ईमान बिरर्रसुल से मुराद यह है कि हुजूरे अकदस की नुबुव्वत, रिसालत, जात व सिफात पर ईमान लाना यानी मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम को सच्चा जानना और हुजूर की हक्कानियत (जात व सिफात) को सिदक दिल से मानना और जो कुछ आप अल्लाह तआला की तरफ से लाए हैं सच्चे दिल से उसको सच्चा मानना हर हर उम्मती पर फर्ज़ ऐन है हर मोमिन का इस पर ईमान है कि बगैर रसूल ﷺ पर ईमान लाए हुए हरगिज़ हरगिज़ कोई मुसलमान नहीं हो सकता। कुरआन में खुदावंदे आलम जल्ला जलालुह का फरमान है किः-
अल्लाह फ़रमाता है : ऐ लोगो तुम्हारे पास ये रसूल ﷺ हक़ के साथ तुम्हारे रब की तरफ़ से तशरीफ़ लाए तो ईमान लाओ अपने भले को। (सूरह निसा, आयत न. 170)
तर्जमा : ईमान लाओ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ बे पढ़े ग़ैब बताने वाले पर (सूरह अराफ, आयत न 158)
तर्जमा : जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ पर ईमान न लाया तो यकीनन हमने काफिरों के लिए भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है। इस आयत ने बिल्कुल खुल्लम-खुल्ला और सफाई के साथ फैसला कर दिया कि जो लोग रसूल ﷺ की रिसालत पर ईमान नहीं लाएंगे वह अगरचे खुदा की तौहीद का उम्र भर डंका बजाते रहें मगर वह काफिर और जहन्नमी ही रहेंगे। इसलिए इस्लाम का बुनियादी कलिमा यानी कलिमा-ए-तय्यबाः ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह है। यानी मुसलमान होने के लिए ख़ुदा की तौहीद और रसूल ﷺ की रिसालत दोनो पर ईमान लाना जरूरी है।
कामिल ईमान की अलामत
हज़रत उमामा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि हुजूर ﷺ ने फरमाया कि जिस शख़्स ने अल्लाह तआला के लिये दिया और अल्लाह तआला के लिये रोका और जिसने अल्लाह ही के लिये मुहब्बत की अल्लाह ही के लिये दुश्मनी की तो उसका ईमान मुकम्मल हो गया। (अबू दाऊद-सुनन-6/555-ह-4681)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन हिशाम (रजिअल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि हज़रत उमर (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) ने हुजूर ﷺ से अर्ज़ किया कि या रसूल ﷺ मेरी जान के अलावा आप मुझे हर चीज से ज़्यादा महबूब हैं तो आप ﷺ ने फ़रमाया नहीं मुझे उस ज़ात की कसम जिसके कब्ज़े कुदरत में मेरी जान है कि ईमान उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं हो सकता जब तक मेरी जात तुम्हें अपनी जान से भी ज़्यादा महबूब न हो जाये तो हज़रत उमर (रजिअल्लाहु तआला अन्हु ने अर्ज़ किया कि अल्लाह की कसम आप मुझे मेरी जान से भी ज़्यादा महबूब और प्यारे हैं तो आपﷺ ने फ़रमाया ऐ उमर अब ( तेरा ईमान मुकम्मल हुआ) (बुखारी – सही – 6/143-ह-6632)
ईमान लाने वाले मेरे भाई है
हज़रत अनस (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि रसूल ﷺ अकरम ﷺ ने फ़रमाया कि मैंने ये चाहा कि मैं अपने भाइयों से मिलूँ तो सहाबा किराम (रजिअल्लाहु तआला अन्हुम) ने अर्ज़ किया या रसूल ﷺ क्या हम आपके भाई नहीं हैं तो आप (सल्लल्लाहु तआला ़) ने फ़रमाया कि तुम मेरे सहाबा हो लेकिन मेरे भाई वो होंगे जो मुझ पर ईमान लायेंगे हालाँकि उन्होंने मुझे देखा न होगा । ( मुस्नद अहमद – 5/476 हदीस-12607)
बगैर देखे ईमान लाने का हिसाब
