च करूँगा।

हदीस न.8 :– सही मुस्लिम व सुनने तिरमिज़ी में अबू उमामा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया ऐ इन्ने आदम! बचे हुए का ख़र्च करना तेरे लिए बेहतर है और उसका रोकना तेरे लिए बुरा है और बक़द्रे ज़रूरत रोकने पर मलामत (बुराई) नहीं और उनसे शुरू कर जो तेरी परवरिश में हैं।

दीस न.9- सहीहैन में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी हुज़ूरे अक़दस ﷺ ने फरमाया बखी़ल (कंजूस) और सद़का देने वाले की मिसाल उन दो शख्सों की है जो लोहे की ज़िरह पहने हुए हैं जिन के हाथ सीने और गले से जकड़े हुए हैं तो सद़का देने वाले ने जब सद़का दिया वह ज़िरह कुशादा हो गई (फैल गई) और बख़ील (कंजूस) जब सद़का देने का इरादा करता है हर कड़ी अपनी जगह को पकड़ लेती है वह कुशादा करना भी चाहता है तो कुशादा नहीं होती।

हदीस न.10ः- सही मुस्लिम में जाबिर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह ﷺ फरमाते हैं ज़ुल्म से बचो कि ज़ुल्म क़ियामत के दिन तारीकियाँ है और बुख़्ल (कंजूसी) से बचो कि बुख़्ल ने अगलों को हलाक किया। इसी बुख़्ल ने उन्हें खून बहाने और हराम को हलाल करने पर आमादा किया।

हदीस न.11 :– नीज़ उसी में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी एक शख़्स ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह किस सदक़े का ज़्यादा अज्र है ? फ़रमाया उसका कि सेहत की हालत में हो और लालच हो मुहताजी का डर हो और तवंगरी (मालदारी) की आरज़ू यह नहीं कि छोड़े रहे और जब जान गले को आ जाये तो कहे इतना फुलाँ को और इतना फुलाँ को देना और यह तो फुलों का हो चुका है यअनी वारिस को।

हदीस न.12ः- सहीहैन में अबूज़र रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी कहते हैं मैं हुज़ूर ﷺ की खिदमत में हाज़िर हुआ और हुज़ूर काबए मुअज़्ज़मा के साए में तशरीफ़ फ़रमा थे मुझे देख कर फ़रमाया क़सम है रब्बे कअबा की वोह टोटे (घाटे) में है। मैंने अर्ज़ की मेरे बाप माँ हुज़ूर पर क़ुरर्बान वोह कौन लोग हैं। फ़रमाया ज़्यादा माल वाले मगर जो इस तरह और इस तरह और इस तरह करे आगे पीछे दाहिने बायें यअनी हर मौक़े पर ख़र्च करे और ऐसे लोग बहुत कम हैं।

हदीस न.13 :- सुनने तिरमिज़ी में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया सख़ी क़रीब है अल्लाह से, क़रीब है जन्नत से, क़रीब है आदमियों से, दूर है जहन्नम से, और बख़ील दूर है अल्लाह से, दूर है जन्नत से, दूर है आदमियों से क़रीब है जहन्नम से, और जाहिल सख़ी अल्लाह के नज़्दीक ज़्यादा प्यारा है बख़ील आबिद से।

हदीस न.14 :- सुनने अबू दाऊद में अबू सईद रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया आदमी का अपनी ज़िन्दगी (यअनी सेहत) में एक दिरहम सद़का करना मरते वक्त के सौ दिरहम सद़का करने से ज़्यादा बेहतर है।

हदीस न.15 :– इमाम अहमद व नसई व दारमी व तिर्मिज़ी अबू दरदा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया जो शख़्स मरते वक़्त सद़का देता है या आज़ाद करता है उसकी मिसाल उस शख़्स की है कि जब आसूदा हो लिया तो हदया करता है। (मसलन किसी के पास पाँच रोटी थीं और उससे किसी ने सद़का माँगा उसने न दी अगर दो दे देता और तीन पर गुज़ारा करता तो बेहतर था लेकिन चार खाई और जब एक या कम जो पेट में जगह रहने से मजबूरन बची तो माँगने वाले को दे दी।)

