Author name: Sufi Anwar Raza Qadri

Isale Sawab

ईसाले सवाब

हज़रत अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी अलैहिर्रहमा की किताब जन्नती ज़ेवर की तहरीर आपके नज़र के सामने पेश है “कुरआने मजीद की तिलावत या कलिमा शरीफ़ या नफ़्ली नमाज़ों या किसी भी बदनी या माली इबादतों का सवाब किसी दूसरे को पहुंचाना येह जाइज़ है। इसी को आम तौर पर लोग फातिहा देना और फ़ातिहा दिलाना कहते हैं, ज़िन्दों के ईसाले सवाब से मुर्दों को फाइदा पहुंचता है। फ़िक़ह और अक़ाइद की किताबों मसलन हिदाया व शर्दे अकाइदे नस्फिय्या में इस का बयान मौजूद है इस को बिदभुत और नाजाइज़ कहना जहालत और हटधर्मी है। हदीस से भी इस का जाइज़ होना साबित है। चुनान्चे हज़रते सा’द बिन उबादा सहाबी رَضِيَ اللَّهُ تَعَالٰى عَنْهُ की वालिदा का जब इन्तिकाल हो गया तो उन्हों ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ﷺ मेरी मां का इन्तिकाल हो गया उन के लिये कौन सा सदक़ा अफ्ज़ल है ? हुजूरे अक्दस ﷺ

फ़रमाया : पानी (बेहतरीन सदक़ा है, तो हुजूर ﷺ के फ़रमाने के मुताबिक) हज़ते सा’द رضى اللهُ تَعَالٰى عَنهُ ने कुंवां खुदवा दिया (और उसे अपनी मां की तरफ़ मन्सूब करते हुए) कहा येह कुंवां सा’द की मां के लिये है (या’नी इस का सवाब उस की रूह को मिले)

इसी तरह एक और हदीस में है कि एक शख्स ने अर्ज किया : या रसूलल्लाह ﷺ मेरी मां का अचानक इन्तिकाल हो गया और वोह किसी बात की वसिय्यत न कर सकी मेरा गुमान है कि वोह इन्तिकाल के वक्त कुछ बोल सकती तो सदक़ा ज़रूर देती तो अगर मैं उस की तरफ़ से सदक़ा़ कर दूं तो क्या उस की रूह को सवाब पहुंचेगा? तो आप ﷺ ने इरशाद फरमाया कि : हां पहुंचेगा।

अल्लामा नववी رَحْمَةُ الله تعالى عليه ने इस हदीस की शरह में इरशाद फ़रमाया कि
“इस हदीस से साबित हुवा कि अगर मय्यित की तरफ से

सदक़ा दिया जाए तो मय्यित को इस का फाइदा और सवाब पहुंचता है इसी पर उ-लमा का इत्तिफ़ाक़ है।“

तीजे की फ़ातिहा :- मरने से तीसरे दिन बा’द कुरआन ख़्वानी और कलिमए तय्यिबा पढ़ा जाता है और कुछ बताशे या चने या मिठाइयां तक्सीम की जाती हैं और इन का सवाब मय्यित की रूह को पहुंचाया जाता है चूंकि येह ईसाले सवाब का एक तरीका है इस लिये जाइज़ और बेहतर है लिहाजा इस को करना चाहिये ।

चालीसवें और बरसी की फ़ातिहा :-
मरने के चालीसवें दिन बा’द ही कुछ खाना पकवा कर फुकरा व मसाकीन को खिलाया जाता है और क़ुरआन ख़्वानी भी की जाती है और इस का सवाब मय्यित की रूह को पहुंचाया जाता है इसी तरह एक बरस पूरा हो जाने के बा’द भी खानों और तिलावत वगैरा का ईसाले सवाब किया जाता है यह सब जाइज़ और सवाब के काम हैं लिहाज़ा इन को करते रहना चाहिये।

सदक़ा के जरिये मरहुमैन (मुर्दा) के लिए भलाई
मय्यित को किसी कारे खैर का सवाब बख़्शना बेहतर और अच्छा काम है चुनान्चे तफ्सीरे अज़ीज़ी पारह अम्म स. 113 पर है कि
“मुर्दा एक डूबने वाले की तरह किसी फरियाद रस के इन्तिज़ार में रहता है ऐसे वक़्त में सदक़ात और दुआएं और फातिहा इस के बहुत काम आते हैं येही वजह है कि लोग एक साल तक खुसूसन मौत के बा’द एक चिल्ले तक मय्यित को इस किस्म की इमदाद पहुंचाने की पूरी पूरी कोशिश करते हैं।“ (जन्नती ज़ेवर , पेज 301, 302, 303 हिंदी)

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Iman Ki Hifazat

ईमान की हिफाज़त

क़ुरआन में है: (तर्जुमा) “तो क्या वह जिसका सीना अल्लाह ने इस्लाम के लिये खोल दिया तो वह अपने रब की तरफ़ से नूर पर है,“ (सूरह ज़ुमर, आयत न. 22)