हज़रत अबू उमामा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि हुजूर नबी ﷺ अलैहि व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमाया खुशख़बरी और मुबारक बाद हो उसके लिये कि जिसने मुझे देखा और मुझ पर ईमान लाया और सात बार खुशख़बरी और मुबारक बाद हो उसके लिये कि जिसने मुझे नहीं देखा और मुझ पर ईमान लाया । (इब्ने हिब्बान-सही-8/401 – ह-7233)
1 हुज़ूर के इल्मे गैब पर ईमान
मुतलकन इल्मे गैब का मुंकिर (इनकार करने वाला) काफिर है कि वह सरे ही से नबुव्वत का मुंकिर है,
नबुव्वत कहते ही इल्मे गैब देने को।
इमाम काजी अयाज मालिकी रहमतुल्लाह तआला अलैह शिफा शरीफ में फरमाते हैंः नबुव्वत ग़ैब पर मुत्तला होने का नाम है (अल मलफूज जिल्द 3, पेज 8)
आयाते कुरआनिया से हुजूर के इल्मे गैब का सुबूत कुरआने अजीम फरमाता है।
ऐ मेहबूब अगर अल्लाह का फ़ज़्ल व रहमत तुमपर न होता तो उनमें के कुछ लोग यह चाहते कि तुम्हें धोखा दे दे और वो अपने ही आपको बहका रहे हैं और तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेंगे और अल्लाह ने तुम पर किताब और हिकमत (बोध) उतारी और तुम्हें सिखा दिया जो कुछ तुम न जानते थे और अल्लाह का तुमपर बड़ा फ़ज़्ल है (सूरह निसा 113) तर्रजमा : ’ ऐ आम लोगो! अल्लाह इसलिए नहीं कि तुम्हें गैब पर मुत्तला फरमा दे हाँ अपने रसूल ﷺसे चुन लेता है जिसे चाहे ।
अल्लाह तआला आलेमुल-गुयूब है तो अपने गैब पर किसी को मुसल्लत नहीं फरमाता मगर अपने पसन्दीदा रसूल ﷺ को।
सिर्फ इज़हार ही नहीं बल्कि रसूल ﷺ को इल्मे गैब पर मुसल्लत फरमा दिया।
और कुरआने करीम में इरशाद फरमाता है : यानी मेरा महबूब गैब पर बखील नहीं। (अल-तकवीर, 24 )
जिसमें इस्तेअदाद पाते हैं उसे बताते भी हैं, और जाहिर है कि बखील वह कि जिसके पास माल हो और सर्फ न करे, यह कि जिसके पास माल ही नहीं क्या बखील कहा जाएगा और यहाँ बखील की नफी की गई तो जब तक कोई चीज सर्फ की न हो क्या मफ़ाद हुआ, लिहाजा मालूम हुआ कि हुजूर गैब पर मुत्तला है और अपने गुलामों को उस पर इत्तिला बख्शते हैं। और फरमाता है
हमने तुम पर यह किताब हर शय का रौशन ब्यान कर देने के लिए उतारी (अल-बहल 89)
अल्लाह व रसूल ﷺ की मुहब्बत पैदा होने का जरिया
तिलावते कुरआन मजीद और दरूद शरीफ़ की कसरत और नाअत शरीफ के सही अश्आर खुश इल्हानों से बकसरत सुने और अल्लाह व रसूल ﷺ की नेअमतों और रहमतों में जो उस पर हैं गौर करें तो इन चीज़ों से दिल में ख़ुदा व रसूल ﷺ सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की मुहब्बत पैदा होगी। (अल-मल्फूज अव्वल, स 115 )
हुज़ूर पर हर चीज रौशन हो गई
हदीस में है जिसे इमाम तिर्मिज़ी वगैरह ने दस सहाबा से रिवायत किया कि सहाबा किराम फरमाते हैं कि एक रोज़ हम सुबह को नमाज़े फ़ज के लिए मस्जिदे नब्बी में हाज़िर हुए और हुज़ूर की तशरीफ़ आवरी में देर हुई, यानी करीब था कि आफताब तुलूअ कर आए इतने में हुजूर तशरीफ फरमा हुए और नमाज़ पढ़ाई, फिर सहाबा से मुखातिब होकर फरमाया कि तुम जानते हो क्यों देर सबने अर्ज़ की अल्लाह व रसूल ﷺ खूब जानते हैं. इरशाद फरमाया मेरा रब सबसे अच्छी तजल्ली मैं मेरे पास तशरीफ लाया। यानी मैं एक दूसरी नमाज में मशगूल था इस नमाज में अब्द दरगाह माबूद में हाज़िर होता है और वहाँ खुद ही माबूद की अब्द पर तजल्ली हुई. उसने फरमाया ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम यह फरिश्ते किस बात में मुखासमा और मुवाहात करते हैं. मैंने अर्ज की कि मैं बे तेरे बताए क्या जानूँ?
