Maali Ibadat

बहारे शरीअत हिस्सा 5 में है “अल्लाह तआ़ला की राह में माल खर्च करना निहायत अच्छा काम है। माल से तुम अगर अल्लाह को राज़ी न कर सके तो वो माल तुम्हारे क्या काम का है और अपने काम का वही है जो खा लिया, पहन लिया और आखि़रत के लिए अल्लाह के राह में ख़र्च किया न कि वह जो जमा किया । (बहारे शरीअ़त, हिस्सा 5)”

दीन का काम बग़ैर पैसों के न होगा

(फतावा रज़्वीया के हवाले से)

हदीस में इरशादे मुस्तफ़ा ﷺ है  कि (तर्जमा) “एक ज़माना ऐसा आएगा की दीन का काम भी बे रुपया के न चलेगा।” 

हुज़ूर आला हज़रत फरमाते है कोई बाकायदा (ढंग का) आलीशान मदरसा तो आपके (मुसलमानों के) हाथ में नहीं, कोई अख़बार पर्चा आपके यहाँ नहीं, मुदर्रेसीन, वाइजीन, मुनाजेरीन, मुसन्नेफीन की कसरत बक़दरे हाजत (जितना जरूरत है) आपके (मुसलमानों के) पास नहीं, जो कर सकते (काबिल) हैं वो फारिगुल-बाली (उनके पास वक़्त) नहीं, जो फारिगुल बाली (जिनके पास वक़्त है) हैं वह अहल (क़ाबिल) नहीं, बाज़ ने खूने जिगर खाकर किताबे लिखी तो छपीं कहाँ , किसी तरह से कुछ छपा तो तक़सीम कैसे हो. दीवान नहीं, नाविल नहीं कि हमारे भाई कम पैसे के चीज को थोड़ा ज्यादा पैसा देकर शौक से खरीदें (यह सोच कर की मुसलमान भाई को ही तो दे रहा हु), यहाँ तो सर चपेटना (यानी दाम कम करा कर दीनी किताबों को भी खरीदना है), रुपया ज्यादा हो तो मुम्किन कि यह सब शिकायात रफा (खत्म) हों। 

1. अज़ीमुश्शान मदारिस खोले जाएं, बाकायदा तालीमें हों।

2. तलबा को वज़ाइफ (स्कॉलरशिप) मिलें कि ख़्वाही नख्वाही गिरवीदह हों। (यानी चाह के भी किसी के तरफ पैसा के लिए न झुके)

3. मुदर्रिसों की ज्यादा से ज्यादा तन्ख्वाहें उनकी कार्रवाइयों पर दी जाएं कि लालच से जान तोड़ कर (यानी जरूरत पूरा हो ताकि) कोशिश करें।

4. तबाए तलबा (मदारिस के बच्चो) की जाँच हो जो जिस काम के ज़्यादा मुनासिब देखा जाए मकूल वज़ीफा (पेमेंट) देकर उसमें लगाया जाए। यूं उनमें कुछ मुदर्रेसीन बनाए जाएं, कुछ वाइज़ीन, कुछ मुसन्नेफीन, कुछ मुनाजेरीन, फिर तस्नीफ व मुनाज़रा में भी तौजीअ हो। कोइ किसी फन पर कोई किसी फन पर।

5. उन में जो तैयार होते जाएं, तन्ख़्वाहें देकर मुल्क में फैलाए जाएं कि तहरीरन (लिखकर) और तक़रीरन वअज़न (बयान) व मुनाज़रतन (मुनाजरा के जरिये) दीन व मज़हब को फैलाये , जब आपके उलमाए हक़ मुल्क में फैलें उस वक़्त कौन उनकी कुव्वत का सामना कर सकता है।

6. हिमायत मज़हब व रददे बद मज़हब में मुफीदे कुतुब व रसाइल, मुसन्निफों को नज़राने देकर तस्नीफ कराए जाएं।

7. तस्नीफ शुदह और नए तस्नीफ रसाइल उम्दा और खुश ख़त (पम्पलेट) छाप कर मुल्क में मुफ्त शाए किए जाएं।

8. शहर शहर में अक़ाइद व आमाल का निगरानी करने वाला कोई रहें जहाँ जिस किस्म के वाइज़, मनाज़िर या तस्नीफ की हाजत हो आपको इत्तिला दें, आप सरकूबी आदा के लिए अपनी फौजें, मैगज़ीन, रिसाले, भेजते रहें।

