November 2023

हुक़ूक़ूल इबाद के अदायगी का हुक़्म

हुकूकुल इबाद (बन्दों के हक़ )

हर मुसलमान पर यह लाज़िम है कि जब वह दूसरे मुसलमान से मिले तो उसे सलाम कहे, जब वह उसे दावत दे तो उसकी दावत कबूल करे, जब उसे छींक आये तो उसका जवाब दे, जब वह बीमार हो तो उसकी अयादत को जाए, जब वह मर जाये तो उसके जनाज़ा में हाज़िर हो, जब वह कसम दिलाये तो उसकी कसम को पूरा करे, जब वह नसीहत का ख़्वास्तगार हो तो उसे नसीहत करे , उसकी गैर मौजूदगी में उस की पीठ की हिफाज़त करे यानी उसकी गीबत, चुगली न करे और उसके लिए वही कुछ पसन्द करे जो अपने लिए पसन्द करता है और हर वह चीज़ जिसे वह अपने लिए नापसन्द समझता है उसके लिए भी नापसंद समझे यह तमाम अहकाम हदीसों में वारिद हुए हैं चुनान्चे हज़रते अनस रज़ियल्लाहु अन्हु हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रिवायत करते हैं, आप ने फ़रमाया तुझ पर मुसलमानों के चार हक हैं, उनके नेक की इमदाद कर बुरे के लिए तलबे मगफिरत कर उनमें से जाने वाले (मरने वाले) के लिए दुआ मांग और उनमें से तौबा करने वाले के साथ मुहब्बत रख। (मुक़ाशफूतुल क़ुलूब, बाब 70, पेज 416) 

हुक़ूक़ूल इबाद की अदायगी

जानना चाहिए कि हुक़ूक़ूल इबाद यानी बंदों का हक़ का अदायगी हुक़्कुल्लाह से भी ज्यादा मुश्किल है क्योंकि अल्लाह के बंदों का मुख़्तलिफ़ अकसाम और मुख़्तलिफ़ मरातिब है इस वजह से हम पर भी मुख़्तलिफ़ हुक़ूक अदा करने का हुक़्म है। मसलन बुलंद मरातिब वाले बंदों का हुक़ूक अवाम से अलग है जैसे रसूल, अम्बिया, असहाब, अहले बैत, अईमा, औलिया ये तमाम अल्लाह के ख़्वासम खास व ख़्वास बंदे है इसलिए इन बंदों के हुक़ूक भी हम पर अवाम से बढ़कर है। जैसे हमारे नबी से मुहब्बत करने का हुक़्म है लेकिन सबसे ज्यादा और बढ़कर, उसी तरह बाकी हुक़ूक का अदायगी भी ज्यादा और बढ़कर है। यानी जो जैसा मरतबे पर है उसके साथ हुक़ूक का ममाल वैसा है। इस महफ़ूम को इस हदीस से जाना और माना जा सकता है।

हज़रत अबू दाऊद ने हज़रते आइशा रदियल्लाहु तआला अन्हा से रिवायत की कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि लोगों को उनके मरतबे में उतारो यानी हर शख़्स के साथ उस तरह पेश आओ जो उसके मरतबे के मुनासिब हो। सबके साथ एक सा बरताव न हो मगर उसमें ये लिहाज़ ज़रूर करना होगा कि दूसरे की तहकीर व तजलील न हो । (बहारे शरीअत, हिस्सा 16)

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Huqooqul Ibad

हुकूकुल इबाद (बन्दों के हक़ )