“तो रब्बुल इज्जत ने अपना दस्ते कुदरत मेरे शानों के दरम्यान रखा और उसकी ठंडक मैंने अपने सीने में पाई और मेरे सामने हर चीज़ रौशन हो गई और मैंने पहचान ली। (तिर्मिज़ी) “
सिर्फ इसी पर इक्तिफा न फरमाया कि किसी वहाबी साहब को यह कहने की गुंजाइश न रहे कि “कुल्लु शैइन“ से मुराद हर शय मुतअल्लिक ब-शराए है, बल्कि एक रिवायत में फरमायाः
मैंने जान लिया जो कुछ आसमान और ज़मीन में है। और दूसरी रिवायत में फरमाया और मैंने जान लिया जो कुछ मश्रिक व मरिब तक है।
यह तीनों रिवायतें सही हैं तो तीनों लफ्ज़ इरशादे अक्दस से साबित हैं, यानी मैंने जान लिया जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, और जो कुछ मश्रिक से मग्रिब तक है हर चीज़ मुझ पर रौशन हो गई और मैंने पहचान लिया।
और रौशन होने के साथ पहचान लेना इसलिए फरमाया कि कभी शय मारूफ होती है, पेशे नज़र नहीं, और कभी राय पेश नजर होती है और मारूफ नहीं, जैसे हज़ार आदमियों की मज्लिस को छत पर से देखो वह सब तुम्हारे पेशे नज़र होंगे, मगर उनमें बहुत को पहचानते न होगे, इसलिए इरशाद फरमाया कि तमान अश्यिए आलम हमारे पेशे नज़र भी हो गई और हमने पहचान भी लिया कि उनमें न कोई हमारी निगाह से बाहर रही न इल्म से खारिज मुसलमान
देखें सूस
में बिला ज़रूरत तावील व तख्सीस बातिल व ना मस्मूअ है, अल्लाह अज्जा व जल्ल ने फरमाया हर चीज़ का रौशन ब्यान कर देने को यह किताब हमने तुम पर उतारी,
नबी ﷺ सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फरमाया हर चीज़ मुझ पर रौशन हो गई और मैंने पहचान ली।
तो बिलाशुबह यह रुयत व मारिफ़त जमीअ भक्नूनाते कलम व मक्तूबाते लौह को शामिल है जिसमें सब माकाना वमायकून रोजे अव्वल से रोज़े आखिरत तक व जुमला ख़्वातिर व जमाइर सब कुछ दाखिल । रसूल ﷺ फरमाते हैं बेशक अल्लाह ने मेरे सामने
दुनिया उठा ली है तो मैं इसे और इसमें जो कुछ क्यामत तक होने वाला है सबको ऐसा देख रहा हूँ जैसे अपनी इस हथेली को (कंजुल उम्माल )
और हुजूर के सदका में अल्लाह तआला ने हुज़ूर के गुलामों को यह मरतबा इनायत फरमायाः एक बुजुर्ग फरमाते हैं वह मर्द नहीं जो तमाम दुनिया को मिस्लं हथेली के न देखे,
2 हुज़ूर की तवस्सुल पर ईमान
अल्लाह का फरमान (तर्जमा) : अगर जब वह अपनी जानों पर ज़ुल्म करें तो ऐ मेहबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों और फिर अल्लाह से माफ़ी चाहें और रसूल ﷺ उनकी शफ़ाअत फ़रमाए तो (इस वसीले के जरिये) ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान पाएं (सूरह निसा, आयत न. 64)
बारगाहे खुदावंदी में रसूल ﷺ का वसीला
हुजूरे अकदस का बारगाहे इलाही में वसीला बना कर दुआ मांगना जायज़ बल्कि मुस्तहब है। इसीको तवस्सुल व इस्तिगासा व तशफ्फुअ वग़ैरह मुख्तलिफ नामों के साथ बोला जाता है। हुजूर को खुदा के दरबार में वसीला बनाना यह हज़राते अंबिया व मुरसलीन की सुन्नत और सलफे सालिहीन का अच्छा तरीका है। यह तवस्सुल (वसीला) हुजूर की पैदाइश से पहले आपकी जाहिरी जिंदगी में और आपकी वफाते अकदस के बाद तीनों हालतों में साबित है। चुनान्चे हम यहाँ तीनों हालतों में आप से तवस्ल करने की चन्द मिसालें निहायत ही इख़्तिसार के तौर पर ज़िक्र करते हैं।