हदीस न.16 :– सही मुस्लिम शरीफ़ में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं एक शख़्स जंगल में था उसने अन्न में एक आवाज़ सुनी कि फूलों के बाग़ को सैराब करो वह अब एक किनारे को हो गया और उसने पानी संगिस्तान (पथरीली ज़मीन) में गिराया और एक नाली ने वह सारा पानी ले लिया वह शख़्स पानी के पीछे हो लिया, एक शख़्स को देखा कि अपने बाग़ में खड़ा हुआ खुरपिया से पानी फेर रहा है। इसने कहा ऐ अल्लाह के बन्दे! तेरा क्या नाम है? उसने कहा फूलां नाम, वही नाम जो इसने अब्र में से सुना। उसने कहा ऐ अल्लाह के बन्दे। तू मेरा नाम क्यूँ पूछता है? इसने कहा मैंने उस अब्र में से जिस का यह पानी है एक आवाज़ सुनी कि वह तेरा नाम लेकर कहता है फूलों के बाग़ को सैराब कर तो तू क्या करता है (कि तेरा नाम ले लेकर पानी भेजा जाता है) जवाब दिया कि जो कुछ पैदा होता है उसमें से एक तिहाई ख़ैरात करता हूँ और एक तिहाई मैं और मेरे बाल-बच्चे खाते हैं और एक तिहाई बोने के लिये रखता हूँ।

हदीस न.17 :- सहीहैन में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं बनी इस्राईल में तीन शख़्स थे एक बर्स (सफेद दाग) वाला, दूसरा गंजा, तीसरा अंधा। अल्लाह त’आला ने उनका इम्तिहान लेना चाहा, उनके पास एक फ़रिश्ता भेजा। वह फ़रिश्ता बर्स वाले के पास आया। उससे पूछा तुझे क्या चीज़ ज़्यादा महबूब है। उसने कहा अच्छा रंग और अच्छा चमड़ा और यह बात जाती रहे जिससे लोग घिन करते हैं। फरिश्ते ने उस पर हाथ फेरा वह घिन की चीज़ जाती रही और अच्छा रंग और अच्छी ख़ाल उसे दी गई । फ़रिश्ते ने कहा तुझे कौन सा माल ज़्यादा महबूब है। उसने ऊँट कहा या गाय (रावी का शक है मगर बर्स वाले और गंजे में से एक ने ऊँट कहा दूसरे ने गाय) उसे दस महीने की हामिला ऊँटनी दी और कहा कि अल्लाह त’आला तेरे लिए इसमें बरकत दे फिर गंजे के पास आया। उसे कहा तुझे क्या शय ज़्यादा महबूब है। उसने कहा ख़ूबसूरत बाल और यह जाता रहे जिससे लोग मुझ से घिन करते हैं। फ़रिश्ते ने उस पर हाथ फेरा वह बात जाती रही और खूबसूरत बाल उसे दिये गये। उससे कहा तुझे कौन सा माल महबूब है। उसने गाय बताई। एक गाभन गाय उसे दी गई और कहा अल्लाह त’आला तेरे लिए इसमें बरकत दे फिर अन्धे के पास आया और कहा तुझे क्या चीज़ महबूब है। उसने कहा यह कि अल्लाह त’आला मेरी निगाह वापस कर दे कि मैं लोगों को देखूँ । फ़रिश्ते ने हाथ फेरा’ अल्लाह त’आला ने उसकी निगाह वापस कर दी। फ़रिश्ते ने पूछा तुझे कौन सा माल ज़्यादा पसन्द है। उसने कहा बकरी। उसे एक गाभन बकरी दी। अब ऊँटों से जंगल भर गया, दूसरे के लिए गाय से, तीसरे के लिए बकरियों से। फिर वही फ़रिश्ता बर्स वाले के पास उसकी सूरत और हैअत (बनावट) में होकर आया (यअनी बर्स वाला बनकर) और कहा मैं मिस्कीन मर्द हूँ मेरे सफ़र में वसाइल ख़त्म हो गए पहुँचने की सूरत मेरे लिए आज नज़र नहीं आती अल्लाह की मदद से फिर तेरी मदद से मैं उसके वास्ते से जिसने तुझे खूबसूरत रंग और अच्छा चमड़ा और माल दिया है एक ऊँट का सवाल करता हूँ। जिससे मैं सफ़र में मक़सद तक पहुँच जाऊँ, उसने जवाब दिया हुक़ूक़ बहुत है। फ़रिश्ते ने कहा गोया मैं तुझे पहचानता हूँ, क्या तू कोढ़ी न था कि लोग तुझसे घिन करते थे फ़क़ीर न था फिर अल्लाह ने तुझे माल दिया। उस ने कहा मैं तो इस माल का बाप-दादा से वारिस किया गया हूँ। फ़रिश्ते ने कहा अगर तू झूटा है तो अल्लाह त’आला तुझे वैसा ही कर दे जैसा तू था। फिर गन्जे के पास उसी की सूरत बन कर आया। उससे भी वही कहा। उसने भी वैसा ही जवाब दिया। फरिश्ते ने कहा अगर तू झूटा है तो अल्लाह त’आला तुझे वैसा ही कर दे जैसा तू था। फिर अन्धे के पास उसकी सूरत व हैयत बन कर आया और कहा मैं मिस्कीन शख़्स मुसाफ़िर हूँ मेरे सफ़र में वसाइल ख़त्म हो गये आज पहुँचने की सूरत नहीं मगर अल्लाह की मदद से फिर तेरी मदद से मैं उसके वसीले से जिसने तुझे निगाह दी एक बकरी का सवाल करता हूँ जिसकी वजह से मैं अपने सफ़र में मक़सद तक पहुँच जाऊँ। वह कहने लगा मैं अन्धा था अल्लाह त’आला ने मुझे आँखें दीं तू जो चाहे ले ले और जितना चाहे छोड़ दे ख़ुदा की क़सम अल्लाह के लिए तू जो कुछ लेगा मैं तुझ पर मशक्कत न डालूँगा। फ़रिश्ते ने कहा तू अपना माल अपने कब्ज़े में रख,बात यह है कि तुम तीनों शख़्सों का इम्तिहान था तेरे लिए अल्लाह की रज़ा है और उन दोनों पर नाराज़गी।

