Amal O Ibadaat

Isale Sawab

ईसाले सवाब

हज़रत अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी अलैहिर्रहमा की किताब जन्नती ज़ेवर की तहरीर आपके नज़र के सामने पेश है “कुरआने मजीद की तिलावत या कलिमा शरीफ़ या नफ़्ली नमाज़ों या किसी भी बदनी या माली इबादतों का सवाब किसी दूसरे को पहुंचाना येह जाइज़ है। इसी को आम तौर पर लोग फातिहा देना और फ़ातिहा दिलाना कहते हैं, ज़िन्दों के ईसाले सवाब से मुर्दों को फाइदा पहुंचता है। फ़िक़ह और अक़ाइद की किताबों मसलन हिदाया व शर्दे अकाइदे नस्फिय्या में इस का बयान मौजूद है इस को बिदभुत और नाजाइज़ कहना जहालत और हटधर्मी है। हदीस से भी इस का जाइज़ होना साबित है। चुनान्चे हज़रते सा’द बिन उबादा सहाबी رَضِيَ اللَّهُ تَعَالٰى عَنْهُ की वालिदा का जब इन्तिकाल हो गया तो उन्हों ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ मेरी मां का इन्तिकाल हो गया उन के लिये कौन सा सदक़ा अफ्ज़ल है ? हुजूरे अक्दस ﷺ

फ़रमाया : पानी (बेहतरीन सदक़ा है, तो हुजूर ﷺ के फ़रमाने के मुताबिक) हज़ते सा’द رضى اللهُ تَعَالٰى عَنهُ ने कुंवां खुदवा दिया (और उसे अपनी मां की तरफ़ मन्सूब करते हुए) कहा येह कुंवां सा’द की मां के लिये है (या’नी इस का सवाब उस की रूह को मिले)

इसी तरह एक और हदीस में है कि एक शख्स ने अर्ज किया : या रसूलल्लाह ﷺ मेरी मां का अचानक इन्तिकाल हो गया और वोह किसी बात की वसिय्यत न कर सकी मेरा गुमान है कि वोह इन्तिकाल के वक्त कुछ बोल सकती तो सदक़ा ज़रूर देती तो अगर मैं उस की तरफ़ से सदक़ा़ कर दूं तो क्या उस की रूह को सवाब पहुंचेगा? तो आप ﷺ ने इरशाद फरमाया कि : हां पहुंचेगा।

अल्लामा नववी رَحْمَةُ الله تعالى عليه ने इस हदीस की शरह में इरशाद फ़रमाया कि
“इस हदीस से साबित हुवा कि अगर मय्यित की तरफ से

सदक़ा दिया जाए तो मय्यित को इस का फाइदा और सवाब पहुंचता है इसी पर उ-लमा का इत्तिफ़ाक़ है।“

तीजे की फ़ातिहा :- मरने से तीसरे दिन बा’द कुरआन ख़्वानी और कलिमए तय्यिबा पढ़ा जाता है और कुछ बताशे या चने या मिठाइयां तक्सीम की जाती हैं और इन का सवाब मय्यित की रूह को पहुंचाया जाता है चूंकि येह ईसाले सवाब का एक तरीका है इस लिये जाइज़ और बेहतर है लिहाजा इस को करना चाहिये ।

चालीसवें और बरसी की फ़ातिहा :-
मरने के चालीसवें दिन बा’द ही कुछ खाना पकवा कर फुकरा व मसाकीन को खिलाया जाता है और क़ुरआन ख़्वानी भी की जाती है और इस का सवाब मय्यित की रूह को पहुंचाया जाता है इसी तरह एक बरस पूरा हो जाने के बा’द भी खानों और तिलावत वगैरा का ईसाले सवाब किया जाता है यह सब जाइज़ और सवाब के काम हैं लिहाज़ा इन को करते रहना चाहिये।

सदक़ा के जरिये मरहुमैन (मुर्दा) के लिए भलाई
मय्यित को किसी कारे खैर का सवाब बख़्शना बेहतर और अच्छा काम है चुनान्चे तफ्सीरे अज़ीज़ी पारह अम्म स. 113 पर है कि
“मुर्दा एक डूबने वाले की तरह किसी फरियाद रस के इन्तिज़ार में रहता है ऐसे वक़्त में सदक़ात और दुआएं और फातिहा इस के बहुत काम आते हैं येही वजह है कि लोग एक साल तक खुसूसन मौत के बा’द एक चिल्ले तक मय्यित को इस किस्म की इमदाद पहुंचाने की पूरी पूरी कोशिश करते हैं।“ (जन्नती ज़ेवर , पेज 301, 302, 303 हिंदी)