पैदाइश से पहले वसीला का सबूत
रिवायत है कि हज़रते आदम अलैहिस्सलाम ने दुनिया में आ कर बारी तआला से यूँ दुआ मांगी कि तरजमाः ऐ मेरे परवरदिगार में तुझ से मुहम्मद के वसीला से सवाल करता हूँ कि तू मुझे माफ़ फ़रमा दे। अल्लाह तआला ने इर्शाद फ़रमाया कि ऐ आदम! तुमने मुहम्मद को किस तरह पहचाना। हालांकि मैंने अभी तक उनको पैदा भी नहीं फ़रमाया। हज़रते आदम अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! जब तूने मुझे पैदा फ़रमा कर मेरे बदन में रूह फूँकी तो मैंने सर उठा कर देखा कि अशें मजीद के पायों पर ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह लिखा हुआ है। उससे मैंने समझ लिया कि तूने जिसके नाम को अपने नाम के साथ मिला कर अर्श पर तहरीर कराया है वह यकीनन तेरा सबसे बड़ा महबूब होगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि ऐ आदम! (अलैहिस्सलाम) बेशक! तुमने सच कहा । वो मेरे नज़दीक तमाम मख्लूक से ज़्यादा महबूब हैं। चूँकि तुमने उनको मेरे दरबार में वसीला बनाया है इसलिए मैंने तुमको माफ़ कर दिया। सुन लो कि अगर मुहम्मद न होते तो मैं तुमको पैदा न करता । इस हदीस को इमाम बैहकी ने रिवायत फ़रमाया है। (रूहुल बयान सूरए अहजाब, सफा-230)
नबी ﷺ के वसीले से जंग जितना
हुजूर नबीये करीम ﷺ की तशरीफ आवरी से पहले यहूद का यह तरीका था कि जब कभी काफिरों और मुश्रिकों से जंग होती थी और उन्हें ऐसा महसूस होता कि वह जंग हार जाएंगे तो उस वक़्त तौरात को सामने रखते और वह जगह खोल कर, जहाँ हुजूर नबीये करीम ﷺ की सिफात और कमालात का ज़िक्र होता, वहाँ हाथ रखते और यूँ दुआ मागंतेः ऐ खुदा हम तुझ से तेरे उस नबी का वास्ता देकर अर्ज करते हैं, जिस की बेअसत (यानी आखिरी नबी का आने) का तूने हम से वादा किया है, आज हमें अपने दुशमनों पर फतह दे। अल्लाह तआला हुजूर ﷺ के सदके में उन्हें फतह (जीत) देता। (क्या आप जानते है,19 )
जाहिरी हयाते अक़दस में वसीला का सबूत
हज़राते सहाब-ए-किराम आपकी मुकद्दस मजलिस में हाज़िर होकर जिस एक नाबीना बारगाहे अकदस में हाज़िर हुआ अर्ज़ किया कि आप अल्लाह तआला से दुआ कर दें कि वह मुझे आराम बख़्शे । आपने फ़रमाया कि अगर तू चाहे तो मैं दुआ कर देता हूँ। अगर तू चाहे तो सब्र कर। सब्र तेरे हक में अच्छा है जब उसने दुआ के लिए इसरार किया तो आपने उसको हुक्म दिया कि तुम अच्छी तरह वुजू करके यूँ दुआ मांगो कि
तर्जुमा : या अल्लाह ! मैं तेरी बारगाह में सवाल करता हूँ और तेरे नबी -ए- रहमत का वसीला पेश करता हूँ या मुहम्मद मैंने अपने परवरदिगार की बारगाह में आपका वसीला पेश किया है। अपनी इस ज़रूरत में ताकि वे पूरी हो जाए या अल्लाह तू मेरे हक में हुजूर की शफाअत कुबूल फरमा।