9. जो हम में काबिलकार (दीनी ख़िदमत के लायक का शख्स) मौजूद हो लेकिन अपनी रोजगार के वजह से  मशगूल हैं. वजा़इफ़ मुक़र्रर (पेमेंट दे) कर के फा़रिगु़ल- बाली (दीन के लिए वक़्त देने वाला) बनाए जाएं, और जिस काम में उन्हें महारत हो, लगाए जाएं।

10. आपके मज़हबी अख़बार शाए हों और वक़्तन फ़वक़्तन हर किस्म के हिमायते मज़हब में मज़मीन तमाम मुल्क में बकीमत व बिला कीमत (फ्री) में रोज़ाना या कम अज कम हफ़्तावार पहुँचाते रहें। उसके बाद आप आगे फरमाते हैं:

मेरे (यानी आला हजरत के) ख्याल में तो यह तदाबीर हैं, रुपया होने की सूरत में अपनी कुव्वत फैलाने के अलाया गुमराहियों की ताकतें तोड़ना भी इन्शाअल्लाहुल-अजीज आसान होगा। मैं देख रहा हूँ  कि गुमराहों के बहुत से लोग सिर्फ तन्ख्वाहों के लालच से जहर उगलते (यानी बातिल मसाइल बताते) फिरते हैं, उनमें जिसे दस की जगह बारह (हज़ार) दीजिए अब आपकी सी कहेगा (जो बोलना बोले जाए वही बोलेंगे) , या कम अज़ कम बलुक्मा दोख़्ता बह तो होगा।

देखिए हदीस का इरशाद सादिक है कि (तर्जमा)’आखिर जमाना में दीन का काम भी दिरहम व दीनार से चलेगा।”

और क्यों न हो कि सादिक व मज़दूक सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का कलाम है, आलिम मा काना वमा यकूनु सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की खबर है। (फतावा रज़्वीया जिल्द 12, स० 133, 134)

जानना चाहिए कि हुक़ूक अदा करने का नाम इबादत है और ये 2 तरह का है 1. हुक़ूकुल्लाह (अल्लाह का हक़) और हुक़ूक़ूल इबाद (बंदों का हक़)। हुक़ूक का माना है कुछ जिम्मेदारया निभाना। जैसे अल्लाह ने जिस्म व माल दिया तो दोनों को अल्लाह के राह में खर्च करना यानी अल्लाह त’आला ने दिया तो हमे भी अल्लाह के राह में देना (यानी खर्च करना) ये हुक़ूकुल्लाह है। उसी तरह हुक़ूक़ूल इबाद यानी बंदों के हुक़ूक है । अल्लाह जिस बंदों के जरिये किसी को कुछ अता किया तो उस बंदों का हक़ भी उसके जिम्मे है जैसे नबी का उम्मती पर, वालिदैन का औलाद पर, पीर का मुरीद पर, दोस्त का दोस्त पर, रिश्तेदारों का रिश्तेदारों पर, इसी तरह जिससे जैसा जुड़ाव होता जाए उसी तरह उसके जिम्मे हुक़ूक की अदायगी लाज़िमी है।

दोनों हुक़ूक यानी हुक़ूकुल्लाह और हुक़ूक़ूल इबाद की अदायगी के लिए 2 तरीके है तरीकाये अव्वल – बदनी हुक़ूक, तरीकाए दोम – माली हुक़ूक।

बदनी हुक़ूक वो हुक़ूक है जो ज़िस्मानी आज़ा की क़ुव्वत से अदा की जाती है जैसे हम्दो सना, अल्लाह का ज़िक्र, नमाज़, रोज़ा, तिलावत, शब बेदारी, दरूद, नात, मनकबत वग़ैरह जिसमे माल ख़र्च करने की हाज़त नहीं।

माली हुक़ूक
माली हुक़ूक वो हुक़ूक है जो हुक़ूकुल्लाह और हुक़ूक़ूल इबाद दोनों की अदायगी के लिए है , माली इबादत माल और माल के साथ बदन से भी अदा किया जाता है । जैसे क़ुर्बानी, हज्ज, जिहाद, हिज़रत वगैरह ये अल्लाह का हुक़ूक में से है ये माली हुक़ूक के साथ ज़िस्म से भी