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हुक़ूक़ूल इबाद के अदायगी का हुक़्म

हुकूकुल इबाद (बन्दों के हक़ )

हर मुसलमान पर यह लाज़िम है कि जब वह दूसरे मुसलमान से मिले तो उसे सलाम कहे, जब वह उसे दावत दे तो उसकी दावत कबूल करे, जब उसे छींक आये तो उसका जवाब दे, जब वह बीमार हो तो उसकी अयादत को जाए, जब वह मर जाये तो उसके जनाज़ा में हाज़िर हो, जब वह कसम दिलाये तो उसकी कसम को पूरा करे, जब वह नसीहत का ख़्वास्तगार हो तो उसे नसीहत करे , उसकी गैर मौजूदगी में उस की पीठ की हिफाज़त करे यानी उसकी गीबत, चुगली न करे और उसके लिए वही कुछ पसन्द करे जो अपने लिए पसन्द करता है और हर वह चीज़ जिसे वह अपने लिए नापसन्द समझता है उसके लिए भी नापसंद समझे यह तमाम अहकाम हदीसों में वारिद हुए हैं चुनान्चे हज़रते अनस रज़ियल्लाहु अन्हु हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रिवायत करते हैं, आप ने फ़रमाया तुझ पर मुसलमानों के चार हक हैं, उनके नेक की इमदाद कर बुरे के लिए तलबे मगफिरत कर उनमें से जाने वाले (मरने वाले) के लिए दुआ मांग और उनमें से तौबा करने वाले के साथ मुहब्बत रख। (मुक़ाशफूतुल क़ुलूब, बाब 70, पेज 416) 

हुक़ूक़ूल इबाद की अदायगी

जानना चाहिए कि हुक़ूक़ूल इबाद यानी बंदों का हक़ का अदायगी हुक़्कुल्लाह से भी ज्यादा मुश्किल है क्योंकि अल्लाह के बंदों का मुख़्तलिफ़ अकसाम और मुख़्तलिफ़ मरातिब है इस वजह से हम पर भी मुख़्तलिफ़ हुक़ूक अदा करने का हुक़्म है। मसलन बुलंद मरातिब वाले बंदों का हुक़ूक अवाम से अलग है जैसे रसूल, अम्बिया, असहाब, अहले बैत, अईमा, औलिया ये तमाम अल्लाह के ख़्वासम खास व ख़्वास बंदे है इसलिए इन बंदों के हुक़ूक भी हम पर अवाम से बढ़कर है। जैसे हमारे नबी से मुहब्बत करने का हुक़्म है लेकिन सबसे ज्यादा और बढ़कर, उसी तरह बाकी हुक़ूक का अदायगी भी ज्यादा और बढ़कर है। यानी जो जैसा मरतबे पर है उसके साथ हुक़ूक का ममाल वैसा है। इस महफ़ूम को इस हदीस से जाना और माना जा सकता है।

हज़रत अबू दाऊद ने हज़रते आइशा रदियल्लाहु तआला अन्हा से रिवायत की कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि लोगों को उनके मरतबे में उतारो यानी हर शख़्स के साथ उस तरह पेश आओ जो उसके मरतबे के मुनासिब हो। सबके साथ एक सा बरताव न हो मगर उसमें ये लिहाज़ ज़रूर करना होगा कि दूसरे की तहकीर व तजलील न हो । (बहारे शरीअत, हिस्सा 16)

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Huqooqul Ibad

हुकूकुल इबाद (बन्दों के हक़ )

हुक़ूकुल इबाद क्या है?
हुकूकुल इबाद का मतलब बन्दों का हक है। हर इंसान पर दूसरों के कुछ फ़राइज़ और ज़िम्मेदारियाँ आइद होती हैं जिन्हें हुकूकुलएबाद कहा जाता है उन हुकूक का अदा करना हर शख़्स के लिए जरूरी है क्योंकि बा काइदगी से हुकूक की अदायगी में किसी की हक़ तल्फी नहीं होती। हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद अदा करना ही अल्लाह की इबादत है जैसा कि क़ुरआन में है इंसान और जिन्न इबदत के लिए पैदा किये गए है इसका मतलब ये भी है हुआ कि इंसान और जिन्न हुक़ूकुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद के लिए पैदा किए गये है। मुसलमान को चाहिए की अल्लाह की मुकम्मल इबादत करने के लिए हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद की मुकम्मल अदायगी करे।