इस हदीस को तिर्मिज़ी व निसाई ने रिवायत किया है और तिर्मिज़ी ने फ़रमाया कि इमाम बैहकी व तबरानी ने भी इस हदीस को सही कहा है। मगर इमाम बैहकी ने इतना और कहा है कि उस नाबीना ने ऐसा किया और उसकी आँखें अच्छी हो गई। (वफाउल वफा, जिल्द-2, सफा 420 )
वफ़ाते अकदस के बाद वसीला
वफाते अकदस के बाद भी हज़राते सहाब-ए-किराम अपनी जरूरतों और मुसीबतों के वक़्त हुजूर को अपनी दुआओं में वसीला बनाया करते थे। बल्कि आपको पुकार कर आपसे मदद माँगा करते थे।
हिकायत गुनाहों की माफी के लिए नबी ﷺ का वसीला
सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ाते शरीफ़ के बाद एक अरब देहाती आपके मुबारक रौज़े पर हाज़िर हुआ और रोज़ए शरीफ़ की पाक मिट्टी अपने सर पर डाली और अर्ज़ करने लगा, या रसूल ﷺ, जो आपने फ़रमाया हमने सुना और जो आप पर उतरा उसमें यह आयत भी है “वलौ अन्नहुम इज़ ज़लमू”. मैंने बेशक अपनी जान पर ज़ुल्म किया और मैं आपके हुज़ूर में अल्लाह से अपने गुनाह की बख़्शिश चाहने हाज़िर हुआ तो मेरे रब से मेरे गुनाह की बख़्शिश कराईये. इस पर क़ब्र शरीफ़ से आवाज़ आई कि तेरी बख़्शिश की गई.
इससे कुछ मसअले मालूम हुए. अल्लाह तआला की बारगाह में हाजत अर्ज़ करने के लिये उसके प्यारों को वसीला बनाना कामयाबी का ज़रिया है. क़ब्र पर हाजत के लिये जाना भी ” जाऊका” में दाख़लि है। (खजाइनुल इरफान)
बारिश के लिए इस्तिगासा ( मदद ) :
हज़रते अमीरूल – मोमिनीन फारूके आज़म के दौरे खिलाफ़त में सूखा पड़ गया तो हज़रते बिलाल बिन हारिस सहाबीने रसूल ﷺकी कब्रे अनवर पर हाज़िर होकर अर्ज किया कि या रसूल ﷺ! (3) अपनी उम्मत के लिए बारिश की दुआ फ़रमाएँ। वह हलाक हो रही है। रसूल ﷺने ख़्वाब में उनसे इर्शाद फ़रमाया कि तुम हज़रते उमर के पास जाकर मेरा सलाम कहो। खुशखबरी दे दो कि बारिश होगी। यह भी कह दो कि वह नर्मी इख़्तियार करें। उस शख्स ने बारगाहे ख़लिफ़त में हाज़िर होकर ख़बर दी। हज़रते उम यह सुन कर रोए । फिर कहा ऐ रब ! में कोताही नहीं करता मगर उसी चीज़ में कि जिससे मैं आजिज़ हूँ।
जीत के लिए आपका वसीलाः
अमीरुल मोमिनीन हज़रते फारूके आज़म ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन कुर्त के हाथ अपना ख़त अमीरे लश्कर हज़रते अबू-उबैदा बिन- जर्राह के नाम मकामे ’यरमूक’ में भेजा। सलामती की दुआ मांगी। हज़रते अब्दुल्लाह बिन कुर्त जब मस्जिदे नबवी से बाहर आए तो उनको ख़याल आया कि मुझसे बड़ी गलती हुई कि मैं ने रोज़- -ए-अकदस पर सलाम नहीं अर्ज़ किया। चुनान्चे वापस लौट कर जब कब्रे अनवर के पास हाज़िर हुए तो वहाँ हज़रते आइशा हज़रते अब्बास व हज़रते अली व हज़रते इमाम हसन व हज़रते इमाम हुसैन हाज़िर थे। हज़रते अब्दुल्लाह बिन कुर्त ने उन हज़रात से जंगे यरमूक में इस्लाम की फतह के लिए दुआ की दरख्वास्त की तो हज़रते अली व हज़रते अब्बास ने हाथ उठा कर यूँ दुआ मांगी कि :- (वफाउल वफा)