माली हुक़ूक़ के जरिये हुकुक़ूल इबाद (यानी बंदों का हुक़ूक) अदायगी के लिए नफ़्ली सदक़ा, सदकए जरिया, इसाले सवाब, तोहफा / हदिया, ज़कात, फितर, उश्र, इसार वगैरह । अल्लाह तआला ने माली हुक़ूक की अदायगी का हुक़्म इसलिए दिया है ताकि अल्लाह के और बंदें जो गरीब, मिस्कीन , जरूरतमंद और मोहताज़ है उसकी ख्याल रखा जाए उसकी, जरूरतें पूरी की जाए, उसे मोहताजी से बचाया जाए ताकि वो बंदा मोहताजी से बचकर अल्लाह का शुक्र अदा करने वाला बन जाये और शैतानी व नाफ़सानी खसलतों के बजाए ईमानी खसलते दिल मे बसा कर मोमिन बन जाये।

ईमान वाले हो तो राहे खु़दा में खर्च करो

कुरआन में है : अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और उसकी राह कुछ वह ख़र्च करो जिसमें तुम्हें औरों का जानशीन किया तो जो तुम में ईमान लाए और उसकी राह में ख़र्च किया उनके लिये बड़ा सवाब है। (सूरह अल हदीद, आयत नं. 7)

Daily Donate

1. Nafli Sadqa

माल में बरकत :

अल्लाह फ़रमाता है : (तर्जुमा) जो चीज तुम अल्लाह की राह में खर्च करो वो उसके बदले और देगा।
(कंजुल ईमान, सूरह सबा, आयत न. 39)।


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2. Sadqa E Jariya

मरने के बाद 3 चीज़ों का सवाब

हदीस :- हज़रत अबू हुरैरा रदि़यल्लाहु तआ़ला अन्हु ने बयान किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि इन्सान जब मर जाता है तो ………


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3. Isale Sawab

ईसाले सवाब

कुरआने मजीद की तिलावत या कलिमा शरीफ़ या नफ़्ली नमाज़ों या किसी भी बदनी या माली इबादतों का सवाब किसी दूसरे को पहुंचाना येह जाइज़ है।


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4. Tohfa/Hadiya

माल में बरकत :

अल्लाह फ़रमाता है : (तर्जुमा) जो चीज तुम अल्लाह की राह में खर्च करो वो उसके बदले और देगा।
(कंजुल ईमान, सूरह सबा, आयत न. 39)।


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Monthly Donate

माल में बरकत :

अल्लाह फ़रमाता है : (तर्जुमा) जो चीज तुम अल्लाह की राह में खर्च करो वो उसके बदले और देगा।
(कंजुल ईमान, सूरह सबा, आयत न. 39)।


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Yearly Donate

1. Zakat

मालदारों के माल में गरीबों का हक़ :

अल्लाह फ़रमाता है : (तर्जुमा) वो (मालदार) जिनके माल में एक मालूम हक़ है उसके लिये जो (मांगने वालें) मांगे और जो मांग भी न सके तो मेहरूम रहे। (कंजुल ईमान, सूरह मा’अरीज, आयत न. 24,25)


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2. Sadqa E Fitr

माल में बरकत :

अल्लाह फ़रमाता है : (तर्जुमा) जो चीज तुम अल्लाह की राह में खर्च करो वो उसके बदले और देगा।
(कंजुल ईमान, सूरह सबा, आयत न. 39)।


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3. Ushra

उश्र 

ज़मीन से जो भी पैदावार हो गेहूं, जव, चना, बाजरा, धान वग़ैरा हर किस्म के अनाज, गन्ना, रूई हर किस्म की तरकारियां फूल फल मेवे सब में उश्र वाजिब है थोड़ी पैदा हो या ज़ियादा । (आलमगीरी, ज़िल्द 1, पेज 174)


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4. Isale Sawab

ईसाले सवाब

कुरआने मजीद की तिलावत या कलिमा शरीफ़ या नफ़्ली नमाज़ों या किसी भी बदनी या माली इबादतों का सवाब किसी दूसरे को पहुंचाना येह जाइज़ है।


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Isar


माल में बरकत :

अल्लाह फ़रमाता है : (तर्जुमा) जो चीज तुम अल्लाह की राह में खर्च करो वो उसके बदले और देगा।
(कंजुल ईमान, सूरह सबा, आयत न. 39)।


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