ज़िन्दगी इबादत के लिए है
अल्लाह फरमाता है : मैंने जिन्न और इंसान को इतने ही के लिये बनाए कि मेरी बन्दगी (इबादत) करें । (कंजुल ईमान, सुरह जरियात, आयत न. 56 )

हुक़ूक अदा करना ही इबादत है
हुक़ूक अदा करने का नाम ही इबादत है जो दो किस्म के है- 1. हुक़ूक़ुल्लाह और 2. हुक़ूक़ूलइबाद
1. हुक़ूक़ुल्लाह (अल्लाह का हक़) : अल्लाह का दिया दुआ हर वो चीज जो बंदों के पास है जैसे इल्म, माल, सेहत, ताकत, जिस्म और जान को अल्लाह के लिए खर्च करना हुक़ूक़ुल्लाह कहलाता है।

2. हुक़ूकुल इबाद (बंदों का हक़) : अल्लाह की रज़ा के लिए अल्लाह के मख़लूको और बंदों का मदद, ख़िदमत और उनसे मुहब्बत करने के लिए जो जो मामलात बंदों से करने का हुक़्म हुआ है उसे पूरा करना हुक़ूकुल इबाद कहलाता यानी बंदों का हक़ अदा करना है।

हुक़ूकुल इबाद की अहमियत
आम तौर पर लोग बन्दों के हुकूक अदा करने की कोई अहमियत नहीं समझते। हालांकि बन्दों के हुकूक का मुआमला बहुत ही अहम, निहायत ही संगीन और बेहद खौफनाक है बल्कि एक हैसियत से देखा जाये तो हुकूकुल्लाह (अल्लाह के हुकूक) से ज्यादा हुकूकुलइबाद (बन्दों के हुकूक) सख्त है। अल्लाह तआला तो अरहमर राहिमीन है। वह अपने फज्ल व करम से अपने बन्दों पर रहम फरमा कर अपने हुकूक माफ फरमा देगा। मगर बन्दों के हुकूक अल्लाह तआला उस वक्त तक नहीं माफ फरमाएगा जब तक बन्दे अपने हुकूक को न माफ करदें। लिहाजा बन्दों के हुकूक को अदा करना या माफ करा लेना बेहद जरूरी है। वरना कियामत में बड़ी मुश्किलों का सामना होगा।
हदीस शरीफ में है कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक मर्तबा सहाबए किराम से फरमाया कि क्या तुम लोग जानते हो कि मुफलिस कौन शख्स है? तो सहाबए किराम ने अर्ज किया कि जिस शख्स के पास दिरहम और दूसरे माल व सामान न हो वही मुफलिस है तो हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया कि मेरी उम्मत में आला दर्जे का मुफलिस वह शख्स है कि वह कियामत के दिन नमाज़ रोज़ा, और ज़कात को लेकर मैदाने हश्र में आएगा। मगर उसका यह हाल होगा कि उसने दुनिया में किसी को गाली दी होगी। किसी पर तोहमत लगाई होगी। किसी का माल खा लिया होगा। किसी का खून बहाया होगा। किसी को मारा होगा, तो यह सब हुकूक वाले अपने अपने हुकूक को तलब करेंगे तो अल्लाह तआला उसकी नेकियों में से तमाम हुकूक वालों को उनके हुकूक के बराबर नेकियाँ दिला देगा। अगर उसकी नेकियों से तमाम हुकूक वालों के हुकूक अदा न हो सके बल्कि नेकियाँ ख़त्म हो गई और हुकूक बाकी रह गए तो अल्लाह तआला हुक्म देगा कि तमाम हुकूक वालों के गुनाह उसके सर पर लादो । चुनान्चे सब हक वालों के गुनाहों को यह सर पर उठाएगा। फिर जहन्नम में डाल दिया जाएगा। तो यह शख़्स सबसे बड़ा मुफलिस होगा। (मिश्कात जि. 2 स.435)
इस लिए इन्तेहाई ज़रूरी है कि या तो हुकूक को अदा करो या माफ करा लो। वरना कियामत के दिन हुकूक वाले तुम्हारी सब नेकियों को छीन लेंगे और उनके गुनाहों का बोझ तुम अपने सर पर लेकर जहन्नम में जाओगे ख़ुदा के लिए सोचो कि तुम्हारी बेकसी व बेबसी और मुफलिसी का कियामत में क्या हाल होगा । (जन्नती जेवर, पेज 61, हिंदी)