“या अल्लाह ! हम उस नबी ﷺ-ए-मुस्तफा व रसूल ﷺे मुज्तबा कि जिनके वसीले से हज़रते आदम अलैहिस्सलाम की दुआ कुबूल हो गई और खुदा ने उनको माफ फरमा दिया, उनहीं के वसीला से दुआ करते हैं कि तू हज़रते अब्दुल्लाह बिन कुर्त पर उसका रास्ता आसान कर दे। दूर को नज़दीक कर दे। अपने नबी ﷺ के अस्हाब की मदद फ़रमा कर उनको कामयाबी अता फरमा दे।
उसके बाद हज़रते अली ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन कृर्त से फ़रमाया कि अब आप जाइए। अल्लाह तआला हज़रते उमर व अब्बास व अली व हसन व हुसैन व अज़्वाजे नबी ﷺ (3) की दुआ को रद्द नहीं फरमाएगा जबकि उन लोगों ने उसकी बारगाह में उस नबी ﷺ का वसीला पकड़ा है जो अकरमुल ( फतहुश्शाम जिल्द 1 सफा -105)
3 इख्तियारे नबी ﷺ पर ईमान
क़ुरआन में अल्लाह का फरमान (तर्जमा) : यह नबी ﷺ मुसलमानों का उनकी जान से ज़्यादा मालिक है(सूरह अहज़ाब, आयत न. 6)
तफ़्सीर :दुनिया और दीन के तमाम मामलों में. और नबी ﷺ का हुक्म उनपर लागू और नबी ﷺ की फ़रमाँबरदारी ज़रूरी. और नबी ﷺ के हुक्म के मुक़ाबले में नफ़्स की ख़्वाहिश का तर्क हर हाल में जरुरी है.
हुज़ूर के चाहने से क़िब्ला बदल गया
क़ुरआन में अल्लाह का फरमान है ( तर्जमा) : (ऐ नबी ﷺ) हम देख रहे हैं बार बार तुम्हारा आसमान की तरफ़ मुंह करना तो जरूर हम तुम्हें फेर देंगे उस क़िबले की तरफ़ जिसमें तुम्हारी ख़ुशी है अभी अपना मुंह फेर दो मस्जिदे हराम की तरफ़, और ऐ मुसलमानों तुम जहां कहीं हो अपना मुंह उसी की तरफ़ करो और वो जिन्हें किताब मिली है ज़रूर जानते है कि यह उनके रब की तरफ़ से हक़ है और अल्लाह उनके कौतुकों से बेख़बर नहीं (सूरह बक़रह, आयत न. 144)
पहले मुसलमानों का क़िब्ला काअबा नहीं था बल्कि बैतूल मुकद्दस क़िब्ला था । नबी ﷺ को बैतुल मुकद्दस की तरफ मुँह करके नमाज़ पढ़ने का हुक्म दिया गया था और आप ﷺ रब तआला के हुक्म की पैरवी करते हुये बैतुल मुकद्दस की तरफ मुँह मुबारक करके नमाज़ अदा करते रहे अलबत्ता हुजूर ﷺ की चाहत ये थी कि कअबा को मुसलमानों का किब्ला बना दिया जाये और इसकी वजह ये नहीं थी कि आपको बैतुल मुकद्दस का किब्ला बनाया जाना पसंद नहीं था बल्कि इसकी कई वजह थीं एक ये कि खाना-ए-काबा हज़रत सय्यदना इब्राहीम अलैहिस्सलाम व उनके अलावा कसीर अम्बिया किराम (अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम ) का किब्ला था चुनांचा एक दिन हालते नमाज़ में रसूल ﷺ अकरम ﷺ इस उम्मीद में बार बार आसमान की तरफ देख रहे थे कि अल्लाह के हुक़्म से किब्ले की तब्दीली का हुक्म आ जाये चुनांचा दौराने नमाज़ यही आयते करीमा नाज़िल हुई (यानी सूरह बक़रह, आयत न. 144)
आग दस्तर ख़्वान को नहीं जला सकी
हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु के घर सहाबए किराम की दावत थी। एक कपड़े का दस्तरख्वान लाया गया जो बहुत मैला था। आप ने वह दस्तर- ख़्वान भड़कते हुए तन्नूर में डाल दिया। सारा मैल जल गया लेकिन दस्तर- ख़्वान के कपड़े के तार भी गर्म न हुए। साथियों ने पूछाः ऐ सहाबिए रसूल, आग में कपड़ा क्यों न जला और इतना साफ कैसे हो गया? हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमायाः एक दिन हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस दस्तर ख़्वान से अपना हाथ और मुंह पोंछा था, उस दिन से आग इसे नहीं जलाती । ( मसनवी शरीफ)