हुक़ूकुल इबाद क्या है?
हुकूकुल इबाद का मतलब बन्दों का हक है। हर इंसान पर दूसरों के कुछ फ़राइज़ और ज़िम्मेदारियाँ आइद होती हैं जिन्हें हुकूकुलएबाद कहा जाता है उन हुकूक का अदा करना हर शख़्स के लिए जरूरी है क्योंकि बा काइदगी से हुकूक की अदायगी में किसी की हक़ तल्फी नहीं होती। हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद अदा करना ही अल्लाह की इबादत है जैसा कि क़ुरआन में है इंसान और जिन्न इबदत के लिए पैदा किये गए है इसका मतलब ये भी है हुआ कि इंसान और जिन्न हुक़ूकुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद के लिए पैदा किए गये है। मुसलमान को चाहिए की अल्लाह की मुकम्मल इबादत करने के लिए हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूकुल इबाद की मुकम्मल अदायगी करे।

ज़िन्दगी इबादत के लिए है
अल्लाह फरमाता है : मैंने जिन्न और इंसान को इतने ही के लिये बनाए कि मेरी बन्दगी (इबादत) करें । (कंजुल ईमान, सुरह जरियात, आयत न. 56 )

हुक़ूक अदा करना ही इबादत है
हुक़ूक अदा करने का नाम ही इबादत है जो दो किस्म के है- 1. हुक़ूक़ुल्लाह और 2. हुक़ूक़ूलइबाद
1. हुक़ूक़ुल्लाह (अल्लाह का हक़) : अल्लाह का दिया दुआ हर वो चीज जो बंदों के पास है जैसे इल्म, माल, सेहत, ताकत, जिस्म और जान को अल्लाह के लिए खर्च करना हुक़ूक़ुल्लाह कहलाता है।

2. हुक़ूकुल इबाद (बंदों का हक़) : अल्लाह की रज़ा के लिए अल्लाह के मख़लूको और बंदों का मदद, ख़िदमत और उनसे मुहब्बत करने के लिए जो जो मामलात बंदों से करने का हुक़्म हुआ है उसे पूरा करना हुक़ूकुल इबाद कहलाता यानी बंदों का हक़ अदा करना है।

हुक़ूकुल इबाद की अहमियत
आम तौर पर लोग बन्दों के हुकूक अदा करने की कोई अहमियत नहीं समझते। हालांकि बन्दों के हुकूक का मुआमला बहुत ही अहम, निहायत ही संगीन और बेहद खौफनाक है बल्कि एक हैसियत से देखा जाये तो हुकूकुल्लाह (अल्लाह के हुकूक) से ज्यादा हुकूकुलइबाद (बन्दों के हुकूक) सख्त है। अल्लाह तआला तो अरहमर राहिमीन है। वह अपने फज्ल व करम से अपने बन्दों पर रहम फरमा कर अपने हुकूक माफ फरमा देगा। मगर बन्दों के हुकूक अल्लाह तआला उस वक्त तक नहीं माफ फरमाएगा जब तक बन्दे अपने हुकूक को न माफ करदें। लिहाजा बन्दों के हुकूक को अदा करना या माफ करा लेना बेहद जरूरी है। वरना कियामत में बड़ी मुश्किलों का सामना होगा।
हदीस शरीफ में है कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक मर्तबा सहाबए किराम से फरमाया कि क्या तुम लोग जानते हो कि मुफलिस कौन शख्स है? तो सहाबए किराम ने अर्ज किया कि जिस शख्स के पास दिरहम और दूसरे माल व सामान न हो वही मुफलिस है तो हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया कि मेरी उम्मत में आला दर्जे का मुफलिस वह शख्स है कि वह कियामत के दिन नमाज़ रोज़ा, और ज़कात को लेकर मैदाने हश्र में आएगा। मगर उसका यह हाल होगा कि उसने दुनिया में किसी को गाली दी होगी। किसी पर तोहमत लगाई होगी। किसी का माल खा लिया होगा। किसी का खून बहाया होगा। किसी को मारा होगा, तो यह सब हुकूक वाले अपने अपने हुकूक को तलब करेंगे तो अल्लाह तआला उसकी नेकियों में से तमाम हुकूक वालों को उनके हुकूक के बराबर नेकियाँ दिला देगा। अगर उसकी नेकियों से तमाम हुकूक वालों के हुकूक अदा न हो सके बल्कि नेकियाँ ख़त्म हो गई और हुकूक बाकी रह गए तो अल्लाह तआला हुक्म देगा कि तमाम हुकूक वालों के गुनाह उसके सर पर लादो । चुनान्चे सब हक वालों के गुनाहों को यह सर पर उठाएगा। फिर जहन्नम में डाल दिया जाएगा। तो यह शख़्स सबसे बड़ा मुफलिस होगा। (मिश्कात जि. 2 स.435)
इस लिए इन्तेहाई ज़रूरी है कि या तो हुकूक को अदा करो या माफ करा लो। वरना कियामत के दिन हुकूक वाले तुम्हारी सब नेकियों को छीन लेंगे और उनके गुनाहों का बोझ तुम अपने सर पर लेकर जहन्नम में जाओगे ख़ुदा के लिए सोचो कि तुम्हारी बेकसी व बेबसी और मुफलिसी का कियामत में क्या हाल होगा । (जन्नती जेवर, पेज 61, हिंदी)