हदीस न.18ः इमाम अहमद व अबू दाऊद व तिरमिज़ी उम्मे बु ज़ैद रदीअल्लाहु त’आला अन्हा से कहती है मैंने अर्ज़ की या रसूलल्लाह! मिस्कीन दरवाज़े पर खड़ा होता हैं और मुझे शर्म आती है कि घर में कुछ नहीं होता कि उसे दूँ। इरशाद फ़रमाया उसे कुछ दे दे अगरचे जला हुआ खुर।

हदीस न.19ः– बैहक़ी ने दलाइले नुबुव्वत में रिवायत की कि उम्मुल मोमिनीन उम्मे सलमा रदीअल्लाहु त’आला अन्हा की ख़िदमत में गोश्त का टुकड़ा हदया में आया। हुज़ूरे अकदस ﷺ को गोश्त पसन्द था उन्होंने ख़ादिमा से कहा इसे घर में रख दे शायद हुज़ूर तनावुल फरमाएं। उस ने ताक में रख दिया एक साइल आकर दरवाजे पर खड़ा हुआ और कहा सद़का करो अल्लाह त’आला तुम में बरकत देगा। लोगों ने कहा तुझमें बरकत दे (साइल को वापस करना होता तो यह लफ़्ज़ बोलते थे) साइल चला गया। हुज़ूर ﷺ तशरीफ़ लाए और फ़रमाया तुम्हारे यहाँ कुछ खाने की चीज़ है। उम्मुल मोमिनीन ने अर्ज़ की हाँ और ख़ादिमा से फ़रमाया जा वोह गोश्त ले आ। वोह गई तो ताक में पत्थर का एक टुकड़ा पाया। हुज़ूर ने इरशाद फरमाया चूँकि तुमने साइल को न दिया लिहाज़ा वोह गोश्त पत्थर हो गया।