ज़मज़म से भी अफ़ज़ल पानी
उलमा का कहना है कि दुनिया व आखि़रत के तमाम पानियों से अफज़ल और मुकद्दस वह पानी है जो हुजूरे अकदस सल्ललाहु अलैहि वसल्लम की उंगलियों से निकला, यहाँ तक कि यह पानी ज़मज़म से भी अफज़ल है। ( तफसीरे नईमी)
सरकार के कदमों की बरकत से फसल दो गुना
एक बार हुजूर शफीउल मुज़निबीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज़रतअनस रज़ियल्लाहु अन्हु के बाग़ में तशरीफ ले गए। सरकार के कदमों की बरकत से उनका बाग़ साल में दो बार फसल देने लगा। (बुखारी शरीफ)
4 शफ़ाअते मुस्तफ़ा पर ईमान
रसूल ﷺ पर ईमान लाने का एक मतलब ये भी है कि ये अक़ीदा रखा जाए कि नबी ﷺ उम्मतियों के लिए शफ़ाअत करेंगे लेकिन जिसका अक़ीदा ये हो कि नबी किसी का शफ़ाअत नहीं करेंगे वैसा शख्स बदअक़ीदा है ऐसे लोग शफ़ाते मुस्तफ़ा से महरूम रहेंगे जिसका अंजाम ये होगा कि उसे जहन्नम में रहना पड़ेगा।
हदीस 1 (तर्जमा) : मेरी शफ़ाअत रोज़े कयामत हक है जो इस पर ईमान न लाएगा इस के काबिल न होगा। (40 हदीसे शफ़ाअत)
हदीस 2 (तर्जमा) : मेरी शफाअत मेरी उम्मत में उनके लिए है जो कबीरा गुनाह वाले हैं।(40 हदीसे शफ़ाअत, पेज 13)
हदीस 3ः (तर्जमा) अबूबक्र अहमद इब्ने अली बग़दादी हज़रते अबू दाऊद रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी हुज़र शफीउल मुज्नेबीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं :- तर्जमा : मेरी शफअत मेरे गुनाहगार उम्मतियों के लिए है।(40 हदीसे शफ़ाअत, पेज 13)
अबू दरदा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने अर्ज की अगरचे जानी हो अगरचे चोर हो तब फ़रमाया अगरचे जानी हो अगरचे चोर हो बरखिलाफ ख़्वाहिशे अबू दरदा के (यानी जैसा कि अबू दरदा सोच रहे हैं वैसा नहीं बल्कि चोरों और जिनाकारों तक के लिए हुजूर की शफाअत है) (40 हदीसे शफ़ाअत, पेज 13)
हदीस (तर्जमा)ः हज़रते अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी हुज़ूर शफीउल मुज्नेबीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं :- रू-ए-ज़मीन पर जितने पेड़ पत्थर ढेले हैं मैं कयामत में उन सबसे ज्यादा आदमियों की शफअत फरआऊँगा । (40 हदीसे शफ़ाअत, पेज 14)
5 खत्मे नबूवत पर ईमान
तमाम उम्मतियों पर हक़ है कि अल्लाह व रसूल के फ़रमान के मुताबिक नबी करीम को आख़री नबी जाने और खत्मे नबूवत को हक़ माने यानी इसके बाद कोई नबी नहीं आ सकता।