हुक़ूक अदा करने के दुनियावी फ़ाइदे
इबादतों से आखिरत के फाइदे तो हर शख़्स को मालूम हैं कि अल्लाह तआला अपने इबादत गुज़ार बन्दों को आखिरत में जन्नत की बेशुमार नेअमतें अता फरमाएगा। लेकिन इससे गाफिल न रहो कि इबादत से आखिरत के इलावा इबादत की बरकत से बहुत से दुनियावी फाइदे भी हासिल होते हैं मसलन – (1) रोजी बढ़ना ( 2 ) माल सामन, औलाद हर चीज में बरकत होना (3) बहुत सी दुनियावी तकलीफों और परेशानियों का खत्म हो जाना (4) बहुत सी बलाओं का टल जाना (5) सब के दिलों में उसकी मुहब्बत का पैदा हो जाना (6) नूरे ईमान की वजह से चेहरे का बा-रौनक हो जाना (7) उम्र का बढ़ जाना (8) पैदावार में खैर व बरकत हो जाना (9) बारिश होना (10) हर जगह इज्जत व आबरू मिलना (11) फाका से बचा रहना (12) दिन व दिन नेअमतों में तरक्की होना (13) बहुत सी बीमारियों से शिफा पा जाना (14) आइन्दा आने वाली नसलों को फाइदा पहुंचना (15) शादमानी व मसर्रत और इत्मीनाने कल्ब की जिन्दगी नसीब होना। इनके इलावा और भी बहुत सी दुनियावी फाइदे हैं। जो इबादत की बरकत से हासिल होते हैं। (जन्नती जेवर, पेज 87)

हुक़ूक अदा न करना ही गुनाह है।
हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़्कूकुल इबाद के अदायगी का जो हुक़्म क़ुरआन व अहादीस मैं है इसका इंकार करना कुफ़्र है और तर्क करना फिस्क फुज़ूर (सगिरा कबीर गुनाह) है।

गुनाहों की किस्मे और तौबा का तरीका
फ़क़ीह रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है गुनाहो की 2 किस्मे है
1. इस गुनाह का मामला अल्लाह और बंदों के दर्मियान है यानी हुकुकूल अल्लाह जैसे अल्लाह का हुक्म का नाफरमानी जैसे फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत (नमाज, रोजा, हज, जकात, दरूद, नेकी का हुक्म गुनाहो से रोकना वगैरह जिसे अल्लाह हुक़्म दिया हो उसे अदा न किया लेकिन अल्लाह से रो रो के माफी मांगे और सच्ची तौबा करे तो उसे अल्लाह अपनी रहमत से खुद (डायरेक्ट) माफ कर सकता है