हदीस न.20 :- बैहक़ी शोअबुल ईमान में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया सख़ावत जन्नत में एक दरख़्त है जो सख़ी है उसने उसकी टहनी पकड़ली है वह टहनी उसको न छोड़ेगी जब तक जन्नत में दाख़िल न कर ले और बुख़्ल जहन्नम में एक दरख़्त है जो बख़ील है उसने उसकी टहनी पकड़ली है वह टहनी उसे जहन्नम में दाख़िल किए बखैर न छोड़ेगी।

हदीस न.21 :- रज़ीन ने हज़रते मौला अली रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत की कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया सद़का में जल्दी करो कि बला सदक़े को नहीं फलाँगती।

हदीस न.22 :- सहीहैन में अबू मूसा अशअरी रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया है हर मुसलमान पर सद़का है। लोगों ने अर्ज़ की अगर न पाये। फ़रमाया अपने हाथ से काम करे अपने को नफ़ा पहुँचाए और सद़का भी दे। फ़रमाया साहिबे हाजत परेशान (यानी जिस शख्स को कुछ ज़रूरत हो या परेशान हो) की मदद करे। अर्ज़ की अगर यह भी न करे। फरमाया नेकी का हुक्म करे। अर्ज़ की अगर यह भी न करे। फ़रमाया शर से बाज़ रहे कि यही उसके लिए सद़का है।


हदीस न.23 :- सहीहैन में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी हुज़ूरे अकदस ﷺ फ़रमाते हैं दो शख़्सों में अदल (इन्साफ्) करना सद़का है, किसी को जानवर पर सवार होने में मदद देना या उसका असबाब उठा देना सद़का है और अच्छी बात सद़का है और जो क़दम नमाज़ की तरफ चलेगा सद़का है, रास्ते से अज़ीयत की चीज़ दूर करना सद़का है।

हदीस न.24ः- सही बुखा़री व मुस्लिम में अनस रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह ﷺ फरमाते हैं जो मुसलमान पेड़ लगाए या खेत बोए उसमें से किसी आदमी या परिन्दे या चौपाए ने खाया वह सब उसके लिए सद़का है।

हदीस न. 25, 26ः-सुनने तिर्मिज़ी में अबू जर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी कि हुज़ूर ﷺ फ़रमाते हैं अपने भाई के सामने मुस्कुराना भी सद़का है, नेक बात का हुक्म करना सद़का है, बुरी बात से मना करना सद़का है,राह भूले हुए को राह बताना सद़का है, कमज़ोर निगाह वाले की मदद करना सद़का है। रास्ते से पत्थर काँटा, हड्डी दूर करना सद़का है। अपने डोल में से अपने भाई के डोल में पानी डाल देना सद़का है। इसी के मिस्ल इमाम अहमद व तिर्मिज़ी ने जाबिर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत की।

हदीस न.27 :- सहीहैन में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी हुज़ूरे अक़दस ﷺ फ़रमाते हैं एक दरख़्त की शाख़ बीच रास्ते पर थी एक शख़्स गया और कहा मैं इसको मुसलमानों के रास्ते से दूर कर दूँगा कि उनको ईज़ा (तकलीफ़) न दे वह जन्नत में दाख़िल कर दिया गया।

हदीस न.28 :- अबू दाऊद व तिरमिज़ी अबू सईद रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं जो मुसलमान किसी मुसलमान नंगे को कपड़ा पहना दे अल्लाह त’आला उसे जन्नत के सब्ज़ कपड़े पहनाएगा और जो मुसलमान किसी भूखे मुसलमान को खाना खिलाएगा और जो मुसलमान किसी प्यासे मुसलमान को पानी पिलाए अल्लाह त’आला उसे रहीके मख़तूम (यअनी जन्नत की मोहरबन्द शराब) पिलायेगा।

हदीस न.29 : इमाम अहमद व तिर्मिज़ी इब्ने अब्बास रदीअल्लाहु त’आला अन्हुमा से रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं जो मुसलमान किसी मुसलमान को कपड़ा पहना दे तो जब तक उसमें का उस शख़्स पर एक पैवन्द भी रहेगा यह अल्लाह त’आला की हिफाज़त में रहेगा।