हुजूरे अकदस ﷺ ने फरमायाः अल्लाह तआला ने अपने पास लिख रखा है कि मैं ख़ातिमुल अम्बिया हूँ और मेरा ख़ातिमुन्बीय्यीन होना खुदा ने उस वक़्त लिख दिया था जब आदम अलैहिस्सलाम मिट्टी और पानी की हालत में थे और में तुम को अपनी इब्तिदाई हालत के बारे में ख़बर देता हूँ। मैं इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ हूँ और अपनी मां का वह ख़्वाब हूँ जो मेरी पैदाइश के वक्त उन्हों ने देखा था कि उनके अन्दर से एक नूर निकला था जिससे शाम के महल जगमगा उठे थे। (क्या आप जानते है, पेज 22)
6 हयाते नबी ﷺ बादे वफात पर ईमान
तमाम अंबिया किराम अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम की हयात, हकीकी हिस्सी दुनियवी है।
सही हदीस में है बेशक अल्लाह तआला ने ज़मीन पर अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम के ज़िस्म को खाना हराम फरमा दिया है, तो अल्लाह के नवी ज़िन्दा है, रिज़्क दिए जाते है । (निसाई )
नबी ﷺ जिन्दा है
दूसरी सही हदीस में है अंबिया सब जिन्दा हैं अपनी कब्रों में नमाजें पढ़ते हैं। (मिश्कात)
मसला हयाते अंबिया
अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम हाले हयात व हाले वफात में हमेशा हर वक्त तैय्यिब व ताहिर हैं। अंबिया किराम अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम की मौत यानी उनके अज्सामे तैय्यबा से अरवाहे ताहिरा का जुदा होना सिर्फ एक आन के लिए होता है फिर वैसे ही जिन्दा हो जाते हैं जैसे हाले हयाते जाहिरी में थे जिस्म व रूह से मअन व लिहाज़ा उनका तरका नहीं बटता न उनके बाद उनकी अज़्वाज से निकाह जाइज़ (फ़ैज़ाने आला हज़रत, 61 )
अंबिया किराम अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम को मुर्दा कहना हराम, बल्कि मआजल्लाह बतौर तौहीन हो तो सरीह कुछ है, अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल ने शोहदा को मुर्दा कहने से मना फरमाया. अंबिया अलैहिस्सलातु वस्सलाम की हयात उन से बदरजहा जाइद है शहीद की हयात अहकामे दुनिया में नहीं उसका तरका बढ़ेगा. उसकी बीबी इद्दत के बाद निकाह कर सकेगी, बखिलाफ अंबिया किराम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ( हाशिया फतावा रज्वीया जिल्द अव्वल, सफा, 611)
7 हाज़िर व नाज़िर पर ईमान
शरीअत में हाज़िर नाज़िर के माना हैं। सारी दुनिया को देखना और दूर व नज़दीक की आवाज़ों को सुनना । या थोड़े से वक़्त में दुनिया भर की सैर कर लेना और एक आन में रूहानी या जिस्म मिसाली के साथ सैंकड़ों किलोमीटर की दूरी पर मदद के लिए पहुंच जाना ।(बुज़ुर्गों के अक़ाइद, पेज 300)
अल्लाह के महबूब बन्दों का हाज़िर व नाज़िर होना हक है। हुजूर सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और बड़े-बड़े उलमा-ए-किराम व बुजुर्गाने दीन का यही अकीदा है। सुबूत मुलाहजा हो ।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा से रवायत है। उन्होंने कहा कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया । अल्लाह ने मेरे लिए दुनिया के पर्दे उठा दिए हैं। तो मैं दुनिया को और जो कुछ भी उस में कयामत तक होने वाला है सब को ऐसा देखता हूँ जैसे कि अपनी इस हथेली को। (जरकानी अलल मवाहिब जि0ः 7 पे0ः 204 )