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दिसम्बर 2023

Qabre Anwar Ki Ziyarat

क़ब्रे अनवर की ज़ियारत

क़ब्रे अनवर की ज़ियारत
हुज़ूरे अक़दस के रोज़ा-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत सुन्नते मुअक्कदा क़रीब (वाजिब) यानी ज़रूरी है। मुसलमानों पर नबी ﷺ के हुक़ूक में से एक हक़ ये भी है कि हुज़ूरे अक़दस के रोज़ा-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत की जाए। मदीना मुनव्वरा में सरवरे दो आलम सल्लल्लाहु त’आ़ला अलैहि व सल्लम की आख़िरी आराम गाह है और यही मस्जिदे नबवी है, यही वोह मक़ाम है जहाँ आप हिजरत के बाद जलवा अफ़रोज़ हुए और तादमे आख़िर रहे। इसलिए अल्लाह त’आला के मुक़द्दस घर ख़ाना ए काबा में हज या उमरा की सआदत हासिल करने के बाद यहाँ की हाज़िरी दीनो दुनिया की फ़लाह व सआदत का मुजिब है। और क़ियामत के रोज़ रसूल ﷺ की शफाअत का ज़रीआ बनेगी। इसलिए क़ब्रे अनवर की ज़ियारत बहुत ज़रूरी है। ज़ियारत के बग़ैर वापस लौट आना सख़्त महरूमी और बद बख़्ती है। क़ुरआने पाक में बारगाहे रिसालत की हाज़िरी को गुनाहों की बख़्शिश व मग़फिरत का ज़रीआ क़रार दिया गया है।

क़ब्रे अनवर की ज़ियारत हर मुसलमान पर हक़ है
हदीस : (तर्जुमा) हज़रत अनस रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ हिजरत कर के जब मक्का शरीफ से तशरीफ लाये तो वहाँ की हर चीज़ पर अंधेरा छा गया और जब मदीना तय्यबा पहुँचे तो वहाँ की हर चीज़ रौशन हो गई हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मदीना मेरा घर है और उसी में मेरी क़ब्र हो गई और हर मुसलमान पर हक़ है कि उसकी ज़ियारत करे। (सीरते मुस्तफ़ा, अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी )

रोज़ा-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत का हुक़्म
अल्लाह त’आला ने क़ुरआन मजीद में इर्शाद फरमाया किः- (तर्जुमा) “और अगर ये लोग जिस वक़्त कि अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं आप के पास आ जाते और ख़ुदा से बख़्शिश मांगते और रसूल ﷺ उनके लिए बख़्शिश की दुआ फरमाते, तो ये लोग ख़ुदा को बहुत ज़्यादा बख़्शने वाला मेहरबान पाते”।
इस आयत में गुनाहगारों के गुनाह की बख्शिश के लिए अर्हमुराहिमीन ने तीन शर्तें लगाई हैं। पहले दरबारे रसूल ﷺ में हाज़िरी, दूसरे इस्तिग़फार, तीसरा रसूल ﷺ की दुआ ए मग़फिरत। येह हुक्म हुज़ूर की ज़ाहिरी दुनियावी ज़िंदगी ही तक महदूद नहीं।
बल्कि रोज़ा-ए- अक़दस में हाज़िरी भी यक़ीनन दरबारे रसूल ﷺ ही में हाज़िरी है। इसीलिए उलमा-ए-किराम ने खुलकर फ़रमा दिया है कि हुज़ूर के दरबार का फ़ैज़ आपकी वफ़ाते अक़दस से ख़त्म नहीं हुआ है। इसलिए जो गुनहगार क़ब्रे अनवर के पास हाज़िर हो जाए और वहाँ ख़ुदा से बख़्शिश की दुआ करे।
चूँकि हुज़ूर तो अपनी क़ब्रे अनवर में अपनी उम्मत के लिए इस्तिग़फार फ़रमाते ही रहते हैं इसलिए उस गुनहगार के लिए मग़फिरत की तीनों शर्तें पा ली गईं इसलिए इन्शाअल्लाह त’आला उसकी ज़रूर मग़फिरत हो जाएगी। यही वजह है कि चारों मज़ाहिब के उलमा-ए-किराम ने हज व ज़ियारत के बारे में लिखी हुई किताबों में यह तहरीर फ़रमाया है कि जो शख्स भी रोज़ा-ए-मुनव्वरा पर हाज़िरी दे उसके लिए मुस्तहब है कि इस आयत को पढ़े। फिर ख़ुदा से अपनी बख़्शिश की दुआ मांगे।