2. इसका मामला बंदे और बंदे के दरमियान है यानी हूककुल इबाद यानी एक बन्दा किसी दूसरे मोमिन बंदे का दिल दुखाया हो, अमानत में खयानत किया हो, हसद, गीब्बत या चुगली, लड़ाई झगड़ा किया हो यानी बंदों का हुक़ूक अदा न किया वगैरह इस गुनाह को अल्लाह तभी माफ करेगा जब बन्दा एक दूसरे से माफी न मांग ले या माफ न कर दे। जैसे इब्लीस को माफी नही मिला क्योंकि वो आदम अलैहिसालाम से हसद रखता था।

हुक़ूक अदा न करने की वजह क्या है
हदीस शरीफ में है दुनिया की मुहब्बत (दुनियादारी) ही तमाम गुनाहों की जड़ है।
वाज़ेह हुआ कि दुनिया ही वो चीज है जो मुसलमान को अल्लाह और उसके रसूल के फ़रमान के मुताबिक अमल पैरा नहीं होने देती है यानी हुक़ूक अदा करने नहीं देती है। नफ़्स और शैतान इसी दुनिया के जरिये मुसलमान को गुमराह करने की ताक में लगे रहते है और कामयाब भी होते है।

फ़रमांबरदारी तीन नीयतों से की जाती है
याद रहे कि इत्तिबाअ व फ़रमांबरदारी तीन तरह यानी पहला मख़लूक का ख़ौफ़, दूसरा दुनियावी लालच, और तीसरा ख़ौफ़े खुदा व मुहब्बते मुस्तफ़ाﷺ की वजह से की जाती है। इसका मतलब ये है कि जो इताअत किसी शख्स या किसी हुकूमत या किसी माली व जानी नुक्सान के डर से की जाती है तो वह इताअत नहीं होती बल्कि मुनाफ़िकत होती है। ऐसे ही वह इताअत जो किसी माली फायदे या दुनियावी बेहतरी के लालच में की जाती है वह इताअत भी इताअत की अस्ल मक़सद से खाली क्योंकि इताअत की अस्ल मक़सद अल्लाह की रज़ा है जो हुक़ूक़ूल इबाद और हुक़ूक़ुल्लाह कि अदायगी है इसके लिए ईमान का होना शर्त है और ईमान के लिए मुहब्बत का होना शर्त है और मुहब्बत से जो काम किया जाता है अल्लाह उसे कुबूल करता है। मुहब्बत की इताअत में सिर्फ खुदा की रज़ा पेशे नज़र होती है। इसलिये इसका बहुत बुलन्द दर्जा है इसलिये इत्तिबाए सुन्नत में हमेशा मुहब्बत को सामने रखना चाहिये। (अदाबे सुन्नत, पेज 8)

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Momino Ki Madad

मोमिनों को मदद करने का हुक़्म

फ़रमाने इलाही है- (तर्जुमा) नेकी और परहेज़गारी पर एक दूसरे की मदद करो और गुनाह और ज़ियादती पर आपस में मदद न दो और अल्लाह से डरते रहो, बेशक अल्लाह का अज़ाब सख़्त है। (कंजुल ईमान, सूरह माएदा, आयत नं. 2)

मोमिनों पर मोमिनों का 4 हुक़ूक
हज़रते मालिक बिन अनस रज़ियल्लाहु से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया तुम पर मोमिनों के चार हुकूक हैं- 1 अपने ऐहसान करने वालों की इमदाद करो, 2 गुनहगारों के लिए मग़फिरत तलब करो, 3 मरीज़ की अयादत करो और 4 तौबा करने वाले को दोस्त रखो।(मुकाशफतुल क़ुलूब, बाब 18, पेज 130)

यतीमों और मिस्कीनों का मदद करो

एक शख्स ने दरबारे रिसालत में येह शिकायत की, कि मेरा दिल सख़्त है तो हुजूर ने फ़रमाया कि तुम यतीम के सर पर हाथ फैरो और मिस्कीन को खाना खिलाओ। (मिश्क़त ज़िल्द 2 परज 424)

