Tarke Duniya

इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह किताब मुकाशफतुल क़ुलूब में लिखते है “कुरआने मजीद में दुनिया की मजम्मत और दुनिया से तवज्जोह हटा कर आखिरत की जानिब माइल करने के लिए बेशुमार आयतें हैं बल्कि अम्बियाए किराम अलैहिमुस्सलाम को भेजने का सबब यही तर्के दुनिया थी (मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 31)

दुनिया को तर्क क्यों करे?

हदीस : हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : दुनिया की महब्बत तमाम गुनाहों की जड़़ (असल) है।(मुकाशिफतुल क़ुलूब, बाब 31)
वाज़ेह हो जब इंसान आखि़रत की बजाए दुनिया की ज़िन्दगी को पसन्द करता है तो गुनाह को करने के लिए मजबूर और अल्लाह त‘आला से दूर हो जाता है।
अल्लाह फ़रमाता है (तर्जुमा) : क़ाफ़िर दुनिया की ज़िन्दगी पर इतरा गए और दुनिया की ज़िन्दगी आख़रित के मुक़ाबले नहीं मगर कुछ दिन बरत लेना (सूरह-रअद, आयत न. 26)

इसलिए दुनिया को तर्क करे
गुनाहों की तमाम अक़साम जैसे कुफ़्र व शिर्क व निफ़ाक़, सगीरा व कबीरा, फ़िस्क़ व फ़ुजूर, नाजाइज़ व हराम, ऐलानिया व ख़ूफ़िया में मुब्तला हो जाने की वजह यही दुनिया की महब्बत है यानी आख़रित को भूल कर दुनिया को तरजीह देना।

तर्के दुनिया का हुक़्म
हजरते अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिस ने दुनिया से मुहब्बत की उस ने आखिरत को नुकसान पहुंचाया और जिस ने आखिरत से मुहब्बत की उस ने दुनिया को किसी लाइक न समझा। तुम फानी दुनिया पर बाकी रहने वाली चीजों को तर्जीह दो (यानी आख़िरत से मुहब्बत करो और दुनिया से जरूरत का मामला रखो)।(मुकाशफतुल क़ुलूब, )

दुनिया को दुनियादारों के लिए छोड़ दो:
फरमाने नबवी है कि दुनिया दुनियादारों के लिए छोड़ दो, जिस ने अपनी ज़रूरत से ज़्यादा दुनिया ले ली. उस ने बेख़बरी में अपने लिए हलाकत ले ली। राहे खुदा में खर्च होने वाला माल बाक़ी रहता है (मुकाशफतुल क़ुलूब)

दुनिया को तरजीह (मान्यता) न दो
हज़रत ज़हाक रदियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पास एक शख़्स आया और सवाल किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! लोगों में ज़ाहिद कौन है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो क़ब्र और क़ब्र में जिस्म के गल जाने को नहीं भुलाता और दुनिया की बेजा ज़ेब व जीनत से गुरेज करता है और फ़ानी ( दुनिया ) पर बाक़ी ( आख़रत) को तरजीह देता है रोज़े फ़रदा को ज़िन्दगी में शुमार नहीं करता और अपने आप को मुर्दों में शुमार करता है। (तरगीब जि. 4)

तर्के दुनिया का सही माना
दुनियावी ज़िन्दगी मे आख़िरत का तलब दिल मे रखते हुवे तमाम हक़ वालों से दिली मुहब्बत करना और दुनिया को दीन का दुश्मन मानकर दुनिया और दुनिया की तमाम फ़ानी चीज़ों से मुहब्बत ना करना, सिर्फ जरूरतन इस्तेमाल करना वो भी अल्लाह, रसूलअल्लाह और औलिया अल्लाह के हुक़्म के दायरे में रहकर इसी काम का नाम तर्के दुनिया है।