मस्जिदे नबवी में दाख़िल के आदाब :
मस्जिदे नबवी में दाख़िल होते वक़्त पहला दाहिना क़दम रखें और मस्जिदे नबवी में दाख़िल होते वक्त यह दुआ पढ़े: (तर्जुमा) ऐ अल्लाह ! दुरूद भेज हमारे सरदार मुहम्मद मुस्तफा स़ल्लल्लाहु त’आला अलैहि वसल्लम और उनकी आल पर ऐ अल्लाह ! मेरे गुनाहों को बख़्श दे और मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे ऐ अल्लाह आज के मुझे तेरी तरफ मुतवज्जह होने वालो में सब से ज़्यादा मुतवज्जह बना ले। तेरा क़ुर्ब हासिल करने वालो में सब से ज़्यादा क़रीब बना ले और ज़्यादा फाइज़ुलमराम कर उन्ही से जिन्हो ने तुझ से दुआ की और अपनी मुरादें मांगी“ (सुन्नी फ़ज़ाइले आमाल, पेज 379)

गोया मेरी ही ज़ाहिरी ज़ियारत की
हदीस : (तर्जुमा) : हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जिस ने मेरी हयाते ज़ाहिरी के बाद हज किया और मेरी क़ब्र की ज़ियारत को आया तो गोया उसने मेरी ज़ाहिरी हयात में मेरी ज़ियारत की (बैहक़ी शो’बुल ईमान)

मेरी शिफाअत ज़रूरी हो गई
हदीस : (तर्जुमा) : हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जिस शख़्स ने मेरी क़ब्र की ज़ियारत की उसके लिए मेरी शिफाअत ज़रूरी हो गई। (दारे कुतनी)

वोह क़ियामत में मेरे पड़ोसी
हदीस : (तर्जुमा) आले ख़िताब के एक आदमी की रिवायत है कि रसूल ﷺ ने फ़रमाया कि जो शख़्स इरादा कर के मेरी ज़ियारत करे वोह क़ियामत में मेरे पड़ोस में होगा और जो शख़्स मदीना में क़ियाम करे और वहाँ की तंगी पर सब्र करे मैं उसके लिए क़ियामत में गवाह और सिफारिशी हूँगा। और जो हरमे मक्का या हरमे मदीना में मर जाए वोह क़ियामत में अमन वालो में उठेगा। (बैहक़ी शो’बुल ईमान)

दो मबरूर हज्जों का सवाब
हदीस 5: (तर्जुमा) हज़रत इब्ने अब्बास रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि जो शख़्स हज्ज के लिए मक्का मुकर्रमा जाए उसके बाद मेरी मस्जिद में आए उस के लिए दो मबरूर हज्जों का सवाब होगा। (अल इतहाफ़)

क़ब्रे अनवर के पास दरूद पढ़ना
हज़रत अबू हुरैरा रदीअल्लाहु अन्हु से रिवायात है कि जो शख़्स भी मेरी क़ब्र के पास आ कर मुझ पर दुरूद और सलाम पेश करे तो अल्लाह त’आला मेरी रूह तक पहुँचा देता है उसके सलाम का जवाब देता हूँ। (सुन्नी फ़ज़ाइले आमाल, पेज 377)

क़ब्रे अनवर के पास से दरूद का जवाब
हज़रत अबू हुरैरा रदीअल्लाहु त’आला अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु त’आला अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि जो शख़्स मेरी क़ब्र के पास खड़ा हो कर मुझ पर दुरूद पढ़ता है मैं उसको ख़ुद सुनता हूँ और जो किसी और जगह दुरूद पढ़ता है तो उसकी दुनिया और आख़िरत की ज़रूरतें पूरी की जाती हैं और मैं क़ियामत के दिन उसका गवाह और उस की सिफारिशी हूँगा।“ (बैहक़ी)

रहमत का नुज़ूल और हाजत पूरी होना
इब्ने अबी फ़दीस का बयान है कि जो शख़्स हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु त’आला अलैहि वसल्लम की क़ब्रे मुबारक के पास खड़े हो कर यह आयत पढ़े। 3) उसके बाद 70 मर्तबा सल्लल्लाहु अलैका या मुहम्मद कहे तो एक फिरिश्ता कहता है कि ऐ शख्स अल्लाह जल्ल शानोहु तुझ पर रहमत नाज़िल करता है और उसकी हर हाजत पूरी कर दी जाती है“ (बैहकी)