फुकरा से भलाई करो

फ़रमाने नबवी है कि फुकरा को पहचानो और उन से भलाई करो, उन के पास दौलत है। पूछा गया कि हुज़ूर कौन सी दौलत है ? आप ने फरमाया : जब कियामत का दिन होगा, अल्लाह तआला उन से फ़रमाएगा जिस ने तुम्हें खिलाया पिलाया हो या कपड़ा पहनाया हो उस का हाथ पकड़ कर उसे जन्नत में ले जाओ । (मुकाशफुतुल क़ुलूब, बाब 31)

जिहाद के बराबर सवाब
हदीस  हुजूर ﷺ ने फरमाया कि जो शख्स किसी भाई की इमदाद और फाइदे के लिए कदम उठाता है, उसे ख़ुदा की राह में जिहाद करने वालों जैसा सवाब मिलता है।

उनके लिए नूर के मेम्बर
हदीस  – फ़रमाने नबवी ﷺ है कि अल्लाह तआला ने ऐसी मख़्लूक को पैदा फ़रमाया है जिन का काम लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना है और अल्लाह तआला ने अपनी जात की कसम खाई है कि उन्हें अज़ाब नहीं करेगा, जब कियामत का दिन होगा उनके लिए नूर के मेम्बर रखे जायेंगे, वह अल्लाह तआला से गुफ़्तगू कर रहे होंगे हालांकि लोग अभी हिसाब में होंगे।

गुनाहों का कफ़्फ़ारा
हदीस – फ़रमाने नबवी ﷺ है कि जो किसी मुसलमान भाई की हाजत-रवाई के लिए कोशिश करता है चाहे उसकी हाजत पूरी हो या न हो, अल्लाह तआला कोशिश करने वाले के अगले पिछले सब गुनाहों को बख़्श देता है और उसके लिए दो छुटकारे (निज़ात) लिख दिये जाते हैं। जहन्नम से रिहाई और मुनाफ़कत से छुटकारा ।

उसकी शफाअत
हदीस – फ़रमाने नबवी ﷺ है कि जो शख्स किसी मुसलमान भाई की हाजतरवाई करता है, मैं उसके मीज़ान के करीब खड़ा हूंगा, अगर उसकी नेकियां ज़्यादा हुई तो सहीह वरना मैं उसकी शफाअत करूंगा, यह रिवायत हिलया में अबू नईम ने नक़्ल की है।

गुनाहों का कफ़्फ़ारा
हदीस – हज़रते अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है हुजूर ﷺ ने फ़रमाया जो शख्स किसी मुसलमान भाई की हाजत रवाई के लिए चलता है अल्लाह तआला हर कदम के बदले उसके आमाल नामे में सत्तर नेकियां लिख देता है और सत्तर गुनाह माफ कर दिये जाते हैं पस अगर वह हाजत उसके हाथों पूरी हो जाये तो यह गुनाहों से ऐसे पाक हो जाता है जैसे माँ के पेट से आया था और अगर वह उसी दर्मियान मर जाये तो बिला हिसाब जन्नत में जाएगा।

जहन्नम से दूरी
हदीस – हजरते इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि हुजूर ﷺ ने फ़रमाया जो शख्स अपने मुसलमान भाई की हाजत रवाई (जरूरत पूरा करने ) के लिए उसके साथ जाता है और उसकी हाजत पूरी कर देता है तो अल्लाह तआला उसके और जहन्नम के बीच सात खन्दकें बना देता है और दो खन्दकों का दर्मियानी फासिला जमीन व आसमान के दर्मियानी फासिले के बराबर होता है।