तर्के दुनिया का गलत माना
बहुत सारे लोग तर्के दुनिया का गलत माना जानकर दुनियावी चीजो को इस्तेमाल करना ही छोड़ देता है जबकि दुनियावी सामान का इस्तेमाल उस चीज से मुहब्बत किये बगैर जरूरत के लिए इस्तेमाल करना जायज है जैसे माल की जरूरत जायज है लेकिन माल की मुहब्बत नाज़ायज़ है। जो आबादी से दूर रहकर जंगलों में ज़िन्दगी गुजारने की चाहत तय कर लेते है। खूब जान लेना चाहिए कि दौर के हिसाब से शैतान का ग़लबा एडवांस हुआ और जो सख्स दौर के मुताबिक शैतान का मुखालफ़त न करे ऐसा शख़्स मोहताजी का शिकार हो जाएगा जो शैतान के तरफ से है यानी उसपर शैतान का ग़लबा होगा , मोहताजी इंसान को कुफ्र की हद तक पहुचा सकता है। इसलिए मुआशरे में रहकर ज़िन्दगी जीना चाहिए ताकि हुक़ूक़ूल इबाद के फावायद से महरूम न रह जाये।

अक़्ल से दुनिया को तर्क करो
जो कुछ चीज़ तुम्हें दी गई है वह दुनियावी ज़िन्दगी का बर्तावा और उसका सिंगार और जो अल्लाह के पास है और वह बेहतर और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला तो क्या तुम्हें अक़्ल नहीं। (सुरह कसस, आयत न. 60)

दुनियादारो के लिए आख़िरत में कुछ हिस्सा नहीं
कोई आदमी यूँ कहता है कि ऐ रब हमारे हमें दुनिया में दे, और आख़िरत में उसका कुछ हिस्सा नहीं.
(सुरह बकरा , आयत न. 200)

काफ़िरों की निगाह में दुनिया की ज़िन्दगी आरास्ता की गई और मुसलमानों से हंसते हैं और डर वाले उनसे ऊपर होंगे क़यामत के दिन और ख़ुदा जिसे चाहे बेगिनती दे
(सुरह बकरा , आयात न. 212)

दुनियादारी से बचो
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है (तर्जमा) : तुम्हारे लिये रात और दिन बनाए कि रात में आराम करो और दिन में उसका फज़ल ढूंढो और इसलिये कि तुम हक़ मानो (यानी दीनदारी अपनाओ)। (कंजूल ईमान, सूरह क़सस, आयत नं. 73)

दुनिया को तर्क करना असल नेकी है

दुनिया की महब्बत दिल से निकाले बगै़र तौबा मुम्किन नहीं। बगै़र तौबा के हकी़की नेकी नहीं। हकी़की़ नेकी व तौबा के लिए दुनिया की महब्बत दिल से निकालना शर्त है। जो आख़रित से महब्बत करके उख़रवी ज़िन्दगी को हासिल करने के लिए सिर्फ़ दुनियवी चीज़ों को ज़रूरत के तहत इस्तेमाल करे वोह कामयाब हो जाएगा । अगर आख़रित को भूल कर दुनियवी चीज़ों से महब्बत करे और कुफ़्फ़ार की तरह दुनियवी ज़िन्दगी को पसन्द करे और कुफ़्फ़ार के तौर तरीके को अपनाए वोह हलाक़ हो जाएगा।

दुनिया की मिसाल गधे की तरह है जैसे कि मुसाफ़िर अपनी मंज़िल तक पहुंचने के लिए गधे का इस्तेमाल करता है वैसे ही तू आख़रित का मुसाफ़िर है और दुनियवी ज़िन्दगी एक सफ़र है और जितने भी इस्तेमाल के सामान है सब गधे की मानिन्द है लिहाज़ा तेरा माल व दौलत, सोना, चांदी, मकान, दुकान, मोबाईल, कंप्यूटर, कार, बाइक वग़ैरह चीज़े सब लानत के क़ाबिल हैं जो मौत के बाद साथ नहीं जाती। लिहाज़ा इन दुनियवी चीज़ों से महब्बत न करते हुए सिर्फ ज़रूरतन इस्तेमाल कर और हो सके तो जरूरत भी कम कर ले ये ख़ास लोगों यानी अल्लाह वालों की अलामत हैं। याद रख दुनिया व दुनियवी चीज़ों की ज़रूरत जाइज़ है लेकिन महब्बत नाजाइज़ है यहां तक की कुफ़्र है।

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