इसीलिए सहाबा ए किराम के मुक़द्दस ज़माने से लेकर आज तक तमाम दुनिया के मुसलमान क़ब्रे मुनव्वर की ज़ियारत करते और आपकी मुक़द्दस बारगाह में वसीला और मदद करते रहे हैं इन्शाअल्लाह त’आला क़ियामत तक यह मुबारक सिलसिला जारी रहेगा।

एक देहाती का वाक़िआ
हज़रते अमीरुल मोमिनीन अली मुर्तजा रदीअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि वफ़ाते अक़दस के तीन दिन बाद एक देहाती मुसलमान आया। क़ब्रे अनवर पर गिर कर लिपट गया। फिर कुछ मिट्टी अपने सर पर डाल कर यूँ अर्ज़ करने लगा कि ’या रसूल ﷺ आपने जो कुछ फ़रमाया हम उस पर ईमान लाए हैं। अल्लाह त’आला ने आप पर क़ुरआन नाज़िल फरमाया जिसमें उसने इरशाद फ़रमाया कि (तर्जुमा :अगर ये लोग जिस वक़्त कि अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं आप के पास आ जाते और ख़ुदा से बख़्शिश मांगते और रसूल ﷺ उनके लिए बख़्शिश की दुआ फरमाते, तो ये लोग ख़ुदा को बहुत ज़्यादा बख़्शने वाला मेहरबान पाते।) तो या रसूल ﷺ मैंने अपनी जान पर (गुनाह करके) ज़ुल्म किया है इसलिए मैं आपके पास आया हूं ताकि आप मेरे हक़ में मग़फिरत की दुआ फरमाएँ। देहाती की इस फरियाद के जवाब में क़ब्रे अनवर से आवाज़ आई कि ऐ देहाती तू बख़्श दिया गया“ (वफ़ा उल वफ़ा, जिल्द-2, सफ़ा 412)

हुज़ूर अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी अलैहिर्रहमह सीरते मुस्तफ़ा किताब में लिखते है
ज़रूरी तंबीहः नाज़िरीने किराम येह सुन कर हैरान होंगे कि मैंने अपनी आँखों से देखा है कि गुंबदे ख़ज़रा के अन्दर मवाजले अक़दस और उसके क़रीब मस्जिदे नबवी की दीवारों पर क़ब्रे मुनव्वरा की ज़ियारत की फज़ीलतों के बारे में जो हदीसें कुन्दा की हुई थीं नज्दी हुकूमत ने इन हदीसों पर मसाला लगवाकर उनको मिटाने की कोशिश की है। अगरचे अब भी उसके कुछ हुरूफ़ ज़ाहिर हैं। इस तरह मस्जिदे नबवी के गुंबदों के अन्दरूनी हिस्से में क़सीद-ए-बुर्दा शरीफ के जिन अशआर में तवस्सुल और इस्तिग़ासा के मज़ामीन थे, उन सबको मिटा दिया गया है। बाकी अशआर बाकी गुंबद पर उस वक्त तक बाकी थे। मैंने जो कुछ देखा है वह जुलाई 1959 ईसवी का वाक़िआ है। इसके बाद वहाँ क्या तब्दीली हुई? उसका हाल नए हुज्जाजे किराम से पूछना चाहिए। (सीरते मुस्तफ़ा, पेज 534 हिदी)

नोट : ऊपर की आयते मुबारका के अलावा बहुत सी अहादीस और अक़्वाले बुज़ुर्गाने दीन भी रोज़ा-ए- मुनव्वरा की ज़ियारत के फज़ाइल में वारिद हुई हैं जिनका अल्लामा समहूदी ने अपनी किताब ’वफ़ाउल वफ़ा’ और दूसरे मुस्तनद सलफ़ेसालिहीन उलमा-ए-दीन ने अपनी-अपनी किताबों में नक़ल फरमाया है। इंशाअल्लाह मुसलसल क़ुरआन और अहादीस की वो इबारते भी इस पोस्ट में ऐड (इजाफ़ा ) करता रहूंगा। आप से गुज़ारिस है पोस्ट को सिर्फ एक बार न पढ़े बल्कि मालूमात में इज़ाफ़ा के लिए बार बार पोस्ट में नई इबारत चेक करता रहे.