हुक़ूक अदा करने के दुनियावी फ़ाइदे
इबादतों से आखिरत के फाइदे तो हर शख़्स को मालूम हैं कि अल्लाह तआला अपने इबादत गुज़ार बन्दों को आखिरत में जन्नत की बेशुमार नेअमतें अता फरमाएगा। लेकिन इससे गाफिल न रहो कि इबादत से आखिरत के इलावा इबादत की बरकत से बहुत से दुनियावी फाइदे भी हासिल होते हैं मसलन – (1) रोजी बढ़ना ( 2 ) माल सामन, औलाद हर चीज में बरकत होना (3) बहुत सी दुनियावी तकलीफों और परेशानियों का खत्म हो जाना (4) बहुत सी बलाओं का टल जाना (5) सब के दिलों में उसकी मुहब्बत का पैदा हो जाना (6) नूरे ईमान की वजह से चेहरे का बा-रौनक हो जाना (7) उम्र का बढ़ जाना (8) पैदावार में खैर व बरकत हो जाना (9) बारिश होना (10) हर जगह इज्जत व आबरू मिलना (11) फाका से बचा रहना (12) दिन व दिन नेअमतों में तरक्की होना (13) बहुत सी बीमारियों से शिफा पा जाना (14) आइन्दा आने वाली नसलों को फाइदा पहुंचना (15) शादमानी व मसर्रत और इत्मीनाने कल्ब की जिन्दगी नसीब होना। इनके इलावा और भी बहुत सी दुनियावी फाइदे हैं। जो इबादत की बरकत से हासिल होते हैं। (जन्नती जेवर, पेज 87)

हुक़ूक अदा न करना ही गुनाह है।
हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़्कूकुल इबाद के अदायगी का जो हुक़्म क़ुरआन व अहादीस मैं है इसका इंकार करना कुफ़्र है और तर्क करना फिस्क फुज़ूर (सगिरा कबीर गुनाह) है।

गुनाहों की किस्मे और तौबा का तरीका
फ़क़ीह रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है गुनाहो की 2 किस्मे है
1. इस गुनाह का मामला अल्लाह और बंदों के दर्मियान है यानी हुकुकूल अल्लाह जैसे अल्लाह का हुक्म का नाफरमानी जैसे फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत (नमाज, रोजा, हज, जकात, दरूद, नेकी का हुक्म गुनाहो से रोकना वगैरह जिसे अल्लाह हुक़्म दिया हो उसे अदा न किया लेकिन अल्लाह से रो रो के माफी मांगे और सच्ची तौबा करे तो उसे अल्लाह अपनी रहमत से खुद (डायरेक्ट) माफ कर सकता है

2. इसका मामला बंदे और बंदे के दरमियान है यानी हूककुल इबाद यानी एक बन्दा किसी दूसरे मोमिन बंदे का दिल दुखाया हो, अमानत में खयानत किया हो, हसद, गीब्बत या चुगली, लड़ाई झगड़ा किया हो यानी बंदों का हुक़ूक अदा न किया वगैरह इस गुनाह को अल्लाह तभी माफ करेगा जब बन्दा एक दूसरे से माफी न मांग ले या माफ न कर दे। जैसे इब्लीस को माफी नही मिला क्योंकि वो आदम अलैहिसालाम से हसद रखता था।

हुक़ूक अदा न करने की वजह क्या है
हदीस शरीफ में है दुनिया की मुहब्बत (दुनियादारी) ही तमाम गुनाहों की जड़ है।
वाज़ेह हुआ कि दुनिया ही वो चीज है जो मुसलमान को अल्लाह और उसके रसूल के फ़रमान के मुताबिक अमल पैरा नहीं होने देती है यानी हुक़ूक अदा करने नहीं देती है। नफ़्स और शैतान इसी दुनिया के जरिये मुसलमान को गुमराह करने की ताक में लगे रहते है और कामयाब भी होते है।

