Huqooqul Ibad

हुक़ूकुल इबाद क्या है?
हुकूकुल इबाद का मतलब बन्दों का हक है। हर इंसान पर दूसरों के कुछ फ़राइज़ और ज़िम्मेदारियाँ आइद होती हैं जिन्हें हुकूकुलएबाद कहा जाता है उन हुकूक का अदा करना हर शख़्स के लिए जरूरी है क्योंकि बा काइदगी से हुकूक का अदायगी में किसी की हक़ तल्फी नहीं होती। हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद अदा करना ही अल्लाह का इबादत है जैसा कि क़ुरआन में है इंसान और जिन्न इबदत के लिए पैदा किये गए है इसका मतलब ये भी हुआ कि इंसान और जिन्न हुक़ूकुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद के लिए पैदा किए गये है। मुसलमान को चाहिए की अल्लाह की मुकम्मल इबादत करने के लिए हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद की मुकम्मल अदायगी करे।


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हुक़ूक़ की तफ्सील

हुक़ूक़ की तफ्सील

बिरादराने मिल्लत हुक़ूक़ की दो किस्में हैं एक हुक़ूक़ुल्लाह दूसरे हुकुकुल इबाद फिर हुक़ूक़ुल्लाह की दो किस्में हैं। एक वह कि अगर उनके बारे में बन्दा से कुसूर वाकेअ हुआ, तो वह सिर्फ तौबा से माफ हो सकते हैं जैसे कि शहर में जुमा और ईदैन की नमाज छूट जाने के गुनाह, या शराब पीने और नाच वगैरा देखने के गुनाह और दूसरे वह जो सिर्फ तौबा से नहीं माफ हो सकते जैसे……


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Ummat Par Nabi ﷺ Ke Huqooq

हुक़ूके नबी ﷺ के लिए उम्मत पर तक़ाज़े

ज़ाहिर है कि हुजूर सरवरे अंबिया महबूबे किब्रिया ने अपनी उम्मत के लिए जो जो मशक्कतें उठाई उनका तकाज़ा है कि उम्मत पर हुजूर के कुछ हुकूक है जिनको अदा करना हर उम्मती पर फ़र्ज़ व वाजिब है (यानी हर हाल में करना है)।

उम्मतियों पर नबी के 8 हुक़ूक

हज़रत अल्लामा काजी अयाज़ ने नबी के मुकद्दस हुकूक को अपनी किताब ‘शिफा शरीफ’ में बहुत ही मुफस्सल तौर पर बयान फ़रमाया है। हम यहाँ उनमें से कुछ का खुलासा तहरीर करते हुए निम्नलिखित 8 हुकूक का ज़िक्र करते हैं।

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(1) ईमान बिरर्रसूल ﷺ
अल्लाह फ़रमाता है : ऐ लोगो तुम्हारे पास ये रसूल ﷺ हक़ के साथ तुम्हारे रब की तरफ़ से तशरीफ़ लाए तो ईमान लाओ अपने भले को। (सूरह निसा, आयत न. 170)


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(2) मुहब्बते रसूल ﷺ
हज़रते अनस से रिवायत है कि रसूल ﷺने फरमाया कि तुममें से कोई उस वक्त तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि मैं उसके नज़दीक उसके बाप, उसकी औलाद और तमाम लोगों से बढ़ कर महबूब न हो जाऊँ। (बुखारी शरीफ जिल्द-1, सफा 7. बाब हुब्बे- रसूल )


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(3) ताज़ीमे रसूल ﷺ

तर्जमा : ऐ लोगों तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और रसूल की तअज़ीम व तौक़ीर करो, और सुबह शाम अल्लाह की पाकी  बोलो (सुरह फ़तह, आयत नं. 9)


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(4) इताअते रसूल ﷺ

तर्जमाः- जिसने रसूल ﷺ का हुक्म माना बेशक उसने अल्लाह का हुक्म माना। (सूरह निसा, आयत नं. 80 )


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(5) इत्तिबा-ए-सुन्नते रसूल ﷺ


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(6) दुरूद शरीफ की कसरत

बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते दुरूद भेजते हैं उस ग़ैब बताने वाले (नबी) पर ऐ ईमान वालों उनपर दुरूद और ख़ूब सलाम भेजो। (सुरह अहजाब, आयत नं. 56)


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(7) मदहे रसूल ﷺ


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क़ब्रे अनवर की ज़ियारत
हुज़ूरे अक़दस के रोज़ा-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत सुन्नते मुअक्कदा क़रीब (वाजिब) यानी ज़रूरी है। मुसलमानों पर नबी ﷺ के हुक़ूक में से एक हक़ ये भी है कि हुज़ूरे अक़दस के रोज़ा-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत की जाए…….


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अहले बैत के हुक़ूक़

क़ुरआन में अल्लाह का फ़रमान है : (तर्जुमा) ऐ महबूब तुम फ़रमाओ मैं इस (नेअमतों व फ़ज़्ल) पर तुम से कुछ उजरत नहीं मांगता मगर क़राबत की महब्बत (का मुतालबा करता हूं), (सूरह शूरा , आयात 23)


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औलिया अल्लाह के हुक़ूक़

औलिया अल्लाह के हुक़ूक़


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मोमिनों के हुक़ूक़

आक़ा  ﷺ ने इर्शाद फ़रमायाः 

لا تَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ حَتَّى تُؤْمِنُوا وَلَا تُؤْمِنُوا حَتَّى تَحَابُّوا

हदीस  (तर्जमा) “तुम तब तक जन्नत में नहीं दाख़लि होगे, जब तक कि ईमान न ले आओ; और तुम तब तक ईमान वाले नहीं होगे, जब तक कि आपस (मोमिन-मोमिन) में एक-दूसरे से मुहब्बत न करने लगो“ (सहीह मुस्लिम, हदीस नं. 93, जिल्द नं. 1)


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