मख़सूस इनआमात का हक़दार
हदीस – हज़रते इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह तआ़ला के कुछ ऐसे इनआमात हैं जो उन लोगों के लिए मख़सूस हैं जो लोगों की हाजत रवाई करते रहते हैं और जब वह यह तरीका छोड़ देते हैं तो अल्लाह तआला वह इनआमात दूसरों की तरफ मुन्तकिल कर देता है।

भलाई करने वाले आमान में
हदीस – हज़रते अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है हुजूर ﷺ ने फरमाया जानते हो कि शेर अपनी दहाड़ में क्या कहता है? सहाबा ने अर्ज किया कि अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं, आपने फ़रमाया वह कहता है कि ऐ अल्लाह! मुझे किसी भलाई करने वाले पर मुसल्लत न करना।

हदीस – भलाई करने वालो के लिए खुशखबरी
हुजू़र सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है, उस शख़्स के लिए खुशखबरी है जिस के हाथों भलाईयों का सदूर होता है और उस शख़्स के लिए हलाकत है जिस के हाथों बुराईयां फ़रोग़ (बढ़ावा) पाती हैं।

रहमतें इलाही का नुज़ूल

हदीस :- हज़रत अबू उमामा बाहिली रदियल्लाहु तआ़ला अन्हु से मरवी है वह कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि बेशक अल्लाह तआ़ला रहमत नाजि़ल फ़रमाता है कि और उसके फ़रिश्ते और आसमानों ज़मीनों वाले यहाँ तक कि चींटियाँ अपने बिल में और मछलियाँ सब दुआऐ रहमत करती हैं। उस के लिए जो लोगों को भलाई की तालीम देता है। (मिश्कात, जिल्द 1, सफा 34)

काबिले रश्क सिर्फ दो ही शख्स हैं

हदीस :- हजरत इब्ने मसऊद रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि काबिले रश्क सिर्फ दो ही शख्स हैं। एक तो वह जिसको अल्लाह तआला ने माल दिया और वह उसको अपने अहलो अयाल पर हक के तौर पर खर्च करता है और दूसरा वह आदमी जिसको अल्लाह तआला ने इल्मे दीन अता फरमाया तो वह उसके मुताबिक फैसला करता है और दूसरों को इल्मे दीन सिखाता है। (मिशकात, जिल्द, 1 सफा, 32)

अल्लाह व रसूल का मुहिब्ब या महबूब कौन ?
हदीस – रसूलुल्लाह ने फ़रमाया कि जिस शख्स को येह बात अच्छी लगती हो कि वोह अल्लाह और उस के रसूल का मुहिब्ब बन जाए या अल्लाह और उस के रसूल का महबूब बन जाए तो उस को चाहिये कि हमेशा सच्ची बात बोले और जब उस को किसी चीज़ का अमीन बना दिया जाए तो वोह उस अमानत को अदा करे और अपने तमाम पड़ोसियों के साथ अच्छा सुलूक करे । (मिश्क़त ज़िल्द 2)

मुसलमानों के उयूब छुपाओ
हदीस – रसूले अकरम ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख्स किसी मुसलमान के ऐब को देख ले और फिर इस की पर्दा पोशी करे तो उस को अल्लाह तआ़ला इतना बड़ा सवाब अता फरमाएगा जैसे कि ज़िन्दा दरगोर की बच्ची को कोई क़ब्र से निकाल कर उस की परवरिश और उसकी ज़िन्दगी का सामान कर दे। (मिश्क़त ज़िल्द 2 परज 424)

तब तक कामिल मोमिन न होगा
हज़रत अनस रदि़यल्लाहु तआ़ला अ़न्हु से रिवायत है कि तर्जु़मा :- हुजू़र नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम में से कोई (कामिल) मोमिन नहीं होगा। जब तक कि अपने (मोमिन) भाई के लिए वही चीज़ न पसन्द करे जो अपनी ज़ात के लिए पसन्द करता है।(बुखारी, जिल्द 1, सफा 6 किताबुल ईमान )