फ़रमांबरदारी तीन नीयतों से की जाती है
याद रहे कि इत्तिबाअ व फ़रमांबरदारी तीन तरह यानी पहला मख़लूक का ख़ौफ़, दूसरा दुनियावी लालच, और तीसरा ख़ौफ़े खुदा व मुहब्बते मुस्तफ़ाﷺ की वजह से की जाती है। इसका मतलब ये है कि जो इताअत किसी शख्स या किसी हुकूमत या किसी माली व जानी नुक्सान के डर से की जाती है तो वह इताअत नहीं होती बल्कि मुनाफ़िकत होती है। ऐसे ही वह इताअत जो किसी माली फायदे या दुनियावी बेहतरी के लालच में की जाती है वह इताअत भी इताअत की अस्ल मक़सद से खाली क्योंकि इताअत की अस्ल मक़सद अल्लाह की रज़ा है जो हुक़ूक़ूल इबाद और हुक़ूक़ुल्लाह कि अदायगी है इसके लिए ईमान का होना शर्त है और ईमान के लिए मुहब्बत का होना शर्त है और मुहब्बत से जो काम किया जाता है अल्लाह उसे कुबूल करता है। मुहब्बत की इताअत में सिर्फ खुदा की रज़ा पेशे नज़र होती है। इसलिये इसका बहुत बुलन्द दर्जा है इसलिये इत्तिबाए सुन्नत में हमेशा मुहब्बत को सामने रखना चाहिये। (अदाबे सुन्नत, पेज 8)

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Huqooq ki Tafsil

हुक़ूक़ की तफ्सील
बिरादराने मिल्लत हुक़ूक़ की दो किस्में हैं एक हुक़ूक़ुल्लाह दूसरे हुकुकुल इबाद फिर हुक़ूक़ुल्लाह की दो किस्में हैं। एक वह कि अगर उनके बारे में बन्दा से कुसूर वाकेअ हुआ, तो वह सिर्फ तौबा से माफ हो सकते हैं जैसे कि शहर में जुमा और ईदैन की नमाज छूट जाने के गुनाह, या शराब पीने और नाच वगैरा देखने के गुनाह और दूसरे वह जो सिर्फ तौबा से नहीं माफ हो सकते जैसे नमाज न पढ़ने, रोजा न रखने, जकात व फित्रा न अदा करने और हज व कुर्बानी वगैरा न करने के गुनाह कि इनके माफ होने की सूरत सिर्फ तौबा नहीं है बल्कि छूटी हुई नमाजों और रोजों की कजा करे, जितने सालों की जकात और फित्रा न दिया हो अब अदा करे, साहिबे निसाब होकर जितने साल कुर्बानी न की हो हर साल के बदले एक बकरे की कीमत सदका करें, खुद हज न कर सकता हो तो हज्जे बदल कराए माल न रह गया हो तो हज्जे बदल कराने की वसिय्यत करे और तौबा करे तो माफ हो सकते हैं। यानी तौबा के साथ उन की अदाइगी भी जरूरी है कि यह चीजें सिर्फ तौबा से नहीं माफ हो सकती।

और रहे हुक़ूक़ुल इबाद यानी बन्दों के हुक़ूक़ तो वह हुक़ूक़ुल्लाह की दूसरी किस्म से भी अहम हैं इस लिये कि खुदाए तआला अरहमर्राहिमीन है अगर वह चाहे तो अपने हर किस्म के हुक़ूक़ माफ कर दे लेकिन वह किसी बन्दे का हक हरगिज़ नहीं माफ करेगा जब तक कि वह बन्दा न माफ कर दे कि जिस की हक़ तल्फी की गई है। इसी लिये सरकारे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने आखिरी वसिय्यत में खास तौर पर इस की अहमियत को जाहिर फरमाया और जमानए सेहत में भी हमेशा इस की ताकीद फरमाते रहे मिश्कात शरीफ की हदीस है हज़रत अबू हुरैरा रदी अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ ने सहाबए किराम से दरयाफ्त फरमायाः (तर्जमा) क्या तुम लोग जानते हों कि मुफ्लिस और कंगाल कौन है? सहाबा ने अर्ज किया या रसूल ﷺ हम में मुफ्लिस यह शख्स है कि जिस के पास न पैसे ! हों और न सामान । हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि मेरी उम्मत में दरअसल मुफ्लिस वह शख्स है कि जो कियामत के दिन नमाज रोजा और जकात वगैरा लेकर इस हाल में आएगा कि उस ने किसी को गाली दी होगी, किसी पर तोहमत लगाई होगी, किसी का माल खा लिया होगा, किसी का खून बहाया होगा और किसी को मारा होगा या किसी का तौहीन किया हो तो अब उन लोगों को राजी करने के लिये उस शख्स की नेकियां उन मजलूमों के दरमियान तक्सीम की जाएंगी। अगर उस की नेकियां खत्म हो जाने के बाद भी लोगों के हक उस पर बाकी रह जाएंगे तो अब हकदारों के गुनाह लाद दिये जायेंगे यहां तक कि उसे जहन्नम में फेंक दिया जाएगा । यह आखि़रत में अल्लाह का अदल व इंसाफ़ है। (खुतबाते मुहर्रम, पेज 42 )

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