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Sadqa E Jariya

मरने के बाद 3 चीज़ों का सवाब
हदीस :- हज़रत अबू हुरैरा रदि़यल्लाहु तआ़ला अन्हु ने बयान किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि इन्सान जब मर जाता है तो उसके अमल का सिलसिला मुन्कतअ हो (टूट) जाता है। मगर तीन कामों का सवाबों का सिलसिला मरने के बाद भी जारी रहता है।
1. उसके सदकाऐ जारिया का सवाब।
2 उसके इल्म का सवाब कि लोगों को उससे नफा पहुँचता रहे।

3. नेक औलाद कि उसके लिए दुआ करती रहे।

तशरीह: सदका जारिया से मुराद उसकी वक्फ करदा चीज़े हैं मसलन मस्जिद व मदरसा, खानकाह, मुसाफिर खानों की इमारतें कुओं वगैरह की तामीरात या दीनी कुतुबखानों की इमारात, या दीनीं किताबों का वक्फ कर देना कि उल्माऐ किराम व तलबा उससे इल्मी फवाइद उठाते रहें या अवाम के बीच किताबे तक़सीम करना या ऑनलाइन तरीका जैसे दीनी ग्रुप, चैनल, तंजीम या वेबसाइट क़ायम करना। इल्म फैलाने से मुराद या तो शागिर्दों को पढ़ा कर तैयार कर देना या क़ौम की इस्लाह कर लिए कोई दीनी किताब तस्नीफ कर देना कि जिससे लोग दीनी फायदा हासिल करते रहें।
नेक औलाद से मुराद वह कि माँ बाप के मरने के बाद फातिहा व ईसाले सवाब करते रहें। कि मरने वाला मर गया और मरने के बाद उसके तमाम आमाले सालिहा का सिलसिला ख़त्म हो जाता है कि वह न अब नमाज़ पढ़ता है न रोजा रखता है। न सदका देता है न कोई दूसरा सवाब का काम करता है । लेकिन जिन्दगी में उसने कोई चीज़ वक्फ करदी है या कोई इल्म छोड़ कर मरा है। या नेक औलाद छोड़ कर वफात पा गया है तो वह अगरचे खुद कोई अमल नहीं कर रहा है मगर उसकी कब्र में इन चीजों का सवाब बराबर पहुँचता रहेगा।
इसलिए ज़रूरत है कि अहले दौलत मुसलमान अपनी ताकत भर जरुर कोई न कोई सदकाए जारिया करके दुनिया से सफर करें। इस ज़माने में खास तौर से मदरसों की तामीर और मज़हबी किताबों का कुतुब ख़ाना कायम करके उसको वक़्फ़ कर देना या इल्म फैलाने की नियत से किताबे तक़सीम करवाना बेहतरीन सदकाए जारिया है।
मुसलमानों को चाहिये कि अपनी औलाद को इल्मे दीन पढ़ायें ताकि इल्मे दीन सीखकर उनकी औलाद सालेह बने। और वह अपने माँ बाप के लिए ईसाले सवाब व फातिहा व दुआए मग़फ़िरत करके अपने वालिदैन की कब्रों में सवाब का जखीरा और खजाना भेजते रहें। मगर निहायत अफ़सोस रन्ज व कल्क होता है कि मालदार मुसलमान शादी ब्याह और नामवरी की फुजूल रस्मों में अपनी दौलत को खूब दिल खोलकर खर्च करते हैं मगर सवाबे आखिरत के लिए न कोई सदकाए जारिया करते हैं न दीनी कामों में अपनी दौलत लगाकर सवाबे ओखिरत की दौलत और दीन व दुनिया की बरकत हासिल करते हैं। (जवाहिरुल हदीस, अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी, पेज 26)

वाजेह रहे कि अपनी औलाद को इल्मे दीन पढ़ाना इसका अजरो सवाब बहुत बड़ा है एक हदीस में आया है कि जो शख़्स कुरआने मजीद का इल्म हासिल करके उसपर अमल करे तो कयामत के दिन उसके माँ बाप को ऐसा ताज पहनाया जायेगा जिसकी रौशनी सूरज से भी ज़्यादा अच्छी होगी। इससे अन्दाजा करलो कि खुद इल्मे कुरआन मजीद समझ बुझ कर पढ़ने वाले को जो कुरआन पर अमल करेगा अल्लाह तआला उसको कितने बड़े बडे अज़ीम अजरो सवाब से सरफाज़ फ़रमायेगा।