(शरह) मसलन हर शख़्स अपनी जात के लिए यह पसन्द करता है कि कोई मुझ को नुक़सान न पहुँचाए. कोई मेरी बे आबरुई न करे कोई मेरे साथ बदसुलूकी न करे। कोई मुझे धोका और फ़रेब न दे कोई मुझको और मेरे रिश्तादारों और मुहब्बत वालों को न सताए यूँ ही हर शख्स अपने लिए यह पसन्द करता है कि मुझे इज्ज़त आबरु, माल व दौलत और तन्दरुस्ती व सलामती मिले मेरी हर चीज़ अच्छी हो मेरी जि़न्दगी अच्छी गुजरे। मुझे | हर तरह का आराम व राहत मिले, वगै़रह वगै़रह । (अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी)

बेहतरीन घर और बदतरीन घर
हदीस – हुजूरे अकरम ने फ़रमाया कि मुसलमानों के घरों में सब से बेहतरीन घर वोह है जिस में कोई यतीम रहता हो और उस के साथ बेहतरीन सुलूक किया जाता हो और मुसलमानों के घरों में से बदतरीन घर वोह है कि उस में कोई यतीम हो और उस के साथ बुरा सुलूक किया जाता हो । (मिश्क़त ज़िल्द 2, पेज 423)

बूढ़ों की ताज़ीम करो
हदीस – रसूलुल्लाह ने फ़रमाया कि जो जवान आदमीकिसी बूढ़े की ताज़ीम उस के बुढ़ापे की बिना पर करेगा तो अल्लाह तआला उसके बुढ़ापे के वक्त कुछ ऐसे लोगों को तय्यार फ़रमा देगा जो बुढ़ापे में उसका एजाज़ व इकराम करेंगे। (मिश्क़त ज़िल्द 2 परज 423)

क़ौल 1- हज़ते अब्दुल्लाह बिन हसन बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुम कहते हैं कि मैं किसी ज़रूरत के लिए हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ियल्लाहु अन्हु के पास गया, उन्होंने मुझे कहा जब भी आप को कोई ज़रूरत पेश आये तो मेरी तरफ कोई कासिद भेज दें या ख़त लिख दें क्यों कि मुझे अल्लाह तआला से हया आती है कि आप मेरे दरवाजे पर तशरीफ लायें।

क़ौल 2 – हज़रते अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु का कौल है रब्बे जुलजलाल की कसम ! जो हर आवाज़ को सुनता है, कोई शख़्स ऐसा नहीं है जो अपने दिल में मुसर्रत को जगह देता है मगर अल्लाह तआला उस सुरूर से लुत्फ अता फ़रमाता है, फिर जब कोई मुसीबत नाज़िल होती है तो वह उस खुशी को इस तरह बहा लेजाती है जैसे पानी नशेब में बहता है यहां तक कि उसे अजनबी ऊँट की तरह हंका दिया जाता है, नीज़ आपने फ़रमाया कि ना-हन्जार लोगों से हाजत तलब करने से हाजत का पूरा न होना बेहतर है, आपने मजीद फरमाया, अपने भाई के पास बहुत ज़्यादा ज़रूरते लेकर न जाओ क्योंकि बछड़ा जब थनों को बहुत ज़्यादा चूसने लगता है तो उसकी माँ उसे सींग मारती है।

किसी शायर ने क्या खूब कहा है-

1. जब तक तेरे मकदूर में हो किसी एहसान करने में पशो पेश न कर और यह जिन्दगी गुज़रने वाली है।

2. और अल्लाह तआला की इस नवाज़िश को याद रख कि उसने तुझे लोगों का हाजत रवा बना दिया है मगर तू किसी के पास अपनी हाजत लेकर नहीं जाता।