हदीस न.30,31 :- तिरमिज़ी व इब्ने हब्बान अनस रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं सद़का अल्लाह त’आला के ग़ज़ब को बुझाता है और बुरी मौत को दफा़ करता है। नीज़ इसी के मिस्ल अबू बक्र सिद्दीक़ व दीगर सहाबए किराम रदीअल्लाहु त’आला अन्हुम से मरवी।

हदीस न.32 :- तिर्मिज़ी ने उम्मुल मोमिनीन सिद्दीक़ा रदीअल्लाहु त’आला अन्हा से रिवायत की लोगों ने एक बकरी ज़बह की थी, हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया उसमें से क्या बाकी रहा। अर्ज़ की सिवा शाने के कुछ बाकी नहीं। इरशाद फ़रमाया शाने के सिवा सब बाकी है। (मतलब यह है कि जो तुमने अपने खाने के लिए रोका वह तो दुनिया का है और यहीं ख़त्म हो जाएगा और जो तुमने सद़का कर दिया वह बाक़ी है यअनी आख़िरत के लिए उसका सवाब बाकी रहा)

हदीस न.33- अबू दाऊद व तिर्मिज़ी व नसई व इब्ने ख़ुजै़मा व इब्ने हब्बान अबू ज़र रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि हुज़ूरे अकदस ﷺ फरमाते हैं तीन शख़्सों को अल्लाह महबूब रखता है और तीन शख़्सों को मबग़ूज़ (दुश्मन)। जिनको अल्लाह महबूब रखता है उनमें एक यह है कि एक शख़्स किसी क़ौम के पास आया और उनसे अल्लाह के नाम पर सवाल किया, उस क़राबत के वास्ते से सवाल न किया जो साइल और क़ौम के दरमियान है। उन्होंने न दिया। उनमें से एक शख़्स चला गया और साइल को छुपा कर दिया कि उसको अल्लाह जानता है और वोह शख़्स जिसको दिया और किसी ने न जाना, और एक क़ौम रात भर चली यहाँ तक कि जब उन्हें नींद हर चीज़ से ज्यादा प्यारी हो गई सब ने सर रख दिये (यअनी सो गये) उनमें से एक खड़ा होकर दुआ करने लगा और अल्लाह की आयतें पढ़ने लगा और एक शख़्स लश्कर में था, दुश्मन से मुकाबला हुआ और इन को शिकस्त हुई। उस शख़्स ने अपना सीना आगे कर दिया यहाँ तक कि क़त्ल किया जाये या फतह हो और वह तीन जिन्हें अल्लाह नापसन्द फरमाता है एक बूढ़ा ज़िनाकार, दूसरा फक़ीर मुतकब्बिर (घमंडी) तीसरा मालदार ज़ालिम।

हदीस न.34 :– तिरमिज़ी ने अनस रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत की कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते है जब अल्लाह ने ज़मीन पैदा फरमाई तो उसने हिलना शुरू किया तो पहाड़ पैदा फ़रमा कर उस पर नसब फ़रमा दिये, अब ज़मीन ठहर गई। फ़रिश्तों को पहाड़ की सख़्ती देखकर तअज्जुब हुआ। अर्ज़ की ऐ परवरदिगार तेरी मख़लूक़ में कोई ऐसी शय है कि वह पहाड़ से ज्यादा सख़्त है फ़रमाया हाँ लोहा। अर्ज़ की ऐ रब! लोहे से ज्यादा सख़्त कोई चीज़ है। फ़रमाया हाँ आग। अर्ज़ की आग भी ज़्यादा कोई सख़्त है फरमाया हाँ पानी। अर्ज़ की पानी से भी ज्यादा सख़्त कुछ है। फरमाया हाँ हवा । अर्ज़ की हवा से भी ज़्यादा सख्त कोई शय है। फ़रमाया इब्ने आदम कि दाहिने हाथ से सद़का करता है और उसे बायें से छुपाता है।

हदीस न.35ः- नसई ने अबू ज़र रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत की कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया जो मुसलमान अपने कुल माल से अल्लाह की राह में जोड़ा ख़र्च करे जन्नत के दरबान उसका इस्तिक़बाल करेंगे। हर एक उसे उसकी तरफ बुलाएगा जो उसके पास है। मैंने अर्ज़ की इसकी क्या सूरत है। फ़रमाया अगर ऊँट दे तो दो ऊँट और गाय दे तो दो गाय।