शाने नुज़ूल: रसूले करीम ﷺ ने जब यह आयत तिलावत फ़रमाई तो सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, सीने का ख़ुलना किस तरह होता है फ़रमाया कि जब नूर दिल में दाखि़ल होता है तो व खुलता है और उसमें फैलावा होता है. सहाबा ने अर्ज़ किया इसकी निशानी क्या है. फ़रमाया, ’इस फ़ानी दुनिया से कनाराकशी, आखि़रत की तरफ़ रुजू, मौत आने से पहले मौत की तैयारी“ (खजाइनुल ईरफ़ान)

ईमान पर खा़त्मा
अल्लाह त‘आला की नेयमतों में सब से बड़ी नेमत ईमान की दौलत है। इसकी हिफ़ाज़त हर मुसलमान को महबूब फ़र्ज़ होना चाहिए। बाज़ अकाबिर औलियाए कराम से मंकूल है के जो शख़्स मगरिब के बाद की दो सुन्नतों में से पहली रकअत में सूरह फातिहा के बाद सूरह फलक और दूसरी रक-अत में सूरह फातिहा के बाद सूरअ नास हमेशा पढा करे तो इस का ईमान भी महफ़ूज़ रहेगा और ख़तमा ईमान पर होगा।
हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह ने फरमाया के जो शख़्स ईमान की दौलत मुयस्सर आने पर हमेशा ख़ुदाय-ए ताला का शुक्रिया अदा करता रहेगा, इस का ईमान भी महफ़ूज़ रहेगा और ख़ात्मा ईमान पर होगा। बल्कि खुदा-ए -त‘आला के वादा के मुताबिक के: (तर्जुमा) के अगर तुम हमारी नेमतों का शुक्र अदा करो तो हम उन नेमतों में इज़ाफ़ा कर देंगे।
ख़ुदाय-ए त‘आला के इस वादे के मुताबिक ईमान में क़ुव्वत और ईमानी कामों में बरकत होगी इंशा अल्लाह (गंजिनाए असरार, पेज न. 16)

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Iman Ki Shakhain

ईमान की 60 या 70 से ज़्यादा शाखेंः
हज़रते अबू हुरैरह रदीअल्लाहु त’आला अन्हु नबी अलैहिस्सलाम से रिवायत करते हैं कि आप ﷺ इरशाद फरमाते हैं ईमान की साठ या 70 से ज़्यादा शाखें हैं और इनकी सबसे आ’ला जड़ और बुनियाद ला इलाहा इल्लल्लाह पर यकीन रखना है और सबसे अदना ईमान तकलीफ देह चीज़ का रास्ते से हटा देना और हया ईमान की एक शाख है। (शुअबुल ईमान जिल्द 1)

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Iman Ki Quwwat

ईमान की ताकत सबसे बढ़ कर 

अल्लाह फ़रमाता है : न सुस्ती करो और न ग़म खाओ तुम्ही ग़ालिब आओगे अगर ईमान रखते हो (कन्जुल ईमान, सूरह इमरान, आयत न 139)

तख़्लीक़े ईमान व कुफ्र
हदीस : जब अल्लाह त’आला ने ईमान को पैदा फ़रमाया तो उसने अर्ज की ऐ अल्लाह! मुझे कुव्वत अता फ़रमा, तो अल्लाह त’आला ने उसे हुस्ने खुल्क और सखावत से तक़‌वियत बख़्शी और जब अल्लाह तआला ने कुफ्र को पैदा फ़रमाया तो उसने अर्ज़ की ऐ अल्लाह मुझे कुव्वत बख़्श तो उसने उसे बुख़्ल (कंजूसी) और बद-खुल्की से त‌वियत बख़्शी।(मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब न. 85, पेज न. 481)

ईमान की अलामत
हज़रते अबू सईद से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने फ़रमाया कि दो खस्लतें मोमिन में जम्अ नहीं होगी, बखीली और बद अख़्लाकी । (सुनन तिर्मिज़ी )

मतलब येह है कि जो मोमिन होगा अगर बखील होगा तो बद अख्लाक नहीं होगा और अगर बद अख़लाक़ होगा तो बखील नहीं होगा येह दोनों बुरी खस्लतें एक साथ मोमिन में नहीं पाई जाएंगी। (जहन्नम के ख़तरात, पेज 164)

बुख़्ल की हलाक़ते
हज़रते इब्ने अम्र से रिवायत है कि इस उम्मत इब्तिदाई दौर के लोग यकीन और ज़ोहद की वजह से नजात पा गए और आख़िरी दौर के लोग बखीली (कंजूसी) और हिर्स की वजह से हलाक़ होंगे। (कंजुल उम्माल, ज़िल्द 3, हदीस 141)

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