हुक़ूक़ूल इबाद के अदायगी का हुक़्म

हुकूकुल इबाद (बन्दों के हक़ )

हर मुसलमान पर यह लाज़िम है कि जब वह दूसरे मुसलमान से मिले तो उसे सलाम कहे, जब वह उसे दावत दे तो उसकी दावत कबूल करे, जब उसे छींक आये तो उसका जवाब दे, जब वह बीमार हो तो उसकी अयादत को जाए, जब वह मर जाये तो उसके जनाज़ा में हाज़िर हो, जब वह कसम दिलाये तो उसकी कसम को पूरा करे, जब वह नसीहत का ख़्वास्तगार हो तो उसे नसीहत करे , उसकी गैर मौजूदगी में उस की पीठ की हिफाज़त करे यानी उसकी गीबत, चुगली न करे और उसके लिए वही कुछ पसन्द करे जो अपने लिए पसन्द करता है और हर वह चीज़ जिसे वह अपने लिए नापसन्द समझता है उसके लिए भी नापसंद समझे यह तमाम अहकाम हदीसों में वारिद हुए हैं चुनान्चे हज़रते अनस रज़ियल्लाहु अन्हु हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रिवायत करते हैं, आप ने फ़रमाया तुझ पर मुसलमानों के चार हक हैं, उनके नेक की इमदाद कर बुरे के लिए तलबे मगफिरत कर उनमें से जाने वाले (मरने वाले) के लिए दुआ मांग और उनमें से तौबा करने वाले के साथ मुहब्बत रख। (मुक़ाशफूतुल क़ुलूब, बाब 70, पेज 416) 

हुक़ूक़ूल इबाद की अदायगी

जानना चाहिए कि हुक़ूक़ूल इबाद यानी बंदों का हक़ का अदायगी हुक़्कुल्लाह से भी ज्यादा मुश्किल है क्योंकि अल्लाह के बंदों का मुख़्तलिफ़ अकसाम और मुख़्तलिफ़ मरातिब है इस वजह से हम पर भी मुख़्तलिफ़ हुक़ूक अदा करने का हुक़्म है। मसलन बुलंद मरातिब वाले बंदों का हुक़ूक अवाम से अलग है जैसे रसूल, अम्बिया, असहाब, अहले बैत, अईमा, औलिया ये तमाम अल्लाह के ख़्वासम खास व ख़्वास बंदे है इसलिए इन बंदों के हुक़ूक भी हम पर अवाम से बढ़कर है। जैसे हमारे नबी से मुहब्बत करने का हुक़्म है लेकिन सबसे ज्यादा और बढ़कर, उसी तरह बाकी हुक़ूक का अदायगी भी ज्यादा और बढ़कर है। यानी जो जैसा मरतबे पर है उसके साथ हुक़ूक का ममाल वैसा है। इस महफ़ूम को इस हदीस से जाना और माना जा सकता है।

हज़रत अबू दाऊद ने हज़रते आइशा रदियल्लाहु तआला अन्हा से रिवायत की कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि लोगों को उनके मरतबे में उतारो यानी हर शख़्स के साथ उस तरह पेश आओ जो उसके मरतबे के मुनासिब हो। सबके साथ एक सा बरताव न हो मगर उसमें ये लिहाज़ ज़रूर करना होगा कि दूसरे की तहकीर व तजलील न हो । (बहारे शरीअत, हिस्सा 16)

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