हदीस न.36 :- इमाम अहमद व तिरमिज़ी व इब्ने माजा मआज़ रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया सद़का ख़ता को ऐसे दूर करता है जैसे पानी आग को बुझाता है।

हदीस न.37 :- इमाम अहमद बाज़ सहाबा रदीअल्लाहु त’आला अन्हुम से रिवायत करते हैं कि हुज़ूरﷺ ने फ़रमाया कि मुसलमान का साथ कियामत के दिन उसका सद़का होगा।

हदीस न.38 :-सही बुख़ारी में अबू हुरैरा व हकीम इन्ने हिजाम रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं बेहतर सद़का वोह है कि पुश्ते ग़िना से हो यअनी उसके बाद मालदारी बाकी रहे और उनसे शुरू करो जो तुम्हारी इयाल में हैं यअनी पहले उन को दो फिर औरों को।

हदीस न.39 :- अबू मसऊद रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से सहीहैन में मरवी कि हुज़ूर ﷺ ने फरमाया मुसलमान जो कुछ अपने अहल पर खर्च करता है अगर सवाब के लिए है तो यह भी सद़का है।

हदीस न.40 :- ज़ैनब ज़ौजा अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रदीअल्लाहु त’आला अन्हुमा से सहीहैन में मरवी उन्होंने हुज़ूरे अक़दस ﷺ से दरयाफ़्त कराया शौहर और यतीम बच्चे जो परवरिश में हैं उनको सद़का देना काफ़ी हो सकता है। इरशाद फ़रमाया उनको देने में दूना अज्र है। एक अज्र ए क़राबत और एक अज्र ए सद़का। यानी क़रीब का होने की वजह से देने का सवाब और दूसरा सद़का का सवाब।

हदीस न.41 :– इमाम अहमद व तिरमिज़ी व नसई व इब्ने माजा व दारमी सुलैमान इब्ने आमिर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया मिस्कीन को सद़का देना सिर्फ सद़का है और रिश्ते वाले को देना सद़का का भी है और सिलारहमी भी।

हदीस न.42 :– इमाम बुख़ारी व मुस्लिम उम्मुल मोमिनीन सिद्दीक़ा रदीअल्लाहु त’आला अन्हा से रावी रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं घर में जो खाने की चीज़ है अगर औरत उसमें से कुछ दे दे मगर ज़ाए करने के तौर पर न हो तो उसे देने का सवाब मिलेगा और शौहर को कमाने का सवाब मिलेगा और ख़ाज़िन (भण्डारी) को भी उतना ही सवाब मिलेगा। एक का अज्र दूसरे के अज्र को कम न करेगा यअनी उस सूरत में जहाँ ऐसी आदत जारी हों कि औरतें दिया करती हों और शौहर मना न करते हों और उसी हद तक जो आदत के मुवाफिक़ है मसलन रोटी दो रोटी जैसा हिन्दुस्तान में उमूमन रिवाज है और अगर शौहर ने मना कर दिया हो या वहाँ की ऐसी आदत न हो तो बगैर इजाज़त औरत को देना जाइज़ नहीं।

तिरमिज़ी में अबू उमामा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी कि हुज़ूर ने खुतबए हज्जतुलविदा (आख़िरी हज के खुतबा) में फ़रमाया औरत शौहर के घर से बग़ैर इजाज़त कुछ ख़र्च न करे। अर्ज़ की गई खाना भी नहीं फ़रमाया यह तो बहुत अच्छा माल है।

हदीस न.43 :- सहीहैन में अबू मूसा अशअरी रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी हुज़ूरे अक़दस ﷺ ने फ़रमाया ख़ाज़िन मुसलमान अमानतदार कि जो उसे हुक्म किया गया पूरा-पूरा-उसको दे देता है वोह दो सद़का देने वालों में का एक है।

हदीस न.44 :- हाकिम और तबरानी औसत में अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि

रसूलुल्लाह ﷺ फरमाते हैं कि एक लुकमा रोटी और एक मुट्ठी खुरमा (खजूर) और उसकी मिस्ल कोई और चीज़ जिससे मिस्कीन को नफा पहुँचे इनकी वजह से अल्लाह त’आला तीन शख़्सों को जन्नत में दाख़िल फरमाता है। एक साहिबे ख़ाना जिसने हुक्म दिया, दूसरी ज़ौजा कि उसे तैयार करती है, तीसरे ख़ादिम जो मिस्कीन को दे आता है फिर हुज़ूर ﷺ ने फरमाया हम्द है अल्लाह के लिए जिसने हमारे ख़ादिमों को भी न छोड़ा।

हदीस न.45 :- इब्ने माजा जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह रदीअल्लाहु त’आला अन्हुमा से रावी कहते हैं कि हुज़ूर ﷺ ने ख़ुतबे में फ़रमाया ऐ लोगों! मरने से पहले अल्लाह की तरफ रुजू करो और मशगूली से पहले अअमाले सालेहा की तरफ सबक़त करो और पोशीदा व ऐलानिया सद़का देकर अपने और अपने रब के दरमियान के तअल्लुक़ात को मिलाओ तो तुम्हें रोज़ी दी जाएगी और तुम्हारी मदद की जाएगी।

हदीस न.46 :- सहीहैन में अदी इब्ने हातिम रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से मरवी रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं हर शख्स से अल्लाह त’आला कलाम फ़रमाएगा उसके और अल्लाह त’आला के माबैन (बीच में) कोई तर्जमान न होगा। वह अपनी दाहिनी तरफ नज़र करेगा तो जो कुछ पहले कर चुका है दिखाई देगा फिर बाईं तरफ देखेगा तो वही देखेगा जो पहले कर चुका है फिर अपने सामने नज़र करेगा तो मुँह के सामने आग दिखाई देगी तो आग से बचो अगर्चे खुरमे का एक टुकड़ा देकर और इसी के मिस्ल अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद व सिद्दीक़े अकबर व उम्मुल मोमिनीन सिद्दीक़ा व अनस व अबू हुरैरा व अबू उमामा व नोमान इब्ने बशीर वग़ैरहुम सहाबए किराम रदीअल्लाहु त’आला अन्हुम से मरवी।

हदीस न.47 :- अबू य’अला जाबिर और तिर्मिज़ी मआज़ इब्ने जबल रदीअल्लाहु त’आला अन्हुमा से रावी कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआल अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया सद़का ख़ता को ऐसे बुझाता है जैसे पानी आग को।

हदीस न.48 :- इमाम अहमद व इब्ने ख़ुज़ैमा व इब्ने हब्बान व हाकिम उक़बा इब्ने आमिर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी रसूलुल्लाह ﷺ फरमाते हैं हर शख़्स कियामत के दिन अपने सदके के साए में होगा। उस वक़्त तक कि लोगों के दरमियान फैसला हो जाये और तबरानी की रिवायत में येह भी है कि सद़का क़ब्र की हरारत (गर्मी) को दफ़ा करता है।

हदीस न.49 :- तबरानी व बैहक़ी हसन बसरी रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं रब त’आला फ़रमाता है ऐ इब्ने आदम! अपने ख़ज़ाने में से मेरे पास कुछ जमा कर दें। न जलेगा, न डूबेगा, न चोरी जायेगा। तुझे मैं पूरा दूँगा, उस वक़्त कि तू उसका ज़्यादा मुहताज होगा।

हदीस न. 50, 51 :- इमाम अहमद व बज़्ज़ाज़ व तबरानी व इब्ने ख़ुज़ैमा व हाकिम व बैहक़ी बुरीदा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से और बैहक़ी अबू ज़र रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि आदमी जब कभी भी कुछ भी सद़का निकालता है तो सत्तर शैतान के जबड़े चीर कर निकलता है।

हदीस न. 52ः- तबरानी ने अम्र इब्ने औ़फ़ रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत की कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं कि मुसलमान का सद़का उम्र में ज़्यादती का सबब है और बुरी मौत को दफ़ा करता है और अल्लाह त’आला उसकी वजह से तकब्बुर व फ़ख़्र को दूर फ़रमा देता है।