इस लिए दुनियादार मालदारों से तो इसकी कोई उम्मीद नहीं है मगर गरीबों को चाहिये कि वह अपने बच्चों को कॉलेज व यूनिवर्सिटी की तालीम नहीं दिला सकते तो अपने बच्चों को मदारिसे इस्लामिया या किसी बुज़ुर्ग की सोहबत में रखकर उन्हें इल्मे दीन जरुर पढ़ायें। और अजरो सवाब से मालामाल हों।
वल्लाहो तआला अअलम । (जवाहिरुल हदीस,अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी)

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Isar

ईसार
रज़ाए इलाही के पेशे नज़र दूसरों की ज़रूरत को अपनी जाती हाजत से तरजीह देना यानी खुद नही खाकर दुसरे जरूरत मंद को खिलाना, ख़ुद नही पहनकर दूसरे (दीनदार) जरूरतमन्द को पहनाना, अपना जान देकर किसी दूसरे मोमिन का जान बचाना ईसार कहलाता है। यह एक ऐसा जज़्बा है जिसका तअल्लुक दिल और नियत से है क्योंकि जब कोई अपनी ज़रूरत पसे डाल कर दूसरे की ज़रूरत को पूरा करता है तो उस वक़्त अल्लाह को बहुत रहम आता है और उस से पूरी तरह राज़ी होता है और उसका वह फेअल बारगाहे रब्बुल इज़्ज़त में बड़ा मकबूल होता है इसलिए इस्लाम में इस की बे पनाह फ़ज़ीलत है। हक़ीक़त में ईसार का माना नफ़्स और शैतान से मुक़म्मल मुखलाफ़त करना है और बातिनी जिहाद भी है।

ईसार के 2 अकसाम
1. माली ईसार, 2. बदनी ईसार

1. ईसार के मुतअल्लिक इरशादे बारी तआला है कि : (तर्जमा) और उस माल में उनका हक है, जो उन से पहले से मदीने में रहते थे।
और इस्लाम में दाखिल हो चुके हैं, जो उन की तरफ़ हिज़रत कर के आता है उस से मोहब्बत करने लगते हैं। और मुहाजिरीन को जो कुछ दिया जाये यह अपने दिल में उस की ख़्वाहिश नहीं पाते और अपने ऊपर तंगी ही क्यों न हो। उन्हें अपने से मुकद्दम रखते हैं। और जो शख़्स अपने नफ़्स के बुख्ल से महफूज़ रहे। तो ऐसे ही लोग फ़लाह पायेंगे।

इस आयात में अल्लाह तआला ने अंसार की तारीफ की है कि उन्होंने हिज़रत के मौका पर उन्हें अपने घर दिए, बाग़ दिए, खेत दिए, बीवी दिये अपने कारोबार में शामिल किया और खुद हर तरफ की तकालीफ़ बरदाश्त की मगर आने वालों को आराम पहुँचाया फिर जब बनी नुजैर की ज़मीन मुसलमान के हाथ आई तो नबी अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दो अंसारियों के सिवा बाकी सारी ज़मीन मुहाजिरीन को दे दी तो अंसार ने बसद ऐहतिराम उस फैसला को तस्लीम किया। अल्लाह त’आला को जब उन की यह आदत पसन्द आई तो मुदर्जा बाला अल्फाज़ से उनकी हौसला अफजाई की।

इस आयात के शाने नुजूल के बारे में एक रिवायत इस तरह है कि एक मिसाल तारीख़ इंसानियत पेश करने से कासिर है। अपनी भूक को मार रहा है। अपनी ख़्वाहिशात को कुचल रहा है कि एक मोमिन भाई शिक्म सैर हो जाये। भूक से बिलकते बच्चे अब सो चुके हैं माँ की मामता भी आड़े न आई कि मोमेनन न किरदार के इज़हार का मौका है। वह मोमिन ही क्या जो अपने भाई के लिए ईसार न कर सके अपनी ख़्वाहिशात अपनी तलब और अपने तबई व फितरी तक़ाज़ों पर अपने भाई की ख़्वाहिशात और तलब को तरजीह न दे सके। अंसारी की भूक माँ की मामता और ख़ानदान के आराम की ख़्वाहिश सब ठिठक कर खड़े हैं बल्कि तकाज़ाए ईमान आड़े आ गया है। मेहमान शिकम सेर हो गया। और दस्तख़्वान उठा लिया गया तो चिराग़ की लो भी ठीक हो गई। और मकान का हुजरा भी रौशन हो गया। मगर हुजरे से ज़्यादा अंसारी का सीना और उसकी नेक बख़्त बीवी का दिल नूरे ईमान से मुनव्वर था। सुबह हुई। अंसारी अपने मेहमान के साथ नमाज़ में हाज़िर हुआ। मुस्लिम शरीफ में है कि नमाज़ के बाद सरवरे कौनैन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अंसारी की तरफ मुतवज्जोह हुये और फ्रमाया रात तुम ने जिस हुस्ने सुलूक का मज़ाहिरा किया है उस से अल्लाह तआला बहुत खुश हुआ है।” (सुन्नी फजाईले आमाल)