एक और शायर कहता है-

1. जहां तक तुझसे मुमकिन हो लोगों की ज़रूरतें पूरी कर और उनका हाजत रवा भाई बन ।

2. बेशक किसी जवान का उम्दा दिन वही है जिस में वह लोगों की हाजत रवाई करता है

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Huqooq ki Tafsil

हुक़ूक़ की तफ्सील
बिरादराने मिल्लत हुक़ूक़ की दो किस्में हैं एक हुक़ूक़ुल्लाह दूसरे हुकुकुल इबाद फिर हुक़ूक़ुल्लाह की दो किस्में हैं। एक वह कि अगर उनके बारे में बन्दा से कुसूर वाकेअ हुआ, तो वह सिर्फ तौबा से माफ हो सकते हैं जैसे कि शहर में जुमा और ईदैन की नमाज छूट जाने के गुनाह, या शराब पीने और नाच वगैरा देखने के गुनाह और दूसरे वह जो सिर्फ तौबा से नहीं माफ हो सकते जैसे नमाज न पढ़ने, रोजा न रखने, जकात व फित्रा न अदा करने और हज व कुर्बानी वगैरा न करने के गुनाह कि इनके माफ होने की सूरत सिर्फ तौबा नहीं है बल्कि छूटी हुई नमाजों और रोजों की कजा करे, जितने सालों की जकात और फित्रा न दिया हो अब अदा करे, साहिबे निसाब होकर जितने साल कुर्बानी न की हो हर साल के बदले एक बकरे की कीमत सदका करें, खुद हज न कर सकता हो तो हज्जे बदल कराए माल न रह गया हो तो हज्जे बदल कराने की वसिय्यत करे और तौबा करे तो माफ हो सकते हैं। यानी तौबा के साथ उन की अदाइगी भी जरूरी है कि यह चीजें सिर्फ तौबा से नहीं माफ हो सकती।

और रहे हुक़ूक़ुल इबाद यानी बन्दों के हुक़ूक़ तो वह हुक़ूक़ुल्लाह की दूसरी किस्म से भी अहम हैं इस लिये कि खुदाए तआला अरहमर्राहिमीन है अगर वह चाहे तो अपने हर किस्म के हुक़ूक़ माफ कर दे लेकिन वह किसी बन्दे का हक हरगिज़ नहीं माफ करेगा जब तक कि वह बन्दा न माफ कर दे कि जिस की हक़ तल्फी की गई है। इसी लिये सरकारे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने आखिरी वसिय्यत में खास तौर पर इस की अहमियत को जाहिर फरमाया और जमानए सेहत में भी हमेशा इस की ताकीद फरमाते रहे मिश्कात शरीफ की हदीस है हज़रत अबू हुरैरा रदी अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ ने सहाबए किराम से दरयाफ्त फरमायाः (तर्जमा) क्या तुम लोग जानते हों कि मुफ्लिस और कंगाल कौन है? सहाबा ने अर्ज किया या रसूल ﷺ हम में मुफ्लिस यह शख्स है कि जिस के पास न पैसे ! हों और न सामान । हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि मेरी उम्मत में दरअसल मुफ्लिस वह शख्स है कि जो कियामत के दिन नमाज रोजा और जकात वगैरा लेकर इस हाल में आएगा कि उस ने किसी को गाली दी होगी, किसी पर तोहमत लगाई होगी, किसी का माल खा लिया होगा, किसी का खून बहाया होगा और किसी को मारा होगा या किसी का तौहीन किया हो तो अब उन लोगों को राजी करने के लिये उस शख्स की नेकियां उन मजलूमों के दरमियान तक्सीम की जाएंगी। अगर उस की नेकियां खत्म हो जाने के बाद भी लोगों के हक उस पर बाकी रह जाएंगे तो अब हकदारों के गुनाह लाद दिये जायेंगे यहां तक कि उसे जहन्नम में फेंक दिया जाएगा । यह आखि़रत में अल्लाह का अदल व इंसाफ़ है। (खुतबाते मुहर्रम, पेज 42 )

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