हदीस न.53 :- तबरानी कबीर में राफेअ इब्ने खदीज रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं कि सद़का बुराई के सत्तर दरवाज़ों को बन्द कर देता है।

हदीस न. 54 :- तिरमिज़ी व इब्ने ख़ूज़ैमा व इब्ने हब्बान व हाकिम हारिस अशअरी रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी रसूलुल्लाह ﷺ फरमाते हैं कि अल्लाह त’आला ने यहया इब्ने ज़करिया अलैहिमुस्स़लातु वस्सलाम को पाँच बातों की वह्यी भेजी कि खुद अमल करें और बनी इस्राईल को हुक्म फ़रमायें कि वोह उन पर अमल करें और उन में एक यह है कि उसने तुम्हें सदक़े का हुक्म फ़रमाया है और उसकी मिसाल ऐसी है जैसे किसी को दुश्मन ने क़ैद किया और उसका हाथ गर्दन से मिलाकर बाँध दिया और उसे मारने के लिए लाए, उस वक़्त थोड़ा-बहुत जो कुछ था सब को देकर अपनी जान बचाई।

हदीस न.55 :- इब्ने ख़ुज़ैमा व इब्ने हब्बान व हाकिम अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रावी कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया जिसने हराम माल जमा किया फिर उसे सद़का किया तो उस में उसके लिए कुछ सवाब नहीं बल्कि गुनाह है।

हदीस न.56 :- अबू दाऊद इब्ने ख़ुज़ैमा व हाकिम उन्हीं से रावी अर्ज़ की या रसूलल्लाह! कौनसा सद़का अफज़ल है? फ़रमाया ग़रीब शख़्स को कोशिश करके सद़का देना।

हदीस न. 57ः-नसई व इब्ने ख़ुज़ैमा व इब्ने हब्बान उनहीं से रावी कि हुज़ूरे अकदस ﷺ ने फ़रमाया एक दिरहम लाख दिरहम से बढ़ गया। किसी ने अर्ज़ की यह क्यूँकर या रसूलल्लाह ! फ़रमाया एक शख़्स के पास ज़्यादा माल है उस ने उस में से लाख दिरहम लेकर सद़का किये और एक शख़्स के पास सिर्फ दो हैं उसने उनमें से एक को सद़का किया।

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Ushra

उश्र का बयान

हज़रत अब्दुल मुस्तफ़ा की किताब “जन्नती ज़ेवर” बाब 4 इबादात से नकल की गई है।

ज़मीन से जो भी पैदावार हो गेहूं, जव, चना, बाजरा, धान वग़ैरा हर किस्म के अनाज, गन्ना, रूई हर किस्म की तरकारियां फूल फल मेवे सब में उश्र वाजिब है थोड़ी पैदा हो या ज़ियादा । (आलमगीरी, ज़िल्द 1, पेज 174)

मस्अला :- जो पैदावार बारिश या जमीन की नमी से पैदा हो उस में दसवां हिस्सा वाजिब होता है और जो पैदावार चरसे, डोल, पम्पिंग मशीन या ट्यूबवेल वगैरा के पानी से या खरीदे हुए पानी से पैदा हो उस में बीसवां हिस्सा वाजिब होता है। (आलमगीरी, ज़िल्द 1, पेज 174)

मसला :- खेती के अखराजात निकाल कर उश्र नहीं निकाला जाएगा बल्कि जो कुछ पैदावार हुई हो उन सब का उश्र या निस्फ़ उश्र देना वाजिब है गवर्नमेन्टको माल गुज़ारी दी जाती है वोह भी उश्र की रकम से मुजरा नहीं की जाएगी। पूरी पैदावार का उश्र या निस्फ़ उश्र खुदा की राह में निकालना पड़ेगा। (जन्नती जेवर, पेज 209)

मसला :- ज़मीन अगर बटाई पर दे कर
खेती कराई है तो ज़मीन वाले और खेती करने वाले दोनों को जितनी जितनी पैदावार मिली है दोनों को अपने अपने हिस्से की पैदावार का दसवां या बीसवां हिस्सा निकालना वाजिब है। (रद्दुलमुहतार, ज़िल्द 2, पेज 56)

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