2. ईसार अहले तक़वा के औसाफ़ का ख़ास्सा है क्योंकि मुत्तकियों के लिए ज़रूरी है कि वह अख़लास और जज़्बा ईसार के तेहत अल्लाह के दीन को सर बुलन्द करने के लिए उस की राह में ख़र्च करें। ताकि अल्लाह हर तरह से राज़ी हो।
लिहाज़ा इरशादे बारी तआला है कि।
(तर्जमा) – जहाँ तक तुम से हो सके अल्लाह से डरते रहो। और सुनो और तामील करो। और खर्च करते रहो कि यह तुम्हारे अपने ही हक में बेहतर है। और जो शख्स अपने बुख्ल तबई से बचा रहे तो ऐसे ही लोग फलाह पाने वाले हैं। (परा 8 अत्तकाबुन 16)

ईस आयत से भी जज़बाए ईसार का मफहूम वाज़ेह होता है। कि अल्लाह तआला की राह में ईसार व वासिल इंसान के लिए ही बेहतर होता इसलिए अल्लाह के ख़ास बन्दे बनने के लिए जज़बाए ईसार पर कारबन्द रहना चाहिए। क्यों कि ईसार में दीन व दुनिया की फ्लाह मुज़मर है।

3. जज़्बा ईसार का तकाज़ा है कि अल्लाह की राह में दूसरों की तकलीफ दूर करने के लिए कीमती से कीमती चीज़ देने से दरेज़ न किया जाये और दुनिया की अशया की मोहब्बत रज़ाए इलाही में रुकावट नहीं बननी चाहिए।
इरशादे बारी तआला है।
(तर्जमा) आप फ़माइये कि अगर तुम्हारे बाप और बेटे और भाई और बीबियाँ। और कबीले वाले और वह माल जो तुम ने कमाये। और वह तिजारत जिस के मन्दा पड़ जाने से डरते हो। और वह मकानात जिन को तुम पसन्द करते हो। तुम्हें अल्लाह और उस की राह में जिहाद से ज़्यादा अज़ीज़ हैं। तो जरा सब्र करो। यहाँ तक कि अल्लाह अपना हुक्म तुम पर भेजे और अल्लाह फासिकों हिदायत नहीं करता । (पारा 10 अत्तौबा 24)

इस आयत में इस तरह ईसार की तरगीब दी गई है कि अल्लाह की ख़ातिर माँ बाप औलाद और अज़ीज़ व अकारिबकी मोहब्बत को भी कुरबान करना पड़े तो कर दो। घर बार कारोबार छोड़ना पड़े तो भी छोड़ दो। क्योंकि अल्लाह की रज़ा के लिए हर उस चीज़ को तर्क करना ज़रूरी है जो रज़ाए इलाही में रुकावट बने। एक और मकाम पर ईसार के मुतअल्लिक अल्लाह तआला ने बड़े जामेअ अलफाज़ में यूँ इरशाद फ़रमाया है।

(तर्जमा) जब तक तुम अपनी प्यारी चीज़ों में से ख़र्च न करो भलाई हरगिज़ हासिल नहीं कर सकते। (पारा 45 आल इम्रान92)

इस आयत में जज़्बा ईसार की तारीफ़ बड़े उम्दा तरीके से बयान की गई है कि इंसान उस वक़्त तक इस ख़ास नेकी यानी रास्ता को हासिल नहीं कर सकता जिस से अल्लाह की ख़ास रहमत रज़ाए इलाही के लिए पसन्दीदा माल व मताअ जिस्म व जान और जाह व मनसब वगैरा के ईसार से दरेग नहीं करना चाहिए। (सुन्नी फजाईले